[1] फिर यीशु फ़सह से छः दिन पहले बैतनिय्याह आए, जहाँ लाज़र था। इसी लाज़र को यीशु ने मरे हुओं में से जिलाया था।
[2] वहाँ उन लोगों ने यीशु के लिए खाना तैयार किया, और मार्था सेवा कर रही थी, लाज़र उन में से एक था, जो यीशु के साथ खाना खाने के लिए बैठे थे।
[3] तब मरियम ने जटामांसी का कीमती करीब आधा लीटर इत्र लेकर यीशु के पाँवों पर उण्डेला, और अपने बालों से उनके पाँव पोंछे। इत्र की खुशबू से सारा घर भर गया।
[4] लेकिन उनके शिष्यों में से यहूदा इस्करियोती नामक एक शिष्य जो उन्हें पकड़वाना चाहता था, कहने लगा,
[5] "यह इत्र तीन सौ चाँदी के सिक्कों में बेचकर गरीबों को क्यों न दिया गया?"
[6] उसने यह बात इसलिए न कही, कि उसे गरीबों की चिन्ता थी, परन्तु इसलिए कि वह चोर था लेकिन उसके पास उनकी थैली रहती थी, और उसमें जो कुछ डाला जाता था, वह निकाल लेता था।
[7] यीशु ने कहा, "उसे रहने दो। उसने मेरे गाड़े जाने के दिन के लिए यह किया है।
[8] क्योंकि गरीब तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, लेकिन मैं तुम्हारे साथ हमेशा न रहूँगा।"
[9] यहूदियों में से साधारण लोग जान गए कि यीशु वहाँ हैं, और लोग न केवल यीशु के कारण आए, लेकिन इसलिए भी कि लाज़र को देखें, जिसे यीशु ने मरे हुओं में से जिलाया था।
[10] तब महायाजकों ने लाज़र को भी मार डालने की योजना बनायी।
[11] क्योंकि उसके कारण बहुत से यहूदी यीशु पर विश्वास करने लगे।
[12] दूसरे दिन बहुत से लोगों ने जो त्यौहार में आए थे, यह सुनकर कि यीशु यरुशलेम में आने वाले हैं,
[13] खजूर की डालियाँ लीं, और उन से भेंट करने निकले। वे पुकारने लगे, "होसन्ना, धन्य इस्राएल के राजा, जो प्रभु के नाम से आते हैं!"
[14] यीशु को एक गधे का बच्चा मिला, और वह उस पर बैठ गए।
[15] जैसा लिखा है, "सिय्योन की बेटी, (इस्त्राएली लोग) मत डरो, देखो, तुम्हारे राजा गधे के बच्चे पर बैठकर चले आते हैं!"
[16] उनके शिष्य, ये बातें पहले न समझे थे, परन्तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई, तो उनको याद आया कि ये बातें उनके बारे में लिखी हुई थीं, और लोगों ने उन से इस तरह का बर्ताव किया था।
[17] तब भीड़ के लोगों ने जो उस समय यीशु के साथ थे, यह गवाही दी कि उन्हों ने लाज़र को कब्र में से बुलाकर मरे हुओं में से जिलाया था।
[18] इसी कारण लोग उन से भेंट करने को आए थे, क्योंकि उन्हों ने सुना था कि यीशु ने यह आश्चर्यकर्म दिखाया है।
[19] तब फ़रीसियों ने आपस में कहा, "सोचो तो सही कि तुम कुछ भी नहीं कर पा रहे हो। देखो, संसार यीशु को मानने लगा है।"
[20] जो लोग उस पर्व में भजन करने आए थे उन में से कई यूनानी थे।
[21] उन्हों ने गलील के बैतसैदा के रहने वाले फ़िलिप्पुस के पास आकर उससे बिनती की, "श्रीमान, हम यीशु से मुलाकात करना चाहते हैं।"
[22] फ़िलिप्पुस ने आकर अन्द्रियास को बताया, तब अन्द्रियास और फ़िलिप्पुस ने यीशु को।
[23] तब यीशु ने उन लोगों से कहा, "वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की मेरी महिमा हो।
[24] मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जब तक गेहूँ का दाना मिट्टी में पड़कर मर नहीं जाता, तब तक वह अकेला रहता है। जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है।
[25] जो अपने जीवन को प्रिय जानता है वह उसे खो देता है। जो इस जगत में अपने जीवन को अप्रिय जानता है, वह अनन्त जीवन के लिए उसकी रक्षा करेगा।
[26] यदि कोई मेरी सेवा करे, तो मेरे पीछे चल पड़े, और जहाँ मैं हूँ, वहाँ मेरा सेवक भी होगा। अगर कोई मेरी सेवा करे, तो पिता उसका आदर करेंगे।
[27] अब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिए अब मैं क्या कहूँ?
[28] पिता, मुझे इस घड़ी से बचाइए। परन्तु मैं तो इसी कारण इस समय तक पहुँचा हूँ। पिता, अपने नाम की महिमा कीजिए।" तब यह आकाशवाणी हुई, "मैंने उसकी महिमा की है, और फिर भी करूँगा।"
[29] तब जो लोग खड़े हुए सुन रहे थे, उन्हों ने कहा कि बादल गरजा, दूसरों ने कहा, "कोई स्वर्गदूत उन से बोला।"
[30] इस पर यीशु ने कहा, "यह शब्द मेरे लिए नहीं, परन्तु तुम्हारे लिए आया है।
[31] अब इस जगत का न्याय होता है। इस जगत का अधिकारी निकाल दिया जाएगा।
[32] यदि मैं पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा।"
[33] ऐसा कहकर उन्हों ने यह बतला दिया, कि वह कैसी मौत से मरेंगे।
[34] यह सुनकर लोगों ने उन से कहा, "हम ने मज़हब की यह बात सुनी है, कि मसीह हमेशा रहेंगे, फिर आप क्यों कहते हैं कि मनुष्य के पुत्र को ऊँचे पर चढ़ाया जाना ज़रुरी है? यह मनुष्य का पुत्र कौन है?"
[35] यीशु ने उन से कहा, "ज्योति अब थोड़ी देर तक तुम्हारे बीच में है।
[36] जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है तब तक चले चलो, ऐसा न हो कि अन्धकार तुम्हें आ घेरे। जो अन्धकार में चलता है वह नहीं जानता कि किधर जाता है। जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है, ज्योति पर विश्वास करो कि तुम ज्योति की सन्तान हो जाओ।" ये बातें कहकर यीशु चले गये और उन से छिपे रहे।
[37] यीशु ने उन लोगों के सामने इतने चिन्ह दिखाए, तौभी उन्हों ने उन पर विश्वास न किया,
[38] ताकि यशायाह भविष्यद्वक्ता का वह वचन पूरा हो जो उसने कहा, "प्रभु, हमारे समाचार को किसने माना है? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?"
[39] इस कारण वे विश्वास न कर सके, क्योंकि यशायाह ने फिर कहा,
[40] कि उसने उनकी आँखें अन्धी, और उनका मन कठोर किया है, कहीं ऐसा न हो, कि वे आँखों से देखें, मन से समझें, मुड़ें और मैं उन्हें ठीक करूँ।
[41] यशायाह ने ये बातें इसलिए कहीं क्योंकि उसने यीशु की महिमा देखी थी, और उसने उनके विषय में बातें की थीं।
[42] फिर भी अधिकारियों में से भी कई लोगों ने उन पर विश्वास किया, लेकिन फ़रीसियों के कारण खुले आम नहीं मानते थे, ऐसा न हो कि आराधनालय में से निकाले जाएँ।
[43] क्योंकि मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।
[44] यीशु ने पुकार कर कहा, "जो मुझ पर भरोसा करता है, वह मुझ पर नहीं, बल्कि मेरे भेजने वाले परमेश्वर पर भरोसा करता है।
[45] जो मुझे देखता है, वह मेरे भेजने वाले परमेश्वर को देखता है।
[46] मैं जगत में ज्योति बनकर आया हूँ ताकि जो कोई मुझ पर विश्वास करे, वह अन्धकार में न रहे।
[47] यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता। क्योंकि मैं दुनिया को दोषी ठहराने के लिए नहीं, परन्तु इसका उद्धार करने के लिए आया हूँ।
[48] जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें स्वीकार नहीं करता है, उसको दोषी ठहराने वाला तो एक हैः अर्थात् वचन, जो मैंने कहा है। वही आखिरी दिन में उसे दोषी ठहराएगा।
[49] क्योंकि ये बातें मैंने अपनी ओर से नहीं कहीं, लेकिन पिता जिन्होंने मुझे भेजा और आज्ञा दी है कि मैं क्या-क्या कहूँ।
[50] मैं जानता हूँ कि पिता की आज्ञा हमेशा की जिऩ्दगी (अनन्त जीवन) है। इसलिए मैं वैसा ही बोलता हूँ जैसा पिता ने मुझ से कहा है।"