[1] इन बातों के बाद यहूदियों का एक त्यौहार हुआ जिसमें यीशु यरूशलेम को गये।
[2] यरूशलेम में भेड़-फाटक के पास एक कुण्ड है जो इब्रानी भाषा में बेतहसदा कहलाता है, और उसके पाँच ओसारे हैं।
[3] इन में बहुत से बीमार, अन्धे, लँगड़े और सूखे अंग वाले पानी के हिलने की आशा में पड़े रहते थे।
[4] क्योंकि नियुक्त समय पर परमेश्वर के स्वर्गदूत कुण्ड में उतरकर पानी को हिलाया करते थे। पानी हिलते ही जो कोई पहले उतरता था वह ठीक हो जाता था, चाहे उसकी कोई भी बीमारी क्यों न हो।
[5] वहाँ एक आदमी था जो अड़तीस साल से बीमारी में पड़ा था।
[6] यीशु ने उसे पड़ा हुआ देखकर और जानकर कि वह बहुत दिनों से इस हालत में पड़ा है, उससे पूछा, "क्या तुम ठीक होना चाहते हो?"
[7] उस बीमार ने यीशु को उत्तर दिया, "हे प्रभु, मेरे पास कोई मददगार नहीं है कि जब पानी हिलाया जाए, तो मुझे कुण्ड में उतारे। मेरे पहुँचते पहुँचते दूसरा मुझ से पहले उतर जाता है।"
[8] यीशु ने उससे कहा, "उठो, अपनी खाट उठाकर चलो।"
[9] वह मनुष्य तुरन्त अच्छा हो गया, और अपनी खाट उठाकर चलने फिरने लगा।
[10] वह सब्त का दिन था, इसलिए यहूदी उससे, जो ठीक हो गया था कहने लगे, "आज तो सब्त का दिन है, तुम्हें आज खाट उठानी जायज़ नहीं।"
[11] उसने उन्हें जवाब दिया, "जिसने मुझे अच्छा किया, उसी ने मुझ से कहा कि अपनी खाट उठाकर चलो।"
[12] उन्हों ने उससे पूछा, "वह कौन आदमी है जिसने तुम से कहा कि खाट उठाकर चलो?"
[13] जो अच्छा हो गया था, वह नहीं जानता था कि वह कौन है, क्योंकि उस जगह में भीड़ होने के कारण यीशु वहाँ से हट गये थे।
[14] इन बातों के बाद वह आदमी यीशु को मन्दिर में मिला, तब उन्हों ने उससे कहा, "देखो, तुम तो ठीक हो गये हो, फिर से गुनाह मत करना, ऐसा न हो कि इस से कोई भारी मुसीबत तुम पर आ पड़े।"
[15] उस आदमी ने जाकर यहूदियों से कह दिया कि जिसने मुझे अच्छा किया, वह यीशु हैं।
[16] इस कारण यहूदी यीशु को सताने लगे, क्योंकि वह ऐसे काम सब्त के दिन करते थे।
[17] इस पर यीशु ने उन से कहा, "मेरे पिता अब तक काम करते हैं, और मैं भी काम करता हूँ।"
[18] इस कारण यहूदी और भी अधिक उन्हें मार डालने की कोशिश करने लगे, क्योंकि वह न केवल सब्त के दिन की विधि को तोड़ते, लेकिन परमेश्वर को अपना पिता कह कर अपने आपको परमेश्वर के समान ठहराते थे।
[19] इस पर यीशु ने उन से कहा, "मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, पुत्र स्वयं कुछ नहीं कर सकता, केवल वही जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को पिता करते हैं, उन्हें पुत्र भी उसी तरह से करता है।
[20] क्योंकि पिताजी बेटे से प्रेम रखते हैं और जो-जो काम वह खुद करते हैं वह सब बेटे को दिखाते हैं। वह इन से भी बड़े काम उसे दिखाएँगे, ताकि तुम अचम्भा करो।
[21] क्योंकि जैसे पिता मरे हुओं को उठाते और जिलाते हैं, वैसे ही बेटा भी जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है।
[22] पिता किसी का इन्साफ़ भी नहीं करते, परन्तु इन्साफ़ करने का सब काम पिता ने पुत्र (यीशु) को सौंप दिया है,
[23] इसलिए कि सब लोग जैसे पिता का आदर करते हैं, वैसे ही पुत्र का भी आदर करें। जो बेटे का आदर नहीं करता, वह पिता का जिन्होंने बेटे को भेजा है, आदर नहीं करता।
[24] मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि जो मेरी शिक्षा सुनकर मेरे भेजने वाले परमेश्वर पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है। उस पर सज़ा का हुक्म नहीं होता, परन्तु वह मौत के पार होकर जीवन में दाखिल हो चुका है।
[25] मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि वह समय आता है, और अब है, जिसमें मुर्दे परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएँगे।
[26] क्योंकि जिस तरह से पिता अपने आप में जीवन रखते हैं, उसी तरह से उन्हों ने बेटे को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे,
[27] वरन् उन्हें इन्साफ़ करने का भी अधिकार दिया गया है इसलिए कि वह (यीशु) ही मनुष्य का पुत्र (इन्सान) भी हैं।
[28] इस से अचम्भा मत करो, क्योंकि वह समय आता है कि जितने कब्रों में हैं, पुत्र का शब्द सुनकर जी उठेंगे।
[29] जिन्होंने भलाई की है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिए जी उठेंगे, और जिन्होंने बुराई की है वे दण्ड के पुनरुत्थान के लिए जी उठेंगे।
[30] मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता। जैसा मैं सुनता हूँ, वैसा ही न्याय करता हूँ। मेरा न्याय सच्चा है, क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, लेकिन अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूँ।
[31] यदि मैं स्वयं ही अपनी गवाही दूँ तो मेरी गवाही सच्ची नहीं।
[32] परमेश्वर हैं जो मेरी गवाही देते हैं, और मैं जानता हूँ कि उनकी हर गवाही सच्ची है।
[33] तुम ने यूहन्ना से पूछा और उसने सच्चाई की गवाही दी है।
[34] परन्तु मैं अपने बारे में इन्सान की गवाही नहीं चाहता, तौभी मैं ये बातें इसलिए कहता हूँ कि तुम्हें मुक्ति मिले।
[35] यूहन्ना तो जलता और चमकता हुआ दीपक था, और तुम्हें कुछ देर तक उसकी रोशनी में मगन होना अच्छा लगा।
[36] लेकिन मेरे पास जो गवाही है वह यूहन्ना की गवाही से बड़ी है, क्योंकि जो काम पिता ने मुझे पूरा करने को सौंपा है, अर्थात् यही काम जो मैं करता हूँ, वे काम इस बात के गवाह हैं कि पिता ने मुझे भेजा है।
[37] पिता, जिन्होंने मुझे भेजा है, उन्हों ने मेरी गवाही दी है। तुम ने न कभी उनका शब्द सुना, और न उनका रूप देखा है।
[38] तुम उनकी बातों को मन में बनाकर नहीं रखते, क्योंकि जिसे उन्हों ने भेजा है उस पर विश्वास नहीं करते हो।
[39] तुम बाइबल में ढूँढते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है। ये वे बातें हैं, जो मेरी गवाही देते हैं।
[40] फिर भी तुम जीवन पाने के लिए मेरे पास आना नहीं चाहते।
[41] मैं मनुष्यों से इज़्ज़त नहीं चाहता।
[42] लेकिन मैं तुम्हें जानता हूँ कि तुम में परमेश्वर का प्यार नहीं।
[43] मैं अपने पिता के नाम से आया हूँ, लेकिन तुम मुझे ग्रहण नहीं करते। यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो तुम उसे ग्रहण कर लोगे।
[44] तुम कैसे विश्वास कर सकते हो? तुम तो एक दूसरे से इज़्ज़त चाहते हो, लेकिन वह इज़्ज़त जो सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते।
[45] यह न समझो कि मैं पिता के सामने तुम पर दोष लगाऊँगा। तुम पर दोष लगाने वाला तो है, अर्थात् मूसा, जिस पर तुम ने भरोसा रखा है।
[46] क्योंकि अगर तुम मूसा पर भरोसा करते, तो मेरा भी भरोसा करते, इसलिए कि उसने मेरे विषय में लिखा है।
[47] परन्तु यदि तुम उसकी लिखी हुई बातों पर भरोसा नहीं करते, तो मेरी बातों पर कैसे भरोसा करोगे?"