[1] लोगों को यह सिखाने के लिए कि उन्हें कभी मायूस नहीं होना चाहिए, लेकिन परमेश्वर पिता से प्रार्थना करते रहना चाहिए,
[2] यीशु ने यह बताया कि, "एक शहर में एक जज था जो न इस दुनिया के मालिक से डरता था और न इन्सान की इज़्ज़त करता था।
[3] एक बार उसी शहर की रहने वाली एक विधवा उसके पास आकर कहने लगी, "मेरे दुश्मन के खिलाफ़ मुझे इन्साफ़ दिलाओ।"
[4] कुछ समय तक उस जज ने उसकी बिनती की परवाह नहीं की, लेकिन बाद में उसने अपने आप से कहा, "हालाँकि न ही मैं परमेश्वर से डरता हूँ और न इन्सान की इज़्ज़त करता हूँ,
[5] फिर भी क्योंकि यह विधवा मुझे परेशान करती रहती है, मैं उसे इन्साफ़ दिला कर रहूँगा।"
[6] यीशु ने कहा, "देखा तुम ने कि उस जज का रवैया कैसा था?
[7] इसलिए जो लोग सब्र से सहते रहते हैं और जो दिन रात परमेश्वर को पुकारते हैं, उन्हें क्या वह इन्साफ़ नहीं दिलाएँगे?
[8] मैं तुमको बताए देता हूँ, कि वह बहुत ही जल्दी उनके लिए इन्साफ़ का काम करेंगे। फिर भी जब मैं दोबारा आऊँगा तो कितने लोगों को पा सकूँगा जिनमें विश्वास होगा?"
[9] कई दृष्टांत यीशु ने उन लोगों को बताए जो अपने आप को बहुत मज़हबी समझते थे और दूसरे लोगों को नीचा या कम समझा करते थे।
[10] दो जन मन्दिर में भजन कीर्तन करने गए। एक फ़रीसी था, दूसरा टैक्स लेने वाला।
[11] फ़रीसी खड़ा होकर परमेश्वर से कहने लगा, 'हे मालिक, मैं शुक्रगुजा़र हूँ कि मैं दूसरों की तरह नहीं हूँ, डाका डालने वाला, बेइन्साफ़, कुकर्मी या इस टैक्स इकट्ठा करने वाले की तरह।
[12] हर हफ़्ते मैं दो बार उपवास रखता हूँ। हर चीज़ का दसवाँ भाग देता हूँ।"
[13] टैक्स इकट्ठा करने वाले ने आसमान की ओर नज़र उठाने की हिम्मत भी नहीं की और छाती पीटते हुए कहा, 'हे परमेश्वर, मुझ दुष्ट पर रहम (दया) कर।"
[14] क्या तुम्हें यह मालूम है कि यह दूसरा इन्सान बेगुनाह ठहराया गया। इसलिए कि हर इन्सान जो अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह नीचा किया जाएगा, और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, ऊपर उठाया जाएगा।"
[15] वे लोग छोटे बच्चों को यीशु के पास लाए ताकि वह उन्हें छुए, लेकिन जब शिष्यों ने देखा, तो लोगों को घुड़का।
[16] यीशु ने उन्हें अपने पास बुलाकर कहा, "छोटे बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना मत करो, क्योंकि अबोध लोग ही परमेश्वरीय राज्य के हिस्सेदार बनते हैं।
[17] मैं सच कहता हूँ, कि जो छोटे बच्चों की तरह परमेश्वरीय राज्य को नहीं अपनाते, वे उसमें कभी दाखिला नहीं पाएँगे।
[18] एक ऑफ़िसर ने यीशु से पूछा, "अच्छे गुरू, अनन्त जीवन पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?"
[19] यीशु बोले, "मुझे अच्छा क्यों कह रहे हो? परमेश्वर को छोड़कर कोई अच्छा नहीं है।
[20] तुम आज्ञाओं को तो जानते होः कुकर्म न करना, खून न करना, चुराना नहीं, झूठी गवाही से बचना और अपने माता-पिता जी की इज़्ज़त करना।"
[21] उस ने कहा, "ये सब मैं जवानी से करता आ रहा हूँ।"
[22] यह सुनने के बाद यीशु ने कहा, "अभी भी तुम में एक कमी है। जो कुछ तुम्हारे पास है, वह सब गरीबों में बाँट दो और स्वर्ग में तुम्हें खज़ाना मिलेगा। हाँ, मेरे शिष्य भी बन जाओ।"
[23] यह सब सुनकर वह अफ़सोस करने लगा क्योंकि वह बहुत दौलतमन्द था।
[24] उस आदमी को दुखी देखकर यीशु ने कहा, "अमीर लोगों के लिए परमेश्वर के राज्य में दाखिल होना कितना मुश्किल है।
[25] क्योंकि एक ऊँट के लिए सुई के नाके में से निकलना आसान है, लेकिन अमीर आदमी का परमेश्वर के राज्य में दाखिल होना कठिन है।"
[26] तब वहाँ पर खड़े सुनने वालों ने कहा, "तो पापों की क्षमा कौन पा सकेगा?"
[27] तभी यीशु ने कहा, "जो बातें इन्सान से नहीं हो सकती हैं, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कर सकते हैं।"
[28] तब पतरस ने जवाब में कहा, "देखिए, हम सब कुछ छोड़कर आपके शिष्य बन गए हैं।"
[29] यीशु ने उस से कहा, "सच तो यह है कि ऐसा कोई नहीं है, जिसने घर, माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी या बच्चों को परमेश्वर के राज्य के लिए छोड़ दिया हो,
[30] लेकिन इसी दुनिया में कई गुना और आने वाली दुनिया में हमेशा की ज़िन्दगी न पाए।"
[31] तब बारहों को पास लाकर, यीशु ने उन से कहा, "हम सब यरूशलेम को रवाना होंगे और जो बातें मेरे बारे में नबियों ने कही थीं, पूरी होंगी।
[32] क्योंकि उसे गैर यहूदियों के हाथ सुपुर्द किए जाने के साथ उसकी बेइज़्ज़ती की जाएगी, हँसी उड़ायी जाएगी और उस पर थूका जाएगा।
[33] वे लोग उसे कोड़े मारेंगे और उसकी जान ले लेंगे, लेकिन वह तीसरे दिन जी उठेगा।"
[34] ये सब बातें उनकी समझ में नहीं आयीं और उन से छिपी रहीं और जो कुछ उन से कहा जा रहा था, वे समझ नहीं पाए।
[35] जब यीशु यरीहो के पास पहुँचे तो उन्हों ने एक भिखारी को बैठे भीख माँगते हुए देखा।
[36] वहाँ से भीड़ के गुज़रने का एहसास होते ही उसने हलचल का कारण पूछा।
[37] लोगों ने उत्तर दिया, "नासरत के यीशु चले जा रहे हैं।"
[38] चिल्लाते हुए उसने कहा, "दाऊद के बेटे मुझ पर रहम कीजिए।"
[39] सामने जाने वाले लोगों ने उसे डाँटा कि चुप रहे। लेकिन वह और ऊँची आवाज़ में चिल्लाया, "दाऊद के बेटे, मुझ पर दया करें।"
[40] यीशु वहीं रुक गए और उन्हों ने आदेश दिया कि उसे उनके पास लाया जाए।
[41] उसके पास आते ही यीशु ने उससे पूछा कि वह चाहता क्या है। उसने कहा, "यही कि मैं देखने लगूँ।"
[42] यीशु बोले, "तुम देखने लगो, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें अच्छा कर दिया है।"
[43] उसी समय से वह देखने लगा। परमेश्वर की तारीफ़ करने के साथ ही वह यीशु को मानने लगा और सभी लोगों ने यह देखकर परमेश्वर की स्तुति की।