[1] क्या मैं आज़ाद नहीं हूँ? क्या मैं प्रेरित नहीं हूँ? क्या मैंने प्रभु यीशु को नहीं देखा? क्या तुम मेरे कारण प्रभु के नहीं हो?
[2] यदि मैं दूसरों के लिए प्रेरित नहीं हूँ, तो कम से कम तुम्हारे लिए हूँ। तुम ही इस बात के सबूत हो कि मैं प्रभु का प्रेरित हूँ।
[3] जो लोग मेरे अधिकार के बारे में सवाल करते हैं, उनको मेरा यही उत्तर है।
[4] क्या हमें आर्थिक सहयोग लेने का अधिकार नहीं है?
[5] क्या हमें इस बात का अधिकार नहीं कि एक विश्वासिनी से विवाह करें, जिस तरह से दूसरे प्रेरित, प्रभु के भाई और पतरस (कैफ़ा) ने किया है।
[6] क्या सिर्फ़ बरनबास और मुझे अधिकार नहीं कि कमाई न करें?
[7] ऐसा कौन सा सैनिक है, जो बिना मज़दूरी (तनख्वाह) सेना में काम करता हो? ऐसा कौन है जो अंगूर की बारी तो लगाता है लेकिन उसके अंगूर नहीं खाता है? ऐसा कौन है जो भेड़ों की देख रेख तो करता है, लेकिन उनके दूध का इस्तेमाल नहीं करता है?
[8] क्या ये सब बातें मेरे दिमाग की उपज हैं, या नियमशास्त्र भी यही नहीं सिखाता?
[9] इसलिए कि मूसा की किताब में लिखा है, "जो बैल चक्की चलाता है उसको दाना खाने से मत रोकना।" क्या परमेश्वर को केवल बैलों की ही चिन्ता है?
[10] या क्या वह हमारी ज़रूरतों को पूरा किए जाने के लिए भी नहीं कह रहे हैं? हाँ, यह हमारे लिए भी लिखा गया था, ताकि जो हल चलाता है और जो बालों (दानों) को कुचलता है दोनों फ़सल का लाभ उठा सकें।
[11] यदि हम ने तुम्हारे बीच आत्मिक आशीषों को बोया, तो क्या तुम्हारी भौतिक आशीषों के हम भागीदार नहीं हो सकते?
[12] यदि दूसरों को तुम से आर्थिक सहयोग लेने का अधिकार है, तो क्या हमें उन से अधिक अधिकार नहीं है? लेकिन हम ने इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। बल्कि हम सब कुछ सहते हैं, ताकि हम मसीह के सुसमाचार में रूकावट न बनें।
[13] क्या तुम्हें पता नहीं कि जो लोग मन्दिर में सेवा करते हैं, मन्दिर की रोटी खाते हैं और जो वेदी की सेवा करते हैं वे चढ़ायी हुयी वस्तुओं के हिस्सेदार बनते हैं?
[14] इसी तरह प्रभु ने यह आज्ञा दी है कि जो लोग सुसमाचार (खुशी की खबर) सुनाते हैं, उनके खर्चे सुनने वालों से ही पूरे किए जाएँ।
[15] लेकिन मैंने इन में से किसी भी अधिकार का उपयोग नहीं किया। मैं इसलिए लिख भी नहीं रहा हूँ कि मेरे लिए कुछ किया जाए। सच पूछो तो बजाए इसके कि मेरे बिना मजदूरी लिए संदेश देने के घमण्ड से कोई मुझे वंचित करे, मेरा मर जाना भला है।
[16] इसलिए कि यदि मैं सुसमाचार (खुशी की खबर) सुनाऊँ, मेरे पास गर्व करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि मैं विवश होता हूँ। यदि मैं खुशी का संदेश न सुनाऊँ, तो मुझ पर हाय!
[17] यदि मैं खुद की इच्छा से ऐसा करता हूँ तो मुझे इसका प्रतिफल मिलेगा। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा रास्ता या चुनाव नहीं, इसलिए कि परमेश्वर ने मुझे यह ज़िम्मेदारी सौंपी है।
[18] तो फिर मुझे इसके बदले में मिलेगा क्या? यह तो वह अवसर है, जो मुझे दूसरों से बिना पैसा लिए खुशी का संदेश सुनाना है।
[19] हालांकि मैं आज़ाद हूँ और किसी के आधीन नहीं हूँ, फिर भी तमाम लोगों को मसीह के पास लाने के लिए, मैं सभी का गुलाम बन चुका हूँ।
[20] यहूदियों को मसीह में लाने के लिए जब मैं उनके साथ था, उनके नियमशास्त्र का पालन करने के समान बना, हालांकि मैं उस नियमशास्त्र के आधीन नहीं था।
[21] जब मैं गैरयहूदियों के साथ हूँ जो कि यहूदियों के नियमशास्त्र के अनुसार नहीं चलते, मैं भी नियमशास्त्र के आधीन नहीं हूँ, ताकि उन्हें मसीह तक ला सकूँ। लेकिन परमेश्वर के नियमशास्त्र को नज़रन्दाज़ नहीं करता, मैं मसीह के नियम (दूसरों की भलाई वाली जीवन शैली) का पालन करता हूँ।
[22] जो कोमल विवेक के हैं, उनके लिए मैं कोमल विवेक वाला बना ताकि उन्हें जीत सकूँ। सभी लोगों के लिए मैं सब कुछ बन गया, ताकि तमाम लोगों को उद्धार के अनुभव में ला सकूँ।
[23] यह सब कुछ मैं सुसमाचार के लिए करता हूँ, ताकि दूसरे लोगों के साथ इस में हिस्सेदार बन सकूँ।
[24] क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि दौड़ में सभी दौड़ने वाले दौड़ते हैं, लेकिन केवल एक ही ईनाम जीत पाता है? इसलिए जीत का लक्ष्य रखो।
[25] हर एक पहलवान को सब बातों में खुद पर नियंत्रण रखना पड़ता है। एक नष्ट हो जाने वाले मुकुट के लिए वह ऐसा करता है, लेकिन हम नष्ट न होने वाले मुकुट के लिए।
[26] इसलिए मैं न बिना किसी लक्ष्य के दौड़ता हूँ न हवा में मुक्केबाज़ी करता हूँ।
[27] बजाए इसके मैं अपनी देह को काबू में करके अपना गुलाम बनाता हूँ, ताकि दूसरों को संदेश देकर मैं स्वयं अयोग्य न ठहरूँ।