[1] भाइयो-बहनो, मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात से अनजान रहो, कि हमारे पूर्वज बादल के नीचे थे और समुद्र पार कर गए।
[2] उन सभी को बादल और समुद्र में मूसा का बपतिस्मा दिया गया।
[3] सभी ने एक ही आत्मिक खाना खाया।
[4] सभी ने एक ही आत्मिक पानी पीया। इसलिए कि वे अपने साथ-साथ चलने वाली आत्मिक चट्टान जो मसीह थे, उन से पीते थे।
[5] लेकिन परमेश्वर उन में से अधिकतर लोगों से खुश नहीं थे, इसलिए वे जंगल में ही ढेर हो गए।
[6] ये घटना हमारे लिए एक उदाहरण ठहरी, ताकि उनके समान हम बुरी वस्तुओं को न चाहें।
[7] इसलिए उन में से कुछ की तरह मूर्तिपूजक न बनो। जैसा कि लिखा है, "खाने-पीने के लिए लोग बैठे और खेलने-कूदने के लिए उठे"
[8] उन में से अनेक लोगों की तरह हम व्यभिचार (अनैतिक काम) न करें। इसी वजह से एक ही दिन में तेईस हजार लोग मर गए थे।
[9] हम प्रभु को न परखें, क्योंकि ऐसा करने के कारण कुछ साँपों से बर्बाद किए गए।
[10] जैसे उन में से कुछ कुड़कुड़ाए और नाश करने वाले ने उन्हें मार डाला, तुम कुड़कुड़ाना नहीं।
[11] उनके साथ घटने वाली ये वारदातें, हमारे लिए नसीहत बन गयीं। हम जो इस युग के अन्त में रहते हैं, ये बातें हमारे सीखने के लिए लिखी गयीं थीं।
[12] इसलिए जो सोचता है कि वह डगमगा नहीं सकता, सतर्क रहे कि कहीं गिर न जाए।
[13] ऐसे किसी प्रलोभन (परीक्षा) का सामना तुम ने नहीं किया, जिसका सामना दूसरे लोग करते हैं परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं, वह सहने से बाहर तुम्हें किसी प्रलोभन में फँसने नहीं देंगे। लेकिन प्रलोभन से बच निकलने का रास्ता भी दिखाएँगे, ताकि तुम सह सको।
[14] इसलिए मेरे दोस्तो मूर्तिपूजा से भागो।
[15] तुम लोग तो समझदार हो, जो मैं कह रहा हूँ, स्वयं उसे परखो (या उसके बारे में निर्णय लो)
[16] क्या जिस धन्यवाद के कटोरे में हम भाग लेते हैं (धन्यवाद देते हैं) वह मसीह के खून में सहभागिता (हिस्सेदारी) नहीं है? क्या जिस रोटी को हम तोड़ते हैं, वह मसीह की देह में हिस्सा लेना नहीं है।
[17] इसलिए कि रोटी एक है, हम जो बहुत हैं, एक देह हैं क्योंकि हम सभी एक रोटी ही में से खाते हैं।
[18] इस्त्राएली लोगों पर नज़र डालो। क्या वेदी के बलिदानों को खाने वाले एक वेदी के साथ सहभागी नहीं होते है?
[19] क्या मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि मूर्तियाँ या उन पर चढ़ायी हुयी वस्तुएँ कुछ मायने रखती हैं?
[20] नहीं, मेरे कहने का मतलब यह है कि गैर यहूदी जो चढ़ावा चढ़ाते हैं, वह दुष्टात्माओं के लिए होता है, परमेश्वर के लिए नहीं। इसलिए मैं नहीं चाहता कि तुम दुष्टात्माओं के साथ किसी तरह से साझा करो।
[21] तुम दुष्टात्माओं के प्याले और प्रभु के प्याले में हिस्सेदार (सहभागी) नहीं हो सकते। तुम प्रभु की मेज़ और दुष्टात्माओं की मेज़ में भागीदार नहीं हो सकते।
[22] क्या हम प्रभु की ईर्ष्या (क्रोध) को उकसा रहे हैं? क्या हम प्रभु से अधिक शक्तिशाली हैं?
[23] "सब कुछ की अनुमति है" -लेकिन सब कुछ लाभदायक नहीं है। "सब बातों की अनुमति है" -लेकिन सब बातों से उन्नति नहीं होती है।
[24] अपनी ही भलाई की मत सोचो लेकिन दूसरों की भलाई की भी सोचो।
[25] बिना प्रश्न किए हुए बाज़ार में मिलने वाले मांस को निःसंकोच खाओ।
[26] इसलिए कि पृथ्वी और इस में पायी जाने वाली हर वस्तु प्रभु की है।
[27] यदि तुम्हें कोई गैर-मसीही खाने पर बुलाए और तुम जाना चाहो तो जो परोसा जाता है बिना विवेक की उलझन के खा लो।
[28] लेकिन यदि कोई तुम से कहता है, "यह प्रसाद है", तो उस बताने वाले व्यक्ति और उसके विवेक के कारण मत खाओ।
[29] तुम्हारा नहीं लेकिन दूसरे व्यक्ति का विवेक इसलिए कि दूसरे के विवेक से मेरी स्वतंत्रता को क्यों नापा जाए?
[30] यदि मैं खायी जाने वाली वस्तु के लिए धन्यवाद देता हूँ, तो फिर मैं उसके लिए दोषी क्यों ठहराया जाता हूँ।
[31] इसलिए जो तुम खाओ, पियो या करो सब कुछ परमेश्वर के सम्मान (प्रशंसा, इज़्ज़त) को बढ़ाने के लिए करो।
[32] तुम यहूदियों, यूनानियों, परमेश्वर के चर्च या किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए रूकावट या रोड़ा न बनो कि वह मसीह के पास न आए या मसीह में उन्नति न कर पाए।
[33] इसलिए कि मैं ज्य़ादा से ज्य़ादा लोगों की मुक्ति का कारण बन सकूँ, मैं सब बातों में सब को खुश करना चाहता हूँ और मुझे अपने लाभ की चिन्ता नहीं है।