[1] यीशु मसीह की सी नम्रता और दीनता से मैं तुम लोगों से बिनती करता हूँ - हालाँकि तुम्हारा यह भ्रम है कि व्यक्तिगत रीति से मैं डरपोक हूँ, लेकिन लिखी हुयी चिट्ठी से बहुत निडर दिखता हूँ।
[2] ठीक है, तुम में से जो लोग सोचते हैं कि हम सांसारिक तौर-तरीके के अनुसार जीते हैं, उन से मेरी बिनती है कि वे झूठे कठोर तरीके से पेश आने पर मजबूर न करें।
[3] क्योंकि हालांकि हम इन्सान (देह में) तो हैं, लेकिन हमारी लड़ाई का तरीका दुनियावी नहीं है।
[4] क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार दुनिया में इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार नहीं लेकिन किलों को (संसारिक सोच विचार के) तोड़ डालने और झूठे तर्क-वितर्क को बर्बाद करने के लिए परमेश्वर द्वारा सामर्थी हैं।
[5] इसलिए हम परमेश्वर के ज्ञान के विरोध में उठने वाली हर एक कल्पना और हर एक ऊँची बात का खण्डन करते हैं और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।
[6] जब तुम पूरी तरह से आज्ञा मानने के लिए तैयार हो, तब हम अनाज्ञाकारिता के हर एक काम को दण्डित करने के लिए तैयार रहते हैं।
[7] तुम्हारी आँखें बाहरी बातों पर हैं। यदि किसी को यह भरोसा है कि वह मसीह का है तो उसे यह भी जान लेना चाहिए कि जैसा वह मसीह का है, हम भी मसीह के हैं।
[8] तुम्हें लग सकता है कि प्रभु द्वारा दिए गए अधिकार के बारे में हम ज्य़ादा घमण्ड कर रहे हैं। लेकिन हमारा अधिकार तुम्हारी तरक्की के लिए है न कि नुकसान के लिए। इसलिए मैं अपने अधिकार के इस्तेमाल के बारे में शर्मिन्दा न होऊँगा।
[9] अपनी चिट्ठियों से मैं तुम्हें डरा नहीं रहा हूँ।
[10] क्योंकि कुछ कहते हैं, "उसकी चिट्ठियों में वह वज़नदार और ताकतवर दिखता है लेकिन उसके बोलने में कोई दम नहीं है। ऐसे व्यक्ति को यह जान लेना चाहिए कि जब हम आएँगे, तब उतनी ही प्रभावशाली रीति से बातें करेंगे, जैसा हम अपनी चिट्ठियों में लिखते हैं।
[11] जो ऐसा समझता है, वह यह जान रखे कि जैसे पीठ पीछे चिट्ठियों में हमारे वचन हैं, वैसे ही तुम्हारे सामने हमारे काम होंगे।
[12] क्योंकि हमें यह हिम्मत नहीं है कि हम अपने आपको उन में से ऐसे कुछ के साथ गिनें या अपनी तुलना उन से करें जो अपनी बड़ाई खुद करते हैं और अपने आपको आपस में नाप-तौलकर एक दूसरे से तुलना करके बेवकूफ़़ ठहरते हैं।
[13] हम सीमा से बाहर बिल्कुल घमण्ड नहीं करेंगे, लेकिन उसी सीमा तक जो परमेश्वर ने हमारे लिए ठहरायी है। इस सीमा में तुम भी शामिल हो और उसी के अनुसार घमण्ड भी करेंगे।
[14] क्योंकि हम अपनी सरहद (सीमा) से बाहर अपने आपको बढ़ाना नहीं चाहते जैसे कि तुम तक न पहुँचने की हालत में होता, वरन मसीह का सुसमाचार सुनाते हुए तुम तक पहुँच चुके हैं।
[15] हम सीमा से बाहर आवश्यकता से अधिक दूसरों की मेहनत पर घमण्ड नहीं करते, लेकिन हमें उम्मीद है कि जैसे-जैसे तुम्हारा विश्वास बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे हम अपनी सीमा के अनुसार तुम्हारी वजह से और भी बढ़ते जाएँगे।
[16] ताकि हम तुम्हारे पड़ोस के इलाकों तक सुसमाचार ले जा सकें और दूसरों के क्षेत्र में किए गए काम पर गर्व न करें।
[17] लेकिन जो गर्व करे, तो प्रभु पर करे।
[18] क्योंकि जो अपनी बड़ाई करता है वह नहीं, लेकिन जिसकी बड़ाई प्रभु करते हैं, वही स्वीकार किया जाता है।