[1] गलील के झील के किनारे एक दिन जब यीशु सिखा रहे थे, एक बड़ी भीड़ उनकी बातें सुनने के लिए उमड़ पड़ी थी।
[2] झील के किनारे उन्हों ने दो नावों को खड़े देखा, लेकिन मछुवारे नाव से उतरकर अपने जालों को धो रहे थे।
[3] उन में से एक शमौन की थी, उस पर चढ़कर ज़मीन से थोड़ी दूर खेने के लिए उन्हों ने उससे कहा। उसी नाव पर बैठकर यीशु भीड़ को शिक्षा देने लगे।
[4] सिखाने के बाद उन्हों ने शमौन से कहा, "गहरे में ले चलो, और मछली पकड़ने के लिए अपने जाल डालो।"
[5] शमौन ने कहा, "स्वामी, रात भर हम ने मेहनत की, लेकिन कुछ भी हाथ न लगा। लेकिन फिर भी आपके कहने पर मैं जाल डाले देता हूँ।"
[6] ऐसा करने पर उन्हों ने इतनी मछली पकड़ीं, कि उनके जाल फटने लगे।
[7] इसलिए दूसरी नावों पर बैठे अपने साथियों की मदद के लिए उन्हों ने गुहार लगाई। उनकी नावें मछलियों से इतनी भर गईं कि वे डूबने वाले ही थे।
[8] यह सब देखकर शमौन पतरस यीशु के पैरों पर यह कहते हुए गिर पड़ा, "प्रभु जी, मुझ से दूर चले जाइए, क्योंकि मैं बुरा इन्सान हूँ।"
[9] ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसे और उसके साथ के लोगों को ढेर सारी मछलियाँ देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ।
[10] शमौन के साथ साझेदार व्यापारी याकूब और यूहन्ना को भी जो ज़बदी के बेटे थे, बड़ा आश्चर्य हुआ।
[11] इसलिए किनारे पर अपनी नावों को लाने के बाद उन्हों ने सब कुछ छोड़ दिया और यीशु के साथ हो लिए।
[12] जब यीशु एक शहर में थे, कोढ़ से भरा हुआ एक व्यक्ति उनके पास आया। यीशु को देखते ही अपना सिर नीचे झुकाते हुए गिड़गिड़ाकर उसने कहा, "प्रभु, अगर आप चाहें तो मुझे ठीक कर सकते हैं।"
[13] यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छूते हुए कहा, "मैं यही चाहता हूँ, तुम ठीक हो जाओ।" तुरन्त उसका कुष्ट-रोग खत्म हो गया।
[14] तब यीशु ने उसे आज्ञा दी कि किसी को न बताए और जाकर पुरोहित को दिखाए। साथ ही स्वस्थ हो जाने के सबूत के रूप में मूसा द्वारा ठहरायी भेंट चढ़ाए।
[15] लेकिन उनके बारे में खबर कुछ ज़्यादा ही फैल गयी और बड़ी भीड़ उन्हें सुनने और बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए आने लगी।
[16] इसके बावजूद यीशु अक्सर जंगल की तरफ़ निकल जाते और वहाँ परमेश्वर से संगति (प्रार्थना) किया करते थे।
[17] एक दिन जब यीशु सिखा रहे थे, यहूदी धर्म के कुछ शिक्षक और फ़रीसी वहाँ बैठे हुए थे। ये सब गलील, यहूदिया और यरूशलेम के गाँवों से आए हुए थे। लोगों को स्वस्थ करने के लिए यीशु के पास योग्यता (सामर्थ) तो थी ही।
[18] तभी कुछ लोग खाट पर एक लकवे के बीमार को ले आए। वे उसे यीशु के सामने लाकर रखना चाहते थे।
[19] लेकिन भीड़ की वजह से वे ऐसा न कर सके और छत पर चढ़ गए। उन्हों ने खपरैल को हटाकर खाट को नीचे लटकाते हुए यीशु के सामने रख दिया।
[20] उन लोगों के भरोसे को देखकर यीशु ने कहा, "बेटा, तुम्हारे पाप (गुनाह) माफ़ हो चुके हैं।"
[21] धार्मिक कानून के जानकार और फ़रीसी मन ही मन सोचने लगे कि "यह कौन होते हैं पापों (गुनाहों) को माफ़ करने वाले। सिर्फ़ परमेश्वर ही ऐसा कर सकते हैं। यह तो खुले आम परमेश्वर निन्दा है।
[22] लोगों के विरोधी विचारों को जानकर यीशु ने उन से कहा, "तुम अपने मन ही मन एतराज़ क्यों जता रहे हो?
[23] क्या कहना आसान लगता है, तुम्हारे गुनाह माफ़ हुए या उठकर चलो?
[24] लेकिन इसलिए कि तुम जानो कि मनुष्य के पुत्र यीशु को इस दुनिया में गुनाहों (पापों) की माफ़ी देने का अधिकार है" - यीशु लकवा पीड़ित व्यक्ति से बोले, "मैं तुम से कह रहा हूँ कि उठो और अपना बिस्तर लेकर घर जाओ।"
[25] सभी के सामने वह उठा और अपने बिस्तर को उठाकर परमेश्वर की बड़ाई करता घर को चला गया।
[26] तब सभी हैरान होकर परमेश्वर की बड़ाई करने लगे। अचरज से भरकर वे कहने लगे, "आज हम ने बड़ी अजीब घटना देखी है।"
[27] इसके बाद यीशु की मुलाकात टैक्स चौकी पर बैठे लेवी नामक टैक्स इकट्ठा करने वाले से हुई, जिसे उन्हों ने अपने साथ हो चलने को कहा।
[28] उसने भी अपना सब कुछ त्याग कर ऐसा किया।
[29] यीशु को उसने अपने घर पर एक शानदार दावत में बुलाया। वहाँ उसके साथी टैक्स कलेक्टरों के अलावा मेहमान भी थे।
[30] शास्त्रियों और फ़रीसियों ने शिष्यों के खिलाफ़ कुड़कुड़ाते हुए कहा, "आप टैक्स इकट्ठा करने वालों और दुष्टों के साथ खाना क्यों खाते हैं?"
[31] यीशु ने जवाब में कहा, "बीमार लोगों को डॉक्टर की ज़रूरत पड़ती है, स्वस्थ लोगों को नहीं।
[32] अपने आपको धार्मिक समझने वाले लोगों को नहीं, लेकिन जो अपने आत्मिक दिवालिएपन को पहचानते हैं, उन्हें मन बदलाव के लिए नेवता देने मैं पृथ्वी पर आया हूँ।"
[33] उन लोगों ने यीशु से कहा, "यूहन्ना के शिष्य और फ़रीसियों के शिष्य अक्सर उपवास करते हैं, लेकिन आपके शिष्य ऐसा नहीं करते हैं?"
[34] यीशु ने उन से कहा, "क्या तुम बरातियों को उस समय उपवास करने के लिए कहोगे, जब दूल्हा उनके साथ है?
[35] परन्तु वे दिन आएँगे, जिनमें दूल्हा उन से अलग किया जाएगा, तब वे उन दिनों में उपवास करेंगे।"
[36] यीशु ने उन्हें एक दृष्टान्त बताया, "कोई भी इन्सान एक पुराने कपड़े पर नए कपड़े का पैबन्द नहीं लगाता, नहीं तो नया फट जाएगा और वह पैबन्द पुराने में मेल भी नहीं खाएगा।
[37] कोई भी ताज़े अंगूर के रस को पुरानी मश्कों में नहीं भरता है। यदि वह ऐसा करता है तो मश्कें फट जाती हैं और अंगूर का रस भी बर्बाद हो जाता है।
[38] "ताज़ा अंगूर का रस नई मश्कों ही में भरा जाना चाहिए।
[39] "बासी अंगूर के रस को पीने के बाद नए में किसी को मज़ा नहीं आता है, वह यह कहता है कि बासी ज़्यादा मज़ेदार था।"