[1] हमें मालूम हैं कि तम्बू की तरह हमारी यह देह उतारी और लपेटी जाएगी। हमें परमेश्वर की ओर से एक नया घर (शरीर) मिलेगा। एक ऐसा घर जिसे हाथों से बनाया नहीं गया होगा, लेकिन अनन्तकालिक घर।
[2] इस तंबू में हम कराहते हैं और स्वर्गिक घर को पहनने के लिए लालायित रहते हैं।
[3] हम स्वर्गिक देह को ज़रूर पहनेंगे। हम मात्र देहरहित आत्मा नहीं होंगे।
[4] इस देह में हम बोझ से दबे कराहते रहते हैं। यह नहीं कि हम मर जाना चाहते हैं, ताकि इस पहनी हुयी देह को उतार सकें। लेकिन यह कि हम अपनी नयी देह को पहनना चाहते हैं, ताकि इस मरणहार देह को अमरता निगल ले।
[5] जिसने हमें इस उद्देश्य के लिए तैयार किया है, वह परमेश्वर हैं। उन्हीं ने हमें पवित्रात्मा बयाने में दिया है।
[6] इसलिए हम हमेशा निडर रहते हैं। हम जानते हैं कि जब हम इस धरती पर ज़िन्दा हैं तो हम (जी उठे) यीशु के साथ नहीं हैं।
[7] बिना देखे हुए सिर्फ़ भरोसा रखकर ही हम जीवित हैं।
[8] हम उमंग (साहस, हिम्मत) से भरे हुए हैं और हमारी चाह तो यह है कि इस देह से मुक्त हो जाएँ और प्रभु के साथ ही रहें।
[9] चाहे हम इस देह में हैं या नहीं, खास बात है - प्रभु को खुश करना।
[10] हम सभी को एक दिन प्रभु यीशु के इन्साफ़ के तख्त के सामने खड़े होना पड़ेगा, ताकि देह में किए गए अच्छे और बुरे कामों का हिसाब दें।
[11] इसलिए कि हम जानते हैं कि प्रभु के डर में जीना क्या है, हम लोगों के सामने सच्चाई रखते हैं। परमेश्वर और तुम्हें मालूम है कि इस में हमारी नियत क्या है।
[12] ऐसा कहकर हम तुम्हारी वाह-वाह की अपेक्षा नहीं कर रहे हैं लेकिन हम चाहते हैं कि तुम हमारे ऊपर घमण्ड कर सको, ताकि उनको जवाब दे सको जो दिल के भीतर की बातों के बजाए दिखावटी बातों पर मन लगाते हैं।
[13] यदि हम जोशीले हैं, तो परमेश्वर के लिए हैं। यदि हमारा मन ठिकाने पर है, तो इस से तुम्हें फ़ायदा है।
[14] मसीह का प्रेम हम को बेबस कर देता है। और हम इस बात से कायल हैं कि यीशु मर गए थे इसलिए हम भी अपने पुराने जीवन (परमेश्वर रहित जीवन) के लिए खत्म हो चुके हैं।
[15] और वह (यीशु) इसलिए सब के लिए मरे कि जो जीवित हैं, वे भविष्य में अपने लिए न जीएँ, लेकिन उनके (यीशु के) लिए जो उनके (लोगों के) लिए मरे और फिर से जी उठे।
[16] इसलिए अब से हम किसी को शरीर (दुनियावी दृष्टिकोण) के अनुसार नहीं समझेंगे। हालांकि हम ने मसीह को भी शरीर के अनुसार जाना था, लेकिन अब से ऐसा नहीं जानेंगे।
[17] इसलिए यदि कोई मसीह पर विश्वास ला चुका है, तो वह एक नयी रचना है। पुरानी बातें बीत गयी और सब बातें नई हो गई हैं (नया जीवन शुरू हो गया है)
[18] ये सभी बातें (नयी) परमेश्वर की ओर से हैं, जिन्होंने यीशु मसीह के द्वारा अपने साथ हमारा मेल कर लिया। उन्हीं ने हमें यह काम दिया कि हम दूसरे लोगों का सम्बन्ध परमेश्वर से करा दें।
[19] अर्थात् परमेश्वर ने मसीह में होकर अपने साथ दुनिया का मेल-मिलाप कर लिया और लोगों के अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाया और यही मेल (सम्बन्ध जोड़ने) के संदेश को देने का काम हमारे सुपुर्द कर दिया।
[20] इसलिए हम परमेश्वर के राजदूत हैं, मानो हम मसीह में होकर बोल रहे हैं, "परमेश्वर के साथ अच्छे सम्बन्ध बना लो।"
[21] जो (यीशु) पाप से अछूते थे, उन्हें परमेश्वर ने हमारे लिए पाप बना दिया, ताकि हम उन में होकर परमेश्वर की सच्चाई बन जाएँ।