[1] हे प्रियो, इसलिए कि हमें कीमती वायदे (प्रतिज्ञाएँ) मिले हैं, तो आओ हम उन सब बातों (मलिनता) से अपने आपको शुद्ध करें जो हमारी देह और आत्मा को अशुद्ध कर सकती हैं। इस तरह से हम परमेश्वर का भय रखते हुए पवित्रता की ओर बढ़ें।
[2] हमारे लिए अपने दिलों को खुला रखो, हम ने न किसी का बुरा किया, न किसी को बर्बाद किया और न ही किसी से फ़ायदा उठाया।
[3] मैं तुम्हें दोषी ठहराने के लिए यह नहीं कह रहा हूँ। क्योंकि मैं पहले ही से यह कह चुका हूँ कि तुम हमारे दिल में इस तरह बस गए हो, कि हम तुम्हारे साथ जीने और मरने को तैयार हैं।
[4] मुझे तुम पर काफ़ी भरोसा है और घमण्ड भी। हमारी सारी परेशानियों (कष्टों, सताव) के बावजूद तुम ने हमें साहस दिया और खुश किया।
[5] जब हम मकिदुनिया आए थे, हमारी देह को कुछ सुकून नहीं मिला। हम चारों तरफ़ से सताव (परेशानियों) से घिरे हुए थे - बाहर संघर्ष था और मन में डर।
[6] लेकिन परमेश्वर ने जो हताश हुए लोगों की हिम्मत बढ़ाते हैं, तीतुस के आने पर हमारी हिम्मत बढ़ायी।
[7] सिर्फ़ उसके आने ही से हमें प्रोत्साहन नहीं मिला, लेकिन इस कारण भी कि तुम ने उसका साहस बढ़ाया था। मेरी खुशी और ज़्यादा इसलिए भी बढ़ गयी, क्योंकि उसने हमारे प्रति तुम्हारी लगन, तुम्हारे दुख और हमारे लिए चिन्ता के बारे में भी खबर दी।
[8] क्योंकि हालांकि मैंने अपने पहले खत से तुम्हें शोकित किया था, लेकिन उससे पछताता नहीं, जैसा कि पहले पछताता था। क्योंकि मैं देखता हूँ कि उस पत्र से तुम्हें जो शोक हुआ वह थोड़ी देर के लिए ही था।
[9] अब मैं खुश हूँ लेकिन इसलिए नहीं कि तुम्हें शोक पहुँचा, लेकिन इसलिए कि तुम ने उस शोक की वजह से मन बदला। क्योंकि तुम्हारा शोक परमेश्वर की इच्छा के अनुसार था कि हमारी तरफ़ से तुम्हें किसी बात में नुकसान न पहुँचे।
[10] जो शोक (दुख) परमेश्वर की ओर से होता है, वह मन बदलाव (पश्चाताप) लाता है और इसका परिणाम उद्धार है। ऐसा शोक हमारे अंदर पछतावा (आत्मग्लानि) नहीं उत्पन्न करता है, लेकिन दुनियावी शोक मौत (बर्बादी) लाता है।
[11] देखो, इस परमेश्वर की ओर से शोक (परमेश्वर भक्ति शोक) ने तुम्हारे जीवन में कितना बदलाव पैदा किया है - ऐसी तत्परता अर्थात् अपने को निर्दोष साबित करने की चाह, कितना रोष, कितना डर, कितनी लालसा, कितना जोश तथा सज़ा देने (न्याय) की इच्छा उत्पन्न हो गयी है। तुम ने इस तरह से यह साबित कर दिया है, कि तुम इस बात में निर्दोष हो।
[12] तुम्हें लिखे जाने में मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि किसने अन्याय किया, किसके साथ अन्याय हुआ, इस पर गौर किया जाए। लेकिन यह कि परमेश्वर की निगाह में यह साफ़ दिख जाए कि तुम हमारे प्रति कितने गंभीर हो।
[13] इसलिए हमें तसल्ली मिली। इसके साथ ही तीतुस की खुशी देखकर हम और भी आनन्दित हो उठे, क्योंकि तुम सब से उसका जी हरा-भरा हो गया था।
[14] इसलिए कि यदि मैंने तुम्हारे बारे में उसके सामने कुछ घमण्ड दिखाया, तो शर्मिन्दा न हुआ। परन्तु जिस तरह से हम ने तुम से सब बातें सच-सच कह दी थीं, वैसे ही हमारा घमण्ड दिखाना तीतुस के सामने भी सच निकला।
[15] जब उसको तुम्हारे आज्ञाकारी होने की याद आती है कि कैसे तुम ने उसे आदर सम्मान से अपनाया, तो उसका तुम्हारे प्रति प्यार उमड़ पड़ता है।
[16] मुझे बहुत खुशी है, क्योंकि मैं तुम पर पूरा भरोसा रख सकता हूँ।