[1] इसलिए जब हम पर ऐसी दया (कृपा) हुयी, कि हमें यह सेवा मिली, तो हम हार नहीं मानते
[2] लेकिन हम ने शर्म के छिपे हुए कामों को छोड़ दिया है। हम न चालाकी से जीते हैं और न परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं। लेकिन हम सच्चाई को सामने रखकर, परमेश्वर के सामने (मौजूदगी में) हर एक इन्सान के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं।
[3] लेकिन यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा है तो यह बर्बाद हो जाने वाले लोगों के कारण है।
[4] उन विश्वास न करने वालों के लिए जिन की बुद्धि को इस दुनिया के ईश्वर ने अँधा कर दिया है, ताकि मसीह जो परमेश्वर के प्रतिरूप हैं, उनके प्रकाशमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमक सके।
[5] क्योंकि हम अपना नहीं लेकिन यीशु मसीह का संदेश देते हैं कि वह प्रभु हैं। हम अपने बारे में बताते हैं कि हम यीशु मसीह के कारण तुम्हारे सेवक हैं।
[6] इसलिए कि परमेश्वर ही हैं, जिन्होंने कहा, "अँधेरे में रोशनी हो जाए।" उन्हों ने ही इस रोशनी को हमारे दिलों में चमकाया, ताकि हम प्रभु यीशु में परमेश्वर के व्यक्तित्व (स्वभाव और चरित्र आदि) को देख सकें।
[7] हमारे पास यह खज़ाना मिट्टी के बरतनों में है, ताकि यह मालूम पड़ जाए कि यह असाधारण सामर्थ्य परमेश्वर की ओर से है और हम इसके स्त्रोत नहीं हैं।
[8] हम सभी ओर से सताव सह रहे हैं, लेकिन पिस नहीं गए। उलझन में तो पड़ते हैं, लेकिन निराश नहीं होते।
[9] हमें सताया तो जाता है, लेकिन त्यागे नहीं जाते। गिराए तो जाते हैं, लेकिन मिट नहीं जाते।
[10] जिस तरह से यीशु मारे गए, उसी तरह हर समय हम मारे जाने के खतरे में रहते हैं, ताकि यीशु (जो जी उठे) का जीवन हमारी देह से दिखायी देता रहे।
[11] हम जीते जी हमेशा यीशु की वजह से मौत के हवाले किए जाते हैं, ताकि यीशु का जीवन हमारी मरणशील देह में प्रगट होता रहे।
[12] हम तो मौत का सामना करते रहते हैं, लेकिन तुम्हें आत्मिक लाभ होता है।
[13] इसलिए कि हम में वही विश्वास की आत्मा है जिसके बारे में लिखा है, "मैंने विश्वास किया, इसलिए मैंने कहा।" इस कारण हम भी विश्वास करते हैं, इसलिए बोलते हैं।
[14] क्योंकि हम जानते हैं कि जिन्होंने (परमेश्वर ने) प्रभु यीशु मसीह को जिलाया, वही हमें भी यीशु में जिलाएँगे। वह हमें तुम्हारे साथ अपनी उपस्थिति में खड़ा होने देंगे।
[15] सब कुछ तुम्हारे फ़ायदे के लिए ही है। जैसे-जैसे परमेश्वर का अनुग्रह ज़्यादा लोगों तक पहुँचता जाता है, धन्यवाद में भी बढ़ती होती जाती है। इस तरह से परमेश्वर की महिमा अधिक होती है।
[16] इसलिए हम हताश नहीं होते, हालांकि हमारी देह कमज़ोर होती जा रही है, फिर भी हमारा भीतरी जीवन (मनुष्यत्व) दिन प्रतिदिन नया (मज़बूत) होता जा रहा है।
[17] क्योंकि हमारा क्षण भर का कम सताव (दुख) हमारे लिए बहुत ज़रूरी और सदा काल की महिमा (शान, आदर, अधिकार) उत्पन्न करता जाता है।
[18] क्योंकि हम दिखने वाली बातों पर नहीं, लेकिन जो नहीं दिखता, उस पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं। क्योंकि देखी चीजें कुछ समय की हैं और जो दिख नहीं रहा है, वह सदा काल (हमेशा) के लिए है।