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[1] उसी वक्‍त जो लोग मौजूद थे, उन में से कुछ ने उन गलील वासियों के बारे में बताया, जिनका खून पिलातुस ने उनकी लायी गयी कुर्बानी के साथ मिलाया था।

[2] जवाब में, यीशु ने उन से कहा, "क्या तुम्हारे विचार से ये हताहत् हुए गलीली, दूसरे गलील निवासियों से ज़्यादा बुरे थे, इसलिए ऐसा हुआ?

[3] नहीं, मैं तो यह कहूँगा कि अगर तुम भी मन बदलने के अच्छे मौके का फ़ायदा नहीं उठाओगे, तो बर्बाद हो जाओगे।

[4] और क्या तुम यह सोच रहे हो कि जिन अठ्ठारह लोगों की जान शिलोह के गुम्बद गिरने से हुयी, वे यरूशलेम में रहने वाले दूसरे लोगों से ज़्यादा दुष्ट थे?

[5] मैं कहता हूँ बिल्कुल नहीं, लेकिन अगर तुम भी मन बदलने के अवसर का लाभ नहीं उठाओगे, तो अचानक मौत के शिकार हो जाओगे।"

[6] फिर यीशु ने उन्हें एक दृष्टान्त बताया, एक आदमी अपने बगीचे में लगाए गए अंजीर के पेड़ से अंजीर तोड़ने आया, लेकिन उसमें एक भी फल नहीं था।

[7] इसलिए उसने माली से कहा, "देखो भई, मैं आज तीन साल बाद अंजीर के लिए आया हूँ लेकिन इस में एक भी अंजीर नहीं लगी है। इस पेड़ को काट फेंको। यह बेकार ही में इतनी ज़मीन क्यों घेरे रहे?"

[8] लेकिन माली गिड़गिड़ाकर बोला, "श्रीमान जी, इसे एक साल की मोहलत और दे दीजिए मै इसके चारों तरफ़ खोद कर खाद डालूँगा।

[9] यदि अगले साल तक इस में अंजीर लगते हैं, तो ठीक है, नहीं तो आप इसे कटवा डालना।"

[10] एक सब्त के दिन यीशु एक आराधनालय में सिखा रहे थे।

[11] वहाँ अठ्ठराह साल से कमज़ोरी की आत्मा से पीड़ित एक झुकी हुयी महिला थी जो सीधी खड़ी न हो सकती थी।

[12] उसे देखते ही यीशु ने पास बुलाकर कहा, "हे महिला, तुम अपनी कमज़ोरी से आज़ाद हो चुकी हो।"

[13] जैसे ही यीशु ने अपने हाथ उस पर रखे, वह सीधी खड़ी होकर परमेश्‍वर को धन्यवाद देने लगी।

[14] सब्त के दिन यीशु द्वारा उस महिला के ठीक किए जाने से नाराज़ उस आराधनालय के प्रबन्धक ने वहाँ खड़े लोगों से कहा, "सब्त के दिन प्रार्थना करवाने मत आओ।" बाकी छह दिनों में आते जाओ।"

[15] लेकिन यीशु बोले, "कपटी लोगो! तुम में से हर एक सब्त के दिन काम करता है, क्या तुम इस दिन में अपने बैल या गदहे को खोल कर पानी पिलाने नहीं ले जाते हो?

[16] यह प्यारी महिला जो अब्राहम के वंश की (यहूदी) है, शैतान की अठ्ठारह साल की गुलामी से आज़ाद की गयी है। क्या यह अच्छी बात नहीं है कि वह सब्त के दिन ठीक हो सकी है?"

[17] यह सुनकर यीशु की खिलाफ़त करने वाले शर्मिन्दा हुए, लेकिन दूसरे लोग इन बढ़िया बातों की वजह से बहुत खुश हुए।

[18] तब यीशु ने पूछा, "परमेश्‍वर का राज्य किस तरह का है? मैं कौन सा उदाहरण देकर समझाऊँ?

[19] यह सरसों के छोटे बीज की तरह है, जिसे एक माली ने अपने बगीचे में बोया और वह बढ़कर बड़ा पेड़ हो गया, फिर चिड़ियों ने आकर इसकी डालियों पर घोंसला बनाया।"

[20] फिर यीशु ने कहा, "मैं परमेश्‍वर के राज्य की तुलना किस से करूँ?

[21] वह तो खमीर की तरह है, जिसको किसी महिला ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिलाया और सारा का सारा आटा ख़मीरी हो गया।"

[22] यीशु नगर - नगर और गाँव-गाँव उपदेश देते हुए यरूशलेम की तरफ़ चले जा रहे थे।

[23] किसी ने उन से पूछा, "क्या मुक्‍ति पाने वालों की संख्या कम है?" यीशु ने जवाब में कहा,

[24] "संकरे रास्ते से दाखिल होने की कोशिश करो क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि बहुत से दाखिल होना चाहेंगे और न हो पाएँगे।

[25] जब घर का मालिक उठ कर दरवाज़ा बन्द कर चुका हो, और तुम खड़े हुए दरवाज़ा खटखटाकर कहने लगे, 'हे प्रभु, हमारे लिए खोल दें,' और वह जवाब दें, 'मैं तुम्हें जानता ही नहीं कि तुम कहाँ के हो।'

[26] तब तुम कहने लगोगे,' हम ने आपके साथ खाया पिया और आप ने हमारी सड़कों पर हमें सिखाया था।'

[27] तब यीशु उत्तर देंगे, 'मैं तुम्हें बताता हूँ, मुझे मालूम ही नहीं कि तुम कहाँ से आए हो। तुम सब बुरा करने वालो, मेरे सामने से दूर हटो।'

[28] वहाँ रोना और दाँतों का पीसना होगा क्योंकि तुम अब्राहम, इसहाक, याकूब और दूसरे सभी नबियों को परमेश्‍वर के राज्य में देखोगे, लेकिन तुम बाहर फेंक दिए जाओगे।

[29] लोग पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से आकर परमेश्‍वर के राज्य में अपनी जगह पाएँगे।

[30] अभी जो लोग आखिरी हैं, वे आगे हो जाएँगे और जो अभी पहले हैं, पीछे हो जाएँगे।"

[31] उसी वक्‍त कुछ फ़रीसियों ने आकर यीशु से कहा, "यहाँ से निकल कर चले जाइए, क्योंकि हेरोदेस आपको मार डालना चाहता है।"

[32] यीशु ने उन लोगों से कहा, "उस लोमड़ी से जाकर यह कह दो कि आज और कल मैं भूतों को निकालूँगा, बीमार लोगों को ठीक करूँगा और तीसरे दिन अपने काम को पूरा करूँगा।

[33] फिर भी मुझे आज, कल और परसों चलते जाना है। क्योंकि यह संभव नहीं कि कोई नबी यरूशलेम के बाहर मारा जाए।

[34] हे यरूशलेम! हे यरूशलेम! तुम जो तुम्हारे पास भेजे गए नबियों पर पथराव करती हो, मैंने कितनी ही बार यह चाहा है कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पँखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं तुम्हारे बच्चों को इकट्ठा करूँ, लेकिन तुम ने यह नहीं चाहा।

[35] देखो! तुम्हारा घर तुम्हारे लिए उजाड़ छोड़ा जाता है, और मैं तुम से कहता हूँ जब तक तुम नहीं कहोगे, धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है, तब तक तुम मुझे फिर से न देखोगे।"

लूका सुसमाचार — Chapters