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[1] आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था।

[2] यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।

[3] सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ। जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

[4] उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की रोशनी थी।

[5] रोशनी अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।

[6] एक मनुष्य परमेश्‍वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिसका नाम यूहन्ना था।

[7] वह गवाही देने आया कि ज्योति (रोशनी) की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्‍वास लाएँ।

[8] वह स्वयं तो रोशनी न था, परन्तु उस रोशनी की गवाही देने के लिए आया था।

[9] सच्ची रोशनी जो हर एक इन्सान को रोशनीमय करती है, दुनिया में आने वाली थी।

[10] यीशु जगत में थे, और जगत उनके द्वारा उत्पन्न हुआ। जगत ने उन्हें नहीं पहचाना।

[11] वह अपने घर आए और उनके अपनों ने उन्हें नहीं अपनाया।

[12] परन्तु जितनों ने उन्हें अपनाया, यीशु ने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन लोगों को जो उनके नाम पर विश्‍वास रखते हैं।

[13] वे न तो खून से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं।

[14] और वचन ने देह धारण की और कृपा और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में आकर रहा, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।

[15] यूहन्ना ने उनके बारे में गवाही दी और पुकारकर कहा, "यह वही हैं, जो मेरे बाद आ रहे हैं, वह मुझ से बढ़कर हैं क्योंकि वह मुझ से पहले थे।"

[16] क्योंकि उनकी परिपूर्णता से हम सब ने हासिल किया, अर्थात् अनुग्रह (कृपा) के ऊपर अनुग्रह।

[17] नियमशास्त्र मूसा के द्वारा दिया गया, परन्तु कृपा, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची।

[18] परमेश्‍वर को किसी ने कभी नहीं देखा, केवल 'एकलौते पुत्र' ने जो पिता की गोद में (पिता के साथ) हैं, परमेश्‍वर को प्रगट किया।

[19] यूहन्ना की गवाही यह है, कि जब यहूदियों ने यरूशलेम से पुरोहितों और लेवियों को उससे यह पूछने के लिए भेजा कि वह कौन है,

[20] तो उसने यह मान लिया कि वह मसीह नहीं है।

[21] तब उन्हों ने उससे पूछा, "तो फिर तुम कौन हो? क्या तुम एलिय्याह हो?" उसने उत्तर दिया, "नहीं।" "तो क्या तुम कोई भविष्यद्वक्‍ता हो?" उसने उत्तर दिया, "नहीं"।

[22] तब उन्हों ने उससे फिर पूछा, "तो तुम हो कौन? ताकि हम अपने भेजने वालों को जवाब दें, तुम अपने विषय में क्या कहते हो?"

[23] उसने कहा, जैसा यशायाह भविष्यद्वक्‍ता ने कहा है, "मैं जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द हूँ, 'प्रभु का मार्ग तैयार करो।'"

[24] ये सवाल पूछने वाले लोग फ़रीसियों की ओर से भेजे गए थे।

[25] आखिर में उन लोगों ने उससे पूछा, "यदि तुम न मसीह हो, और न एलिय्याह, और न कोई भविष्यद्वक्‍ता, तो फिर बपतिस्मा क्यों देते हो?"

[26] यूहन्ना ने उनको उत्तर दिया, "मैं तो पानी से बपतिस्मा हूँ परन्तु तुम्हारे बीच में एक व्यक्‍ति हैं, जिन्हें तुम नहीं जानते

[27] जिनकी सेवकाई आरम्भ होने वाली है। वह मुझ से श्रेष्ठ हैं। उनकी जूती का बन्ध मैं खोलने के योग्य नहीं।"

[28] ये बातें यरदन के पार बैतनिय्याह में हुईं, जहाँ यूहन्ना बपतिस्मा देता था।

[29] दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, "देखो, यही परमेश्‍वर के मेम्ने हैं, जो दुनिया के गुनाह उठा ले जाते हैं।

[30] यह वही हैं, जिनके विषय में मैंने कहा था कि एक पुरुष मेरे बाद आएँगे जो मुझ से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वह मुझ से पहले थे।

[31] मैं तो उन्हें पहचानता न था। मैं इसलिए पानी से बपतिस्मा देता आया हूँ ताकि वह इस्राएल पर प्रगट हो जाएँ।"

[32] यूहन्ना ने यह गवाही दी, "मैंने आत्मा को फ़ाख्ते के समान आसमान से उतरते देखा था, और वह उन पर ठहर गया था।

[33] मैं तो उन्हें पहचानता नहीं था, लेकिन जिन्होंने मुझे पानी से बपतिस्मा देने को भेजा था, उन्हीं ने मुझ से कहा था, कि जिस पर तुम आत्मा को उतरते और ठहरते देखो, वही पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देने वाले हैं।

[34] और मैंने देखा, और गवाही दी है कि यही परमेश्‍वर के बेटे हैं।

[35] दूसरे दिन फिर यूहन्ना और उसके शिष्यों में से दो जन वहाँ खड़े थे।

[36] तब यूहन्ना ने यीशु को देखकर कहा, "देखो, यह परमेश्‍वर के मेम्ने हैं।"

[37] वे दोनों शिष्य यूहन्ना की यह बात सुनकर यीशु के पीछे हो लिए।

[38] यीशु ने उनको अपने पीछे आते हुए देखा और उन से कहा, "तुम किसकी खोज में हो?" उन्हों ने यीशु से कहा, गुरुजी आप कहाँ रहते हैं?" यीशु ने उन से कहा, "चलकर देख लो।"

[39] तब उन लोगों ने आकर उनके रहने की जगह देखी, और वे उस दिन उन्हीं के साथ रहे। उस समय शाम के तकरीबन चार बजे थे।

[40] उन दोनों में से जो यूहन्ना की बात सुनकर यीशु के साथ चल पड़े थे, एक शमौन पतरस का भाई, अन्द्रियास था।

[41] उसने पहले अपने सगे भाई शमौन से मिलकर कहा, कि हमको ख्रिस्तुस अर्थात् मसीह मिल गए हैं।

[42] वह उसे यीशु के पास लाया। यीशु ने उस को देखकर कहा, "तुम तो यूहन्ना के पुत्र शमौन हो, तुम अब से काइफ़ा अर्थात् पतरस कहलाओगे।"

[43] दूसरे दिन यीशु ने गलील को जाना चाहा। उन्हों ने फ़िलिप्पुस से मिलकर कहा, "मेरे पीछे आओ।"

[44] फ़िलिप्पुस, अन्द्रियास और पतरस के नगर बैतसैदा का निवासी था।

[45] फ़िलिप्पुस ने नतनएल से मिलकर उससे कहा, "जिनका वर्णन मूसा ने नियमशास्त्र में और भविष्यद्वक्‍ताओं की पुस्तकों में किया है, वह हमको मिल गये। वह यूसुफ़ के पुत्र, यीशु नासरी हैं।"

[46] नतनएल ने उससे कहा, "क्या कोई भी अच्छी वस्तु नासरत से निकल सकती है?" फ़िलिप्पुस ने उत्तर दिया, "चलकर देख लो।"

[47] यीशु ने नतनएल को अपनी ओर आते देख कर उसके विषय में कहा, "देखो, यह सचमुच इस्राएली है, इस में कपट नहीं।"

[48] नतनएल ने उन से कहा, "आप मुझे कहाँ से जानते हैं?" यीशु ने उसको उत्तर दिया, "इस से पहले कि फ़िलिप्पुस ने तुम्हें बुलाया, जब तुम अंजीर के पेड़ के नीचे थे, तब मैंने तुम्हें देखा था।"

[49] नतनएल ने उन्हें उत्तर दिया, "हे गुरु, आप परमेश्‍वर के बेटे हैं। आप इस्राएल के महाराजा हैं।"

[50] यीशु ने उसको जवाब दिया, "मैंने जो तुम से कहा, कि मैंने तुम्हें अंजीर के पेड़ के नीचे देखा, क्या तुम इसलिए विश्‍वास करते हो? तुम इस से बड़े-बड़े काम देखोगे।"

[51] यीशु ने यह भी कहा, "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और परमेश्‍वर के स्वर्गदूतों को उतरते चढ़ते और मनुष्य के पुत्र के ऊपर उतरते देखोगे।"

यूहन्ना सुसमाचार — Chapters