[1] सप्ताह के पहले दिन मरियम मगदलीनी भोर को जब अँधेरा ही था, कब्र पर आयी। उसने पत्थर को कब्र से हटा हुआ देखा।
[2] तब वह दौड़ कर गयी और शमौन पतरस और उस दूसरे शिष्य के पास जिससे यीशु प्रेम रखते थे आकर कहा, "वे प्रभु को कब्र में से निकाल ले गए हैं। हम नहीं जानते, कि उन्हें कहाँ रख गया है।"
[3] तब पतरस और वह दूसरा शिष्य निकलकर कब्र की ओर चले।
[4] दोनों साथ-साथ दौड़ रहे थे, परन्तु दूसरा शिष्य पतरस से आगे बढ़कर कब्र पर पहले पहुँचा।
[5] उसने झुककर कपड़े पड़े देखे, फिर भी वह भीतर न गया।
[6] तब शमौन पतरस उसके बाद पहुँचा और कब्र के भीतर गया। उसने भी कपड़े पड़े देखे।
[7] उसने वह अँगोछा जो यीशु के सिर से बन्धा हुआ था, कपड़ों के साथ पड़ा हुआ नहीं, परन्तु अलग एक जगह लपेटा हुआ देखा।
[8] दूसरा शिष्य भी जो कब्र पर पहले पहुँचा था, भीतर गया और उसने देखकर विश्वास किया।
[9] वे अब तक पवित्रशास्त्र (बाइबल) की वह बात न समझते थे कि यीशु को मरे हुओं में से जी उठना होगा।
[10] उसके बाद ये शिष्य अपने घर लौट गए,
[11] परन्तु मरियम रोती हुई कब्र के पास ही खड़ी रही।
[12] उसने रोते-रोते कब्र की ओर झुककर दो स्वर्गदूतों को उज्जवल कपड़े पहने हुए, एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने बैठे देखा, जहाँ पहले यीशु का शव पड़ा था।
[13] उन्हों ने उससे कहा, "महिला, तुम क्यों रोती हो?" उसने उन से कहा, "वे मेरे स्वामी को उठा ले गए और मैं नहीं जानती कि उन्हें कहाँ रखा है।"
[14] यह कहकर वह मुड़ी और उसने यीशु को खड़े देखा, लेकिन न पहचाना कि यह यीशु हैं।
[15] यीशु ने उससे कहा, "हे महिला, तुम क्यों रोती हो? किसको ढूँढती हो?" उसने माली समझकर उन से कहा, "महाराज, यदि आप ने उसे उठा लिया है तो मुझे बताओ कि उन्हें कहाँ रखा है ताकि मैं उन्हें ले जाऊँ।"
[16] यीशु ने उससे कहा, "मरियम!" उसने पीछे मुड़कर कहा, "गुरु जी"
[17] यीशु ने उससे कहा, "मुझे मत छूओ, क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया। मेरे भाइयों के पास जाकर उन से कह दो, कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूँ।"
[18] मरियम मगदलीनी ने जाकर शिष्यों को बताया कि मैंने प्रभु को देखा है और उन्हों ने मुझ से ये बातें कहीं।
[19] वह सप्ताह का पहला दिन था और शाम का समय था। यहूदियों के डर के कारण शिष्यों ने कमरे के दरवाज़े बन्द कर रखे थे। तब यीशु आए और बीच में खड़े होकर उन से बोले, "तुम्हें शान्ति मिले।"
[20] यह कहकर यीशु ने अपना ने हाथ और अपनी छाती उनको दिखाई। तब शिष्य प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।
[21] यीशु ने फिर उन से कहा, "तुम्हें शान्ति मिले। जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूँ।"
[22] यह कहकर यीशु ने उन पर फूँका और उन से कहा, "पवित्र आत्मा लो।
[23] जिनके गुनाह तुम माफ़ करो, उनके लिए वे माफ़ किए गए हैं। जिनके तुम रखो, वे रखे गए हैं।"
[24] उस समय जब यीशु आए तो बारह शिष्यों में से एक शिष्य थोमा, जो दिदुमुस कहलाता था, उनके साथ न था।
[25] जब अन्य शिष्य उससे कहने लगे कि हम ने प्रभु को देखा है, तब उसने उन से कहा, "जब तक मैं उनके हाथों में कीलों के छेद न देख लूँ, और कीलों के छेदों में अपनी उँगली न डाल लूँ और उनके पंजर में अपना हाथ न डाल लूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करुँगा।"
[26] आठ दिन के बाद जब उनके शिष्य घर के भीतर थे, तब थोमा भी उनके साथ था। दरवाजे बन्द थे। तब यीशु ने फिर आकर और बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।"
[27] उन्हों ने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देखो और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डालो और अविश्वासी नहीं, लेकिन विश्वासी बनो।"
[28] यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!"
[29] यीशु ने उससे कहा, "तुम ने तो मुझे देख कर विश्वास किया है। आशीषित वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।"
[30] यीशु ने और भी कई चिन्ह शिष्यों के सामने दिखाए, जो इस किताब में लिखे नहीं गए।
[31] परन्तु ये इसलिए लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर के बेटे, मसीह हैं और विश्वास करके उनके नाम से जीवन पाओ।