[1] इन बातों के बाद यीशु गलील में सेवकाई करते रहे, क्योंकि यहूदी उन्हें मार डालने की कोशिश कर रहे थे। इसलिए वह यहूदिया में दिखाई नहीं देना चाहते थे।
[2] उन दिनों यहूदियों का मण्डपों का पर्व निकट था।
[3] इसलिए उनके भाइयों ने उन से कहा, "यहाँ से यहूदिया को चले जाइये, ताकि जो काम आप करते हैं, उन्हें आपके शिष्य भी देखें।
[4] क्योंकि ऐसा कोई न होगा जो मशहूर होना चाहे, और छिप कर काम करे। अगर आप ये सब कर ही रहे हैं, तो अपने कामों को खुले आम कीजिए।"
[5] यीशु के भाई भी उन पर विश्वास नहीं करते थे।
[6] तब यीशु ने उन से कहा, "मेरा समय अभी तक नहीं आया है परन्तु सारा समय तुम्हारा ही है।
[7] संसार तुम से दुश्मनी नहीं कर सकता, लेकिन वह मुझ से करता है। क्योंकि मैं उसके विरोध में यह गवाही देता हूँ कि उसके काम बुरे हैं।
[8] तुम पर्व में जाओ, मैं अभी नहीं आऊँगा, क्योंकि अभी तक मेरा वक्त पूरा नहीं हुआ है।"
[9] वह उन से ये बातें कहकर गलील ही में रह गये।
[10] लेकिन जब उनके भाई पर्व में चले गए, तो वहाँ वह खुले आम नहीं, लेकिन दूसरे लोगों की तरह गये।
[11] वहाँ यहूदी यीशु को यह कहकर ढूँढने लगे कि वह कहाँ हैं?
[12] लोगों में उनके विषय में बहुत सी बातें होती रहीं थी। कितने कहते थे, "वह भला मनुष्य है'' और कितने कहते थे कि "नहीं, वह लोगों को भरमाता है।"
[13] तौभी यहूदियों के डर के मारे कोई व्यक्ति उनके विषय में प्रगट रूप में नहीं बोलता था।
[14] जब पर्व के आधे दिन बीत गए, तो यीशु मन्दिर में जाकर उपदेश करने लगे।
[15] तब यहूदियों ने अचम्भा करके कहा, "यीशु को बिना पढ़े विद्या कैसे आ गई?"
[16] यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, "मेरा उपदेश मेरा नहीं, परन्तु मेरे भेजने वाले का है।
[17] यदि कोई उनकी इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की तरफ़ से है, या मेरी तरफ़ से।
[18] जो अपनी ओर से कुछ कहता है, वह अपनी ही बड़ाई चाहता है; परन्तु जो अपने भेजने वाले की बड़ाई चाहता है वही सच्चा है, और उसमें झूठ नहीं।
[19] क्या मूसा ने तुम्हें नियमशास्त्र नहीं दिया? तौभी तुम में से कोई व्यवस्था पर नहीं चलता। तुम क्यों मुझे मार डालना चाहते हो?"
[20] लोगों ने उत्तर दिया, "तुम में दुष्टात्मा है। कौन तुम को मार डालना चाहता है?"
[21] यीशु ने उनको उत्तर दिया, "मैंने एक काम किया, और तुम सब अचम्भा करते हो।
[22] इसी कारण मूसा ने तुम्हें खतने की आज्ञा दी है (यह नहीं कि वह मूसा की ओर से है, लेकिन तुम्हारे पूर्वजों से चली आई है)। तुम सब्त के दिन मनुष्य का खतना करते हो।
[23] जब सब्त के दिन मनुष्य का खतना किया जाता है ताकि मूसा के नियमशास्त्र की आज्ञा टल न जाए, तो तुम मुझ पर क्यों गुस्सा करते हो कि मैंने सब्त के दिन एक इन्सान को पूरी तरह से ठीक किया?
[24] मुँह देखा न्याय न करो लेकिन ईमानदारी से इन्साफ़ करो।"
[25] तब कितने यरूशलेमी कहने लगे, "क्या यह वही नहीं जिन्हें मार डालने की कोशिश की जा रही है?
[26] लेकिन देखो, वह तो खुल्लमखुल्ला बातें करते हैं, और कोई उन से कुछ नहीं कहता। क्या यह सम्भव है कि अधिकारियों ने सच-सच जान लिया है कि यही मसीह हैं?
[27] इन को हम जानते हैं कि किस खानदान से हैं; परन्तु मसीह जब आएँगे, तो कोई न जानेगा कि वह कहाँ के हैं।"
[28] तब यीशु ने मन्दिर में उपदेश देते हुए पुकार कर कहा, "तुम मुझे जानते हो और यह भी जानते हो कि मैं कहाँ का हूँ। मैं तो आप से नहीं आया, परन्तु मेरे भेजने वाले पिता सच्चे हैं, उनको तुम नहीं जानते।
[29] मैं उन्हें जानता हूँ क्योंकि मैं उनकी ओर से हूँ और उन्हों ने ही मुझे भेजा है।"
[30] यह सुनकर उन्हों ने यीशु को पकड़ना चाहा, तौभी किसी ने उन पर हाथ न डाला, क्योंकि उनका समय अब तक न आया था।
[31] भीड़ में से कई लोगों ने उन पर विश्वास किया, और कहने लगे कि मसीह जब आएँगे, तो क्या इस से अधिक आश्चर्यकर्म दिखाएँगे, जो इन्होंने दिखाए?
[32] फ़रीसियों ने लोगों को उनके विषय में ये बातें चुपके चुपके करते सुना, और महायाजकों और फ़रीसियों ने उनके पकड़ने के लिए सिपाही भेजे।
[33] यह देखकर यीशु ने कहा, "मैं और थोड़ी देर तक तुम्हारे साथ हूँ उसके बाद अपने भेजने वाले के पास चला जाऊँगा।
[34] तुम मुझे ढूँढोगे, परन्तु नहीं पाओगे और जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते।"
[35] यहूदियों ने आपस में कहा, "वह कहाँ जाएँगे कि हम इन्हें ढूँढ न पाएँगे? क्या वह उनके पास जाएँगे, जो यूनानियों में तित्तर बित्तर होकर रहते हैं, और यूनानियों को भी उपदेश देंगे?
[36] उनके यह कहने का क्या मतलब है कि तुम मुझे ढूँढोगे, परन्तु न पाओगे; और जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते?"
[37] फिर पर्व के अन्तिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़े हुए और उन्हों ने पुकार कर कहा, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पिए।
[38] जैसा बाइबल में आया है, उसके अनुसार जो मुझ पर विश्वास करेगा, उसके भीतर में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेगी।"
[39] यीशु ने ये शब्द उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उन पर विश्वास करने वाले पाने पर थे। आत्मा अब तक न उतरा था, क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को न पहुँचे थे।
[40] तब भीड़ में से कुछ लोगों ने ये बातें सुनकर कहा, "सचमुच यही वह भविष्यद्वक्ता हैं।"
[41] दूसरों ने कहा, "यह मसीह हैं।" परन्तु किसी ने कहा, "क्यों? क्या मसीह गलील से आएँगे?
[42] क्या बाइबल में यह नहीं लिखा है कि मसीह दाऊद के वंश से और बेतलेहम गाँव से आएँगे जहाँ दाऊद रहते थे?"
[43] तब उनके कारण लोगों में फूट पड़ी।
[44] उन में से कई उन्हें पकड़ना चाहते थे, परन्तु किसी ने उन पर हाथ न डाला।
[45] तब सिपाही महायाजकों और फ़रीसियों के पास आए, और उन्हों ने उन से कहा, "तुम उसे क्यों नहीं लाए?"
[46] सिपाहियों ने उत्तर दिया कि किसी मनुष्य ने कभी ऐसी बातें नहीं की।
[47] फ़रीसियों ने उनको उत्तर दिया, "क्या तुम भी भरमाए गए हो?
[48] क्या अधिकारियों या फ़रीसियों में से किसी ने भी उन पर विश्वास किया है?
[49] परन्तु ये लोग जो व्यवस्था नहीं जानते, दण्डित हैं।"
[50] नीकुदेमुस ने (जो पहले यीशु के पास आया था और उन में से एक था), उन से कहा,
[51] "क्या हमारी व्यवस्था (नियमशास्त्र) किसी व्यक्ति को जब तक पहले उसकी सुनकर जान न ले, कि वह क्या करता है, दोषी ठहराती है?"
[52] उन्हों ने उसे जवाब दिया, "क्या तुम भी गलील के हो? ढूँढो और देखो, कि गलील से कोई भविष्यद्वक्ता प्रगट नहीं होने का।"
[53] (तब सब लोग अपने-अपने घर चले गए।)