[1] हे भाइयो-बहनो, मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि, मैंने तुम्हें सु-संदेश सुनाया, तुम ने उसे अपना लिया और उसी में बने भी हो।
[2] यदि इस संदेश पर तुम्हारा विश्वास बना रहे (या मज़बूती से थामे रहो) तो यही तुम्हें मुक्ति देता है-नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना बेकार ठहरा।
[3] जो बात मुझ तक पहुँची थी, मैंने उसे सब से ज़रूरी जानकर तुम तक पहुँचायी, वह यह कि पवित्रशास्त्र के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरे,
[4] गाड़े गए और पवित्रशास्त्र के अनुसार ही तीसरे दिन जी भी उठे।
[5] वह कैफ़ा को और फिर बारहों को दिखायी दिए।
[6] उसके बाद वह पाँच सौ से ज्य़ादा भाइयो-बहनों को एक ही समय में दिखे, जिनमें से अधिकतर लोग अभी जीवित हैं, हालांकि कुछ मर चुके हैं।
[7] तब वह याकूब को दिखायी दिए और फिर सब प्रेरितों को।
[8] सब से आखिर में उन्हों ने मुझे दर्शन दिया, जो मानो समय से पहले पैदा हुआ हो।
[9] मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूँ और प्रेरित कहलाने के लायक भी नहीं, इसलिए कि मैंने परमेश्वर के चर्च को पीड़ा दी थी।
[10] लेकिन परमेश्वर की अपार कृपा (अनुग्रह) से मैं अब जो हूँ सो हूँ। मेरे लिए प्रभु का अनुग्रह बेकार नहीं रहा। लेकिन मैंने उन सब की तुलना में सब से अधिक प्रचार किया। इस में भी मेरा कुछ नहीं, यह उनकी कृपा का परिणाम था।
[11] इसलिए चाहे मैं या वे, हम यही आनन्द का संदेश देते हैं और इसी पर तुम ने विश्वास किया है।
[12] अब यदि मसीह के बारे में यह संदेश सुनाया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जिलाए गए हैं, तो फिर तुम में से कुछ मरे हुओं के जिलाए जाने का इन्कार क्यों करते हैं?
[13] यदि मरे हुओं का जिलाया जाना है ही नहीं, तो मसीह भी नहीं जिलाए गए।
[14] यदि मसीह जिलाए नहीं गए तो हमारा सुसंदेश देना और तुम्हारा उस पर विश्वास लाना दोनों ही बेकार है।
[15] यही नहीं हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे, क्योंकि हम ने परमेश्वर के बारे में गवाही दी कि उन्हों ने यीशु को जिलाया। लेकिन यदि मरे लोग जिलाए नहीं जाते हैं तो परमेश्वर ने मसीह यीशु को भी नहीं जिलाया होता।
[16] क्योंकि यदि मरे हुए जिलाए नहीं जाते, तो मसीह भी जिलाए नहीं गए।
[17] यदि मसीह को जिलाया नहीं गया, तो तुम्हारा विश्वास लाना बेकार है और तुम अभी तक अपने गुनाहों (पापों) के कारण सज़ा के आधीन हो।
[18] इसके अलावा मसीह पर विश्वास लाने के बाद जो लोग मरे, वे भी नाश हो गए।
[19] इसलिए यदि मसीह पर हमारी आशा केवल इस जीवन के लिए ही है, तो दुनिया में हम लोग सचमुच सब से अधिक दुखी लोग होंगे।
[20] लेकिन मसीह सचमुच मरे हुओं में से जिलाए गए हैं और जो सो गए हैं, उन में वह पहिले फल हैं।
[21] इसलिए कि जब एक इन्सान के द्वारा मौत आयी, इसलिए मरे हुओं का जी उठना (पुनरूत्थान) भी एक इन्सान से ही हुआ।
[22] जिस तरह से हर इन्सान मरता है क्योंकि हम सभी आदम से हैं, हर वह इन्सान जो मसीह का है, उसे जिला दिया जाएगा।
[23] लेकिन जिलाए जाने में भी क्रम है, फ़सल के पहले हिस्से की तरह मसीह का जी उठना था। मसीह के आने पर वे जी उठेंगे जो उनके हैं।
[24] उसके बाद अन्त आ जाएगा, उस समय वह सारे शासन, अधिकार और सामर्थ को समाप्त करके राज्य को परमेश्वर पिता के सुपुर्द कर देंगे।
[25] जब तक मसीह अपने सारे दुश्मनों को अपने पैरों तले न ले आएँ, उनका राज्य करना ज़रूरी है
[26] सब से आखिरी दुश्मन जिसका अन्त किया जाएगा, वह मौत है।
[27] इसलिए कि परमेश्वर ने सब कुछ मसीह के आधीन कर दिया है।" इसलिए जब कि लिखा है, "सब कुछ" उनके आधीन कर दिया गया है, तो स्पष्ट है कि इस में वह नहीं हैं जिन्होंने सब कुछ मसीह के आधीन कर दिया।
[28] जब सब कुछ उनके (परमेश्वर के) आधीन हो जाएगा जिन्होंने सब कुछ उनके (यीशु के) आधीन कर दिया, ताकि सब जगह, सब बातों (दायरों, क्षेत्रों) में परमेश्वर ही सब कुछ हों तब पुत्र भी खुद उनके आधीन हो जाएगा।
[29] नहीं तो जो लोग मर चुके लोगों के लिए बपतिस्मा लेते हैं, उनका क्या? यदि मरे हुओं का जी उठना नहीं है, तो फिर उनके लिए बपतिस्मा क्यों लिया जाता है?
[30] हर दिन हम क्यों जोखिम का सामना करते हैं।
[31] हे भाइयो-बहनो, मेरे उस घमण्ड की वजह से जो मसीह यीशु में हमारे प्रभु में तुम्हारे लिए है, मैं यह पुख्ता तरीके से कहता हूँ कि मौत हर रोज़ मेरे सामने खड़ी रहती है
[32] यदि मरे हुओं का जी उठना है ही नहीं, तो इफ़िसुस में जंगली जानवरों से संघर्ष करने से क्या लाभ था? और यह भी कि "आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे।"
[33] धोखे में मत रहो, "बुरी संगति अच्छे चालचलन को बिगाड़ देती है।"
[34] भलाई और भक्ति के लिए जाग उठो, अपने पाप में जीना बंद करो। कुछ लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते-यह मैं तुम्हें शर्मिंदा करने के लिए कह रहा हूँ।
[35] कोई कह सकता है, "मुर्दे किस तरह जी उठते हैं? किस तरह की देह के साथ वे जी उठेंगे?
[36] क्या मूर्खता का सवाल है! जब तुम एक बीज ज़मीन में बोते हो, जब तक वह मरता नहीं, उसमें से पौधा नहीं निकलता।
[37] और जो तुम बोते हो, यह वह देह नहीं जो उत्पन्न होने वाली है, लेकिन सिर्फ़ दाना ही है। चाहे वह किसी भी अनाज का दाना हो।
[38] लेकिन परमेश्वर अपनी इच्छा के अनुसार उसको देह देते हैं। हर एक बीज के पास उसकी अलग किस्म की देह होती है।
[39] सभी देह एक सी नहीं है, लेकिन मनुष्यों की देह, पशुओं की देह, पक्षियों की देह और मछलियों की देह सभी में अन्तर है।
[40] स्वर्गिक देह है और पार्थिव (पृथ्वी के लिए) भी। लेकिन स्वर्गिक देहों के तेज और पार्थिव देहों के तेज में अंतर है।
[41] सूर्य, चन्द्रमा और तारों का तेज एक सा नहीं है (क्योंकि एक तारे से दूसरे तारे के तेज में फ़र्क है)।
[42] मरे हुओं का जी उठना भी ऐसा ही है। देह नाशमान स्थिति में बोयी जाती है और अविनाशी स्थिति में जी उठती है।
[43] बेइज़्ज़ती (अनादर) के साथ देह बोयी जाती है और तेज (महिमा) के साथ जी उठती है। कमज़ोरी के साथ बोयी जाती है और शक्ति के साथ जी उठती है।
[44] स्वाभाविक देह बोयी जाती है, लेकिन आत्मिक देह जी उठती है। इसलिए कि स्वाभाविक देह है, आत्मिक देह भी है।
[45] ऐसा लिखा भी है, कि पहला इन्सान अर्थात् आदम, जीवित प्राणी बना और आखिरी आदम जीवन देने वाला आत्मा बना।
[46] पहले स्वाभाविक था, आत्मिक नहीं था। बाद में आत्मिक हुआ।
[47] पहला इन्सान धरती अर्थात् मिट्टी का था, दूसरा स्वर्गिक है।
[48] जैसे वह मिट्टी का था, वैसे ही दूसरे मिट्टी के हैं। जैसा वह स्वर्गिक हैं, वैसे ही और भी स्वर्गिक हैं।
[49] जैसे हम ने उसका रूप पाया जो मिट्टी का था, वैसे ही उस स्वर्गिक का रूप भी पाएँगे।
[50] हे भाइयो-बहनो, मैं यह कहता हूँ कि माँस और खून परमेश्वर के राज्य के हकदार (उत्तराधिकारी) नहीं हो सकते और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है।
[51] देखो, मैं तुम से रहस्य की बात कह रहा हूँ, कि हम सभी सोएँगे नहीं, लेकिन सभी बदल जाएँगे।
[52] और यह पल भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूँकते ही होगा, क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी हालत में उठाए जाएँगे और हम बदल जाएँगे।
[53] क्योंकि इस नाशमान को अविनाशी और मरणशील को अमरता को पहनना ज़रूरी है।
[54] लेकिन जब यह नाशमान, अविनाश को पहन लेगा और यह मरणशील अमरता को पहन लेगा, तब यह लिखित वचन पूरा हो जाएगा, "मौत को विजय ने निगल लिया है।"
[55] हे मौत, "तुम्हारी जीत कहाँ है"? हे मौत, तुम्हारा डंक कहाँ?"
[56] मौत का डंक तो पाप है और पाप की ताकत (शक्ति) व्यवस्था (यहूदी नियमशास्त्र या विवेक की व्यवस्था) है
[57] लेकिन परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमें प्रभु यीशु मसीह के द्वारा विजयी करते हैं
[58] इसलिए हे मेरे प्यारे भाइयो-बहनो, मज़बूत बने रहो तथा यीशु के काम में हमेशा बढ़ते जाओ, क्योंकि तुम्हें यह मालूम है कि तुम्हारी मेहनत प्रभु में बेकार नहीं है।