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[1] क़ादिर-ए-मुतलक़ अदालत के औक़ात क्यूँ नहीं मुक़र्रर करता? जो उसे जानते हैं वह ऐसे दिन क्यूँ नहीं देखते?

[2] बेदीन अपनी ज़मीनों की हुदूद को आगे पीछे करते और दूसरों के रेवड़ लूट कर अपनी चरागाहों में ले जाते हैं।

[3] वह यतीमों का गधा हाँक कर ले जाते और इस शर्त पर बेवा को क़र्ज़ देते हैं कि वह उन्हें ज़मानत के तौर पर अपना बैल दे।

[4] वह ज़रूरतमन्दों को रास्ते से हटाते हैं, चुनाँचे मुल्क के ग़रीबों को सरासर छुप जाना पड़ता है।

[5] ज़रूरतमन्द बयाबान में जंगली गधों की तरह काम करने के लिए निकलते हैं। ख़ुराक का खोज लगा लगा कर वह इधर उधर घूमते फिरते हैं बल्कि रेगिस्तान ही उन्हें उन के बच्चों के लिए खाना मुहय्या करता है।

[6] जो खेत उन के अपने नहीं हैं उन में वह फ़सल काटते हैं, और बेदीनों के अंगूर के बाग़ों में जा कर वह दो चार अंगूर चुन लेते हैं जो फ़सल चुनने के बाद बाक़ी रह गए थे।

[7] कपड़ों से महरूम रह कर वह रात को बरहना हालत में गुज़ारते हैं। सर्दी में उन के पास कम्बल तक नहीं होता।

[8] पहाड़ों की बारिश से वह भीग जाते और पनाहगाह न होने के बाइस पत्थरों के साथ लिपट जाते हैं।

[9] बेदीन बाप से महरूम बच्चे को माँ की गोद से छीन लेते हैं बल्कि इस शर्त पर मुसीबतज़दा को क़र्ज़ देते हैं कि वह उन्हें ज़मानत के तौर पर अपना शीरख़्वार बच्चा दे।

[10] ग़रीब बरहना हालत में और कपड़े पहने बग़ैर फिरते हैं, वह भूके होते हुए पूले उठाए चलते हैं।

[11] ज़ैतून के जो दरख़्त बेदीनों ने सफ़-दर-सफ़ लगाए थे उन के दरमियान ग़रीब ज़ैतून का तेल निकालते हैं। प्यासी हालत में वह शरीरों के हौज़ों में अंगूर को पाँओ तले कुचल कर उस का रस निकालते हैं।

[12] शहर से मरने वालों की आहें निकलती हैं और ज़ख़्मी लोग मदद के लिए चीख़ते चिल्लाते हैं। इस के बावुजूद अल्लाह किसी को भी मुजरिम नहीं ठहराता।

[13] यह बेदीन उन में से हैं जो नूर से सरकश हो गए हैं। न वह उस की राहों से वाक़िफ़ हैं, न उन में रहते हैं।

[14] सुब्ह-सवेरे क़ातिल उठता है ताकि मुसीबतज़दा और ज़रूरतमन्द को क़त्ल करे। रात को चोर चक्कर काटता है।

[15] ज़िनाकार की आँखें शाम के धुन्दल्के के इन्तिज़ार में रहती हैं, यह सोच कर कि उस वक़्त मैं किसी को नज़र नहीं आऊँगा। निकलते वक़्त वह अपने मुँह को ढाँप लेता है।

[16] डाकू अंधेरे में घरों में नक़ब लगाते जबकि दिन के वक़्त वह छुप कर अपने पीछे कुंडी लगा लेते हैं। नूर को वह जानते ही नहीं।

[17] गहरी तारीकी ही उन की सुब्ह होती है, क्यूँकि उन की घने अंधेरे की दह्शतों से दोस्ती हो गई है।

[18] लेकिन बेदीन पानी की सतह पर झाग हैं, मुल्क में उन का हिस्सा मलऊन है और उन के अंगूर के बाग़ों की तरफ़ कोई रुजू नहीं करता।

[19] जिस तरह काल और झुलसती गर्मी बर्फ़ का पानी छीन लेती हैं उसी तरह पाताल गुनाहगारों को छीन लेता है।

[20] माँ का रहम उन्हें भूल जाता, कीड़ा उन्हें चूस लेता और उन की याद जाती रहती है। यक़ीनन बेदीनी लकड़ी की तरह टूट जाती है।

[21] बेदीन बाँझ औरत पर ज़ुल्म और बेवाओं से बदसुलूकी करते हैं,

[22] लेकिन अल्लाह ज़बरदस्तों को अपनी क़ुदरत से घसीट कर ले जाता है। वह मज़बूती से खड़े भी हों तो भी कोई यक़ीन नहीं कि ज़िन्दा रहेंगे।

[23] अल्लाह उन्हें हिफ़ाज़त से आराम करने देता है, लेकिन उस की आँखें उन की राहों की पहरादारी करती रहती हैं।

[24] लम्हा भर के लिए वह सरफ़राज़ होते, लेकिन फिर नेस्त-ओ-नाबूद हो जाते हैं। उन्हें ख़ाक में मिला कर सब की तरह जमा किया जाता है, वह गन्दुम की कटी हुई बालों की तरह मुरझा जाते हैं।

[25] क्या ऐसा नहीं है? अगर कोई मुत्तफ़िक़ नहीं तो वह साबित करे कि मैं ग़लती पर हूँ, वह दिखाए कि मेरे दलाइल बातिल हैं।”

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