[1] तब यीशु ने बारह शिष्यों को बुलाकर उन्हें सब भूत-प्रेतात्माओं को निकालने और बीमारियों को ठीक करने की ताकत (योग्यता) और अधिकार दिया,
[2] उन्हें परमेश्वर के राज्य का समाचार देने और बीमारियों से आज़ाद करने के लिए भेजा।
[3] यीशु ने उन से कहा, "सफ़र के लिए कुछ मत लेना, न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपये और न दो कमीज़ें।
[4] और जिस घर में तुम पहले पहुँचो, वहीं रहना, और वहीं से विदा होना।
[5] जो कोई तुम्हारा स्वागत न करे, उस इलाके से निकलते हुए अपने पाँवों की धूल झाड़ देना ताकि उनके खिलाफ़ सबूत हो।"
[6] इसलिए वे निकलकर गाँव-गाँव खुशी की खबर सुनाते, और हर जगह लोगों को स्वस्थ करते गए।
[7] देश के चौथाई भाग का राजा हेरोदेस यह सब सुनकर घबरा गया, क्योंकि कुछ का कहना था कि यूहन्ना मरे हुओं में से जी उठा है।
[8] कुछ कह रहे थे कि यह तो एलिय्याह है, और दूसरे उसे पुराने समय का नबी समझ रहे थे।
[9] हेरोदेस बोल उठा, "यूहन्ना को तो खुद मैंने मरवाया था, फिर यह मनुष्य कौन है जिसके बारे में मैं सुन रहा हूँ?" वह उससे मुलाकात भी करना चाहता था।
[10] प्रेरितों ने वापस लौटने पर वे सब बातें बतायीं जो उन्हों ने की थीं। तब वह उनको अपने साथ लेकर चुपचाप बैतसैदा के वीरान इलाके में चले गए।
[11] लोग यह जानकर उन से भेंट करने आए और यीशु ने उन से मुलाकात की। यीशु ने उन्हें परमेश्वर के राज्य के बारे में सिखाया और बीमार लोगों को अच्छा कर दिया।
[12] दिन ढलने पर बारहों ने आकर यीशु से कहा, "भीड़ को विदा कीजिए ताकि आस-पास के इलाकों में जाकर रहने और खाने का इन्तज़ाम कर सकें क्योंकि यह तो वीरान जगह है।"
[13] लेकिन यीशु ने उन से कहा, "तुम्हीं खाने के लिए उन्हें कुछ दो।" और वे बोले, "पाँच रोटियों और दो मछली के सिवाय हमारे पास कुछ नहीं है। खाना खरीदकर लाने ही से कुछ हो सकता है।" वहाँ करीब पाँच हजार आदमी थे।
[14] यीशु ने उन से कहा, "पचास पचास की कतार में लोगों को बैठा दो।"
[15] शिष्यों ने लोगों को इसी तरह बैठा दिया।
[16] तब यीशु ने रोटियाँ और मछलियाँ हाथ में लेकर आसमान की तरफ़ देखते हुए धन्यवाद किया, और रोटियाँ तोड़ तोड़कर अपने शिष्यों को देते गए ताकि लोगों में बाँट दें।
[17] सब लोगों के भरपूर खा लेने के बाद उन्हों ने बचे हुए टुकड़ों से भरी बारह टोकरियाँ उठायीं।
[18] जब यीशु अकेले प्रार्थना कर रहे थे, और शिष्य उनके साथ थे, तब यीशु ने उन से पूछा, "मेरे बारे में लोगों के ख्याल क्या हैं?"
[19] उन लोगों ने उत्तर दिया, "कि आप यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले हैं या एलिय्याह, लेकिन कुछ दूसरों के हिसाब से, पुराने समय के कोई एक नबी जी उठे हैं।"
[20] यीशु ने उन से पूछा, "लेकिन तुम मुझे क्या कहते हो?" पतरस ने उत्तर दिया, "परमेश्वर का मसीह।"
[21] तब यीशु ने चेतावनी देकर आज्ञा दी कि "वे यह बात किसी को न बताएँ।"
[22] उन से यीशु ने यह भी कहा, "यह ज़रूरी है कि मैं बहुत दुःख उठाऊँ और प्राचीनों, प्रधान याजक, महापुरोहित और शास्त्रियों द्वारा तुच्छ ठहराए जाने के बाद मार डाला जाऊँ और तीसरे दिन जी उठूँ।"
[23] तब यीशु ने सब लोगों से कहा, "अगर कोई मुझे मानना चाहे, तो अपनी मनमानी करना छोड़ दे, हर दिन अपना क्रूस उठाए और मेरे कहने अनुसार करे।
[24] क्योंकि जो कोई अपनी जान बचाना चाहेगा वह उसे खो देगा, लेकिन जो मेरे लिए जिएगा, वह उसे बचा लेगा।
[25] यदि इन्सान सारी दुनिया को पा ले और अपनी आत्मा को खो दे या उसका नुकसान उठाए, तो उसे क्या फ़ायदा होगा?
[26] जो कोई मुझ से और मेरी बातों से इस दुनिया में शर्माएगा, मैं भी अपनी, अपने पिता और पवित्र स्वर्गदूतों की शान के साथ आऊँगा, तो उससे शर्माऊँगा।
[27] मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो यहाँ खड़े हैं, उन में से कोई कोई ऐसे हैं कि जब तक परमेश्वर के शासन को न देख लें, तब तक मरेंगे नहीं।"
[28] इन बातों के लगभग आठ दिन बाद यीशु पतरस और यूहन्ना और याकूब को साथ लेकर परमेश्वर पिता से सहभागिता करने गए।
[29] जब यीशु प्रार्थना कर रहे थे, तभी उनका चेहरा बदल सा गया और उनके कपड़े सफ़ेद होकर चमकने लगे।
[30] एक दम से, मूसा और एलिय्याह, उन से बातें करते हुए दिखे।
[31] ये लोग अजीब रोशनी से भरे हुए थे और यीशु की मौत पर बातचीत कर रहे थे।
[32] पतरस और उसके साथी नींद के झोंके में थे, और जब थोड़ा सचेत हुए, तो यीशु के बदले हुए महिमामय रूप को और उनके साथ दो पुरुषों को खड़ा देखा।
[33] मूसा और एलिय्याह के जाने के बाद, पतरस ने यीशु से कहा, "हे स्वामी, हमारे लिए यहाँ रहना अच्छा है। इसलिए हम तीन तम्बू खड़े करेंगे, एक आपके लिए, एक मूसा के लिए और एक एलिय्याह के लिए। बिना सोचे समझे उसने यह कह दिया था।
[34] वह यह कह ही रहा था, कि बादल ने आकर उन्हें घेर लिया, जिसकी वजह से वे डर गए।
[35] इस बादल में से आवाज़ आयी कि यह मेरा प्यारा बेटा है, इसकी सुनो।
[36] उस आवाज़ के बंद होते ही यीशु अकेले पाए गए। शिष्य खामोश खड़े रहे और बाद में भी ये बातें किसी को न बतायीं।
[37] दूसरे दिन उनके पहाड़ से उतरते ही बहुत से लोग यीशु से मिलने आए।
[38] अचानक ही भीड़ में से एक आदमी चिल्ला उठा, "गुरू जी, देखिए मेरे पास एक ही बेटा है,
[39] एक भूत उसे पकड़ता है, और वह चिल्ला उठता है।
[40] मैंने आपके शिष्यों से बिनती की कि वे भूत को निकालें, लेकिन वे नाकामयाब रहे।"
[41] यीशु ने कहा, "हे अविश्वासियो और ज़िद्दी लोगो, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहकर सहता रहूँगा? अपने बेटे को यहाँ लाओ।"
[42] उसके आते आते प्रेतात्मा ने उसे मरोड़ते हुए पटक दिया, लेकिन यीशु ने प्रेतात्मा को डाँटा और लड़के को अच्छा करके पिता को सौंप दिया।
[43] परमेश्वर के इस बड़े काम को देखकर सब लोग अचम्भा करने लगे, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,
[44] "इन बातों पर ध्यान दो क्योंकि मैं लोगों के हाथ पकड़वाया जाऊँगा।"
[45] लेकिन वे इस बात को न समझे और यह बात उन से छिपी रही कि वे उसे न जानें और वे इस विषय में यीशु से पूछने में संकोच करते रहे।
[46] उसके बाद उनके बीच इस बात पर चर्चा होने लगी कि उन में से कौन बड़ा है?
[47] तब यीशु ने यह जानकर कि वे अपने मनों में क्या सोच रहे थे, एक बच्चे को लेकर अपने पास खड़ा किया,
[48] और उन से कहा, "जो कोई मेरे नाम से इस बच्चे को अपनाता है, वह मुझे अपनाता है, और जो कोई मुझे अपनाता है वह मेरे भेजने वाले को अपनाता है, क्योंकि जो तुम में छोटों में से भी छोटा है, वही बड़ा है।"
[49] तब यूहन्ना ने कहा, "हे स्वामी, हम ने एक मनुष्य को भूत-प्रेत निकालते देखा था, और उसे मना किया कि वह ऐसा न करे, क्योंकि वह हम सब के साथ मिलकर काम नहीं कर रहा है।"
[50] यीशु ने यूहन्ना को यह कहते हुए ऐसा करने से मना किया, "उसे मना मत करो क्योंकि जो तुम्हारे खिलाफ़ में नहीं, वह तुम्हारी तरफ़ है।"
[51] यीशु के आसमान पर उठाए जाने के कुछ समय पहले यीशु ने यरूशलेम जाने का इरादा किया।
[52] उन्हों ने खुद जाने से पहले कुछ शिष्यों को भेजा। सामरियों के गाँव जाकर उन्हों ने यीशु के लिए जगह तैयार करनी चाही।
[53] लेकिन क्योंकि यीशु यरूशलेम जा रहे थे इसलिए सामरी समाज के लोगों ने अपने गाँव में उन्हें इज़ाज़त नहीं दी।
[54] यह देखकर यीशु के शिष्य याकूब और यूहन्ना ने कहा, "हे स्वामी, अगर आप हुक्म करें तो हम आसमान से आग गिराकर उन्हें राख कर डालें।"
[55] लेकिन यीशु ने मुड़कर उन्हें डाँटा और कहा, "तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो। क्योंकि मैं लोगों को बर्बाद करने नहीं, लेकिन बचाने के लिए आया हूँ।"
[56] फिर वे दूसरे गाँव को चले गए।
[57] जब वे रास्ते पर ही थे, किसी ने यीशु से कहा, "जहाँ-जहाँ आप जाएँगे, मैं भी आपके साथ आऊँगा।"
[58] यीशु ने उससे कहा, "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं, लेकिन मेरे लिए सिर धरने की भी जगह नहीं है।"
[59] यीशु ने दूसरे से कहा, "मेरे शिष्य बन जाओ।" उसने कहा, "हे स्वामी, मेरे पिता के देहान्त के बाद मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा।"
[60] यीशु ने उससे कहा, "मरे हुओं को अपने मुर्दों की फ़िकर करने दो, तुम जाकर मुक्ति की खुशखबरी (परमेश्वर के राज्य का संदेश) सुनाओ।"
[61] किसी दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हे स्वामी, मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा, लेकिन पहले मैं अपने रिश्तेदारों से मिल कर आता हूँ।"
[62] यीशु ने जवाब में कहा, "जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के लायक नहीं है।"