[1] "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जो कोई दरवाज़े से भेड़शाला में प्रवेश नहीं करता, परन्तु दूसरे किसी रास्ते से प्रवेश करता है, वह चोर और डाकू है।
[2] लेकिन जो दरवाज़े से भीतर प्रवेश करता है, वह भेड़ों का चरवाहा है।
[3] उसके लिए द्वारपाल द्वार खोल देता है, और भेड़ें उसकी आवाज़ सुनती हैं। वह अपनी भेड़ों को नाम ले लेकर बुलाता है और बाहर ले जाता है।
[4] वह अपनी सब भेड़ों को बाहर निकाल लेता है, और उनके आगे आगे चलता है, और भेड़ें उसके पीछे चलती हैं, क्योंकि वे उसकी आवाज़ पहचानती हैं।
[5] वे पराये व्यक्ति के पीछे नहीं जाएँगी, लेकिन उससे भागेंगी, क्योंकि वे परायों का आवाज़ नहीं पहचानती।"
[6] यीशु ने उन से यह दृष्टान्त कहा, परन्तु वे न समझे कि वह उन से क्या कहना चाहते हैं।
[7] तब यीशु ने उन से फिर कहा, "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि भेड़ों का ढरवाज़ा मैं हूँ।
[8] जितने मुझ से पहले आए, वे सब चोर और डाकू हैं, परन्तु भेड़ों ने उनकी न सुनी।
[9] द्वार में हूँ। यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करेगा तो मुक्ति पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
[10] चोर किसी और काम के लिए नहीं, लेकिन केवल चोरी करने और घात करने और नाश करने के लिए आता है। मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ।
[11] अच्छा चरवाहा मैं हूँ, अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिए अपना प्राण देता है।
[12] मज़दूर जो न चरवाहा है, न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है। भेड़िया उन्हें पकड़ता और तित्तर-बित्तर कर देता है।
[13] वह इसलिए भाग जाता है कि वह मज़दूर है। उसे भेड़ों की फ़िक्र नहीं होती है।
[14] अच्छा चरवाहा मैं हूँ। जिस तरह पिता मुझे जानते हैं, उसी तरह में पिता को जानता हूँ।
[15] मैं अपनी भेड़ों को भी उसी तरह जानता हूँ, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं। मैं भेड़ों के लिए अपनी जान देता हूँ।
[16] मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं। मुझे उनको भी लाना ज़रुरी है। वे मेरा आवाज़ सुनेंगी, तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा।
[17] पिता इसलिए मुझ से प्रेम रखते हैं क्योंकि मैं अपना प्राण देता हूँ, ताकि उसे फिर ले लूँ।
[18] कोई मेरा प्राण मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे खुद ही देता हूँ। मुझे उसे देने का भी अधिकार है, और उसे वापस लेने का भी अधिकार है। यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है।
[19] इन बातों के कारण यहूदियों में फिर फूट पड़ी।
[20] उन में से बहुत से लोग कहने लगे कि यीशु में दुष्टात्मा है, और वह पागल है। उसकी क्यों सुनते हो?
[21] अन्य लोगों ने कहा, "ये बातें ऐसे मनुष्य की नहीं जिसमें दुष्टात्मा हो। क्या दुष्टात्मा अन्धों की आँखें खोल सकती है?
[22] यरूशलेम में समर्पण-पर्व हुआ, और जाड़े की ऋतु थी।
[23] यीशु मन्दिर में सुलेमान के ओेसारे में टहल रहे थे।
[24] तब यहूदियों ने उन्हें आकर घेर लिया और पूछा, "आप हमें कब तक दुविधा में रखेंगे? यदि आप मसीह हैं, तो हमसे साफ़ कह दें।"
[25] यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं तुम से कह चुका हूँ, लेकिन तुम मानते ही नहीं। जो काम मैं अपने पिता के नाम से करता हूँ वे ही मेरे गवाह हैं।
[26] तुम इसलिए विश्वास नहीं करते, क्योंकि तुम मेरी भेड़ों में से नहीं हो।
[27] मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ। वे मेरी बातें मानती हैं।
[28] मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ, और वे कभी बर्बाद न होंगी, न ही कोई उन्हें मेरे हाथों से छीन लेगा।
[29] मेरे पिता ने उन्हें मुझ को दिया है। मेरे पिता सब से बड़े हैं। कोई उन्हें पिता के हाथों से छीन नहीं सकता।
[30] मैं और पिता एक हैं।"
[31] यह नुकर यहूदियों ने यीशु को पत्थरवाह करने के लिए फिर पत्थर उठाए।
[32] तब यीशु ने उन से कहा, "मैंने तुम्हें अपने पिता की ओर से बहुत से भले काम दिखाए हैं, उन में से किस काम के लिए तुम मुझे पत्थर मारते हो?"
[33] यहूदियों ने उन्हें उत्तर दिया, "भले काम के लिए हम आपको पत्थरवाह नहीं करते, लेकिन परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिए कि आप मनुष्य होकर अपने आपको परमेश्वर बनाते हैं।"
[34] यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, "क्या तुम्हारी धार्मिक किताब में नहीं लिखा है कि मैंने कहा, तुम ईश्वर हो?
[35] परमेश्वर ने उन्हें ईश्वर कहा, जिनके पास परमेश्वर का वचन पहुँचा (और पवित्र बाइबल की बात लोप नहीं हो सकती),
[36] और जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है, उससे तुम कहते हो कि तुम निन्दा करते हो। क्योंकि मैंने कहा, कि 'मैं परमेश्वर का बेटा हूँ।'
[37] यदि मैं अपने पिता के काम नहीं करता, तो मेरा विश्वास न करो।
[38] परन्तु यदि में करता हूँ, तो चाहे मेरा विश्वास न भी करो, लेकिन उन कामों पर विश्वास करो, ताकि तुम जानो, और समझो कि पिता मुझ में हैं, और मैं पिता में हूँ।"
[39] तब उन्हों ने फिर यीशु को पकड़ने की कोशिश की, परन्तु वह उनके हाथ से निकल गए।
[40] उसके बाद वह यरदन के पार उस स्थान पर चले गये, जहाँ यूहन्ना पहले बपतिस्मा दिया करता था, और वहीं रहे।
[41] कई लोग उनके पास आकर कहते थे कि यूहन्ना ने तो कोई चिन्ह नहीं दिखाया, परन्तु जो कुछ यूहन्ना ने यीशु के विषय में कहा था, वह सब सच था।
[42] और वहाँ बहुत से लोगों ने यीशु पर विश्वास किया।