[1] यदि मैं इन्सानों और स्वर्गदूतों की भाषाओं में बोलूँ, लेकिन मेरे पास प्रेम न हो, तो मैं ठन-ठन करने वाला पीतल और झनझनाती झाँझ की तरह हूँ।
[2] यदि मैं नबूवत कर सकूँ और सारे भेद और ज्ञान की बातें जान लूँ और पहाड़ों को हटाने लायक विश्वास भी मेरे पास हो, लेकिन प्रेम न हो तो मैं कुछ भी नहीं।
[3] यदि मैं अपना सब कुछ दान कर डालूँ और अपनी देह को जलाए जाने के लिए दे दूँ, लेकिन दूसरों से प्रेम न रखूँ तो मुझे कुछ फ़ायदा नहीं।
[4] प्रेम धीरज रखता है। दयालु है। यह जलन नहीं रखता। डींगें नहीं मारता, नही घमण्ड करता है।
[5] बदतमीज़ी नहीं करता, अपना फ़ायदा नहीं देखता, झल्ला नहीं उठता, लोगों द्वारा पहुँचायी चोटों का लेखा जोखा नहीं रखता।
[6] अन्याय से खुश नहीं होता, लेकिन सच्चाई से खुश होता है।
[7] यह सब कुछ सह लेता है। सब बातों में हमेशा भरोसा रखता है, सब बातों की आशा रखता है। सब कुछ सहता जाता है।
[8] प्रेम कभी खत्म नहीं होता है। नबूवतें हों, तो समाप्त हो जाएँगी, भाषाएँ हों तो जाती रहेंगी। यदि ज्ञान है तो उसका अन्त हो जाएगा।
[9] इसलिए कि हमारा ज्ञान और हमारी नबूवतें भी अधूरी हैं।
[10] लेकिन जब पूर्णता आ जाएगी, तब अधूरेपन का अन्त हो जाएगा।
[11] जब मैं बच्चा था, बच्चों का सा मन था, उन्हीं की तरह बातें करता था और उन्हीं की तरह सोच थी, लेकिन जवान हो जाने पर मैंने बच्चों वाली सारे हरकतें छोड़ दीं।
[12] अभी हमें दर्पण (शीशे) में धुंधला सा दिखता है, लेकिन उस समय हम आमने सामने देखेंगे। अभी हमारा ज्ञान अधूरा है, लेकिन बाद में हमारा ज्ञान पूरा होगा, जैसे परमेश्वर मुझे पूरी तरह से जानते हैं।
[13] लेकिन अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों हमेशा बने रहने वाले हैं, लेकिन इन में सब से बड़ा प्रेम है।