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[1] लोगों को हमें मसीह के सेवकों की तरह और परमेश्‍वर के भेदों का प्रबंधक (भण्डारी, मैनेजर) समझना चाहिए।

[2] एक प्रबन्धक में विश्‍वास योग्यता का होना ज़रूरी है।

[3] मेरे लिए तो यह एक बहुत ही छोटी बात है कि तुम लोग या इन्सानी अदालत मेरा मूल्यांकन करे। यहाँ तक कि इस विषय पर मैं खुद अपना मूल्यांकन (न्याय) नहीं करता।

[4] अपने बारे में किसी दोष के बारे में मुझे एहसास नहीं है। लेकिन इस आधार पर मैं निर्दोष साबित नहीं हो जाता। मुझे परखने वाले यीशु प्रभु हैं।

[5] इसलिए समय से पहले किसी बात पर फ़ैसला मत सुनाओ। यीशु के आने तक इन्तज़ार करो। वह छुपी हुयी (अँधेरे की) बातों को रोशनी में लाएँगे और मनों का इरादा प्रगट करेंगे। तभी हर जन परमेश्‍वर से शाबाशी (प्रशंसा) पाएगा।

[6] तुम्हारे लाभ के लिए इन बातों को मैंने अपने और अपुल्लोस के ऊपर लागू किया है, कि वचन से मैंने क्या सीखा था, चाहा था यदि तुम भी अपने जीवन में लागू करो, तो एक अगुवे से दूसरे अगुवे की तुलना कर के घमण्ड नहीं करोगे।

[7] किस वजह से तुम ऐसी नाप-तौल करते हो? ऐसा क्या है जो तुम्हें परमेश्‍वर से न मिला हो? यदि तुम्हें मिला है, तुम्हें घमण्ड क्यों होता है, जैसे कि तुम्हें सब कुछ भेंट स्वरूप न मिला हो?

[8] तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारी हर ज़रूरत पूरी हो चुकी है। तुम सोचते हो कि तुम रईस हो चुके हो। परमेश्‍वर के राज्य में तुम हमारे बिना राज्य करने लगे हो। मेरी कामना यह थी कि तुम राज्य करते होते। इसलिए कि तब हम ने तुम्हारे साथ राज्य किया होता।

[9] मुझे ऐसा लगता है कि परमेश्‍वर ने हम प्रेरितों को युद्ध में एक फौ़ज की विजय परेड की आखिरी पँक्‍ति में राजनैतिक युद्ध बंदियों की तरह जो मारे जाने वाले हैं, स्वर्गदूतों और लोगों को दिखाने के लिए रखा है।

[10] मसीह के लिए हम बेवकूफ़ से लगते हैं। लेकिन तुम मसीह में अपने आपको बुद्धिमान समझते हो। हम कमज़ोर हैं, तुम ताकतवर हो। तुम्हें आदर मिलता है, हमें बेइज़्ज़ती।

[11] इस समय तक हम भूखे-प्यासे हैं, अच्छे कपड़े नहीं पहनते हैं, बुरा बर्ताव सहते हैं और सिर के ऊपर छत तक नहीं है।

[12] हम अपने ही हाथों से मेहनत करते हैं, जब लोग हमारे खिलाफ़ बोलते हैं, हम आशीष देते हैं। जब हमें सताया जाता है, सहते रहते हैं।

[13] जब हमारे बारे में झूठ बोला जाता है, हम दोस्त की तरह जवाब देते हैं। अभी तक हमें दुनिया की धूल-मिट्टी और कचरा समझा जाता है।

[14] ये बातें मैं तुम्हें शर्मिंदा करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। लेकिन तुम्हें अपने बच्चे जानकर सुधार करना चाहता हूँ।

[15] मसीह में तुम्हारे दस हज़ार गुरू हो सकते हैं, लेकिन सभी पिता नहीं हो सकते हैं, क्योंकि सुसमाचार के द्वारा मैं मसीह में तुम्हारा पिता हूँ।

[16] इसलिए ज़ोर डालकर कहना चाहता हूँ, मेरी तरह जीवन जीओ।

[17] इसी कारणवश मैंने मसीह में अपने प्रिय और विश्‍वासयोग्य बेटे तिमुथियुस को तुम्हारे पास भेजा है। मेरी जीवन शैली के बारे में वह तुम्हें याद दिलाएगा। जहाँ कहीं मैं जाता हूँ हर एक चर्च में वैसा ही सिखाता हूँ।

[18] कुछ लोग बहुत घमण्डी हो चुके हैं, जैसे कि मैं तुम्हारे पास आऊँगा ही नहीं।

[19] प्रभु ने चाहा तो मैं जल्दी ही तुम्हारे पास आऊँगा। तब मैं यह जान लूँगा कि ये लोग बनावटी भाषण देते हैं या सचमुच में परमेश्‍वर की शक्‍ति रखते हैं।

[20] इसलिए कि परमेश्‍वर का राज्य बक-बक करने में नहीं, लेकिन परमेश्‍वर की सामर्थ से जीना है।

[21] तुम्हें क्या चाहिए? क्या मैं तुम्हारे पास अनुशासन की छड़ी के साथ आऊँ या प्रेम और सज्जनता से?

1 कुरिन्थियों — Chapters