[1] "अंगूर की सच्ची लता मैं हूँ और मेरे पिता किसान हैं।
[2] जो डाली मुझ में हे, और फल नहीं लाती, उन्हें वह काट डालते हैं। जो फल लाती है, उसे वह छाँटते हैं ताकि और फले।
[3] तुम उन बातों के कारण जो मैंने तुम से कहीं हैं, शुद्ध हो।
[4] तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में। जैसे डाली यदि अंगूर की लता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही यदि तुम भी मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।
[5] मैं अंगूर की लता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल लाता है। मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।
[6] यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली के समान फेंक दिया जाता है और सूख जाता है। लोग उन डालियों को बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।
[7] यदि तुम मुझ में बने रहे। और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो माँगो, वह तुम्हारे लिए हो जाएगा।
[8] मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत फल लाओ, तब ही तुम मेरे शिष्य ठहरोगे।
[9] जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वेसे ही मैंने भी तुम से प्रेम रखा। मेरे प्रेम में बने रहो।
[10] यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे, जैसा कि मैंने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उनके प्रेम में बना रहता हूँ।
[11] मैंने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं, ताकि मेरी खुशी तुम में बनी रहे, और तुम्हारी खुशी पूरी हो जाए।
[12] मेरा आदेश यह है कि जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही प्रेम तुम भी एक दूसरे से रखो।
[13] इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने दोस्तों के लिए अपनी जान दे।
[14] जिन बातों का मैं तुम्हें आदेश देता हूँ, उन्हें यदि तुम करते हो, तो तुम मेरे दोस्त हो।
[15] अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है। मैंने तुम्हें दोस्त कहा है, क्योंकि मैंने जो बातें अपने पिता से सुनीं, वे सब तुम्हें बता दीं।
[16] तुम ने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना है और तुम्हें ठहराया है ताकि तुम जाकर फल लाओ, और तुम्हारा फल बना रहे ताकि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से माँगो, वह तुम्हें दे।
[17] इन बातों की आज्ञा मैं तुम्हें इसलिए देता हूँ ताकि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो।
[18] यदि संसार तुम से दुश्मनी रखता है, तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहले मुझ से भी दुश्मनी रखी। संसार अपनों से प्रीति रखता है।
[19] यदि तुम संसार के होते, तो वह तुम से प्रीति रखता। तुम संसार के नहीं, बल्कि मैंने तुम्हें संसार में से चुन लिया है इसी लिए संसार तुम से दुश्मनी रखता है।
[20] जो बात मैंने तुम से कहीं थीं कि दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता, उसे याद रखो। अगर उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएँगे। अगर उन्हों ने मेरी बात मानी, तो तुम्हारी भी मानेंगे।
[21] परन्तु यह सब कुछ वे मेरे नाम के कारण तुम्हारे साथ करेंगे, क्योंकि वे मेरे भेजने वाले परमेश्वर को नहीं जानते।
[22] अगर मैं न आता और उन से बातें न करता, तो वे दोषी न ठहरते। अब उन्हें उनके पाप के लिए कोई बहाना नहीं है।
[23] जो मुझ से दुश्मनी रखता है, वह मेरे पिता से भी दुश्मनी रखता है।
[24] यदि मैं उनके बीच वे काम न करता जो और किसी ने नहीं किए तो वे दोषी नहीं ठहरते। लेकिन अब उन्हों ने मुझे और मेरे पिता दोनों को देखा है, और दोनों से दुश्मनी की है।
[25] यह इसलिए हुआ ताकि वह वचन पूरा हो जो उनकी धर्म पुस्तक में लिखा है कि, 'उन्हों ने मुझ से बेकार में बैर किया।'
[26] परन्तु जब वह सहायक आएगा, जिसे मैं तुम्हारे पास पिता की ओर से भेजूँगा, अर्थात् सच्चाई का आत्मा जो पिता की ओर से निकलता है, तो वह मेरी गवाही देगा।
[27] तुम भी गवाह हो, क्योंकि तुम आरम्भ से मेरे साथ रहे हो।"