[1] जो कुछ हमारे बीच में होता रहा है, उन सभी बातों के बारे में दूसरे लोगों ने भी लिखा है।
[2] परमेश्वर के वायदों को पूरा होते हुए उनके शिष्यों ने और दूसरे लोगों ने देखा था।
[3] हे थियुफ़िलुस, सभी बातों की छान-बीन करके मैंने सावधानी से सब कुछ लिखने का इरादा किया,
[4] ताकि तुम यह जान लो कि जो शिक्षा तुम ने पायी है, वह पूरी तरह से खरी है।
[5] यहूदियों के राजा हेरोदेस के समय 'अबिय्याह के दल' में ज़कर्याह नाम का एक पुरोहित था। उसकी पत्नी एलिजाबेथ हारून के वंश की थी।
[6] परमेश्वर पिता की निगाह में वे दोनों खरा जीवन बिताते थे। वे सभी आज्ञाओं और रीति-विधियों को बहुत सावधानी से मानते थे।
[7] एलिज़ाबेथ के बांझ होने की वजह से उनकी कोई औलाद नहीं थी, और अब तो वे बूढ़े हो गए थे।
[8] प्रार्थना भवन (मन्दिर) में एक बार उसके दल की बारी होने के कारण वह वहाँ सेवा में लगा था।
[9] प्रथा के अनुसार पर्ची उठाए जाने के द्वारा उसे भवन में पवित्र जगह में जाकर धूप जलाने का काम मिला था।
[10] धूप जलाए जाने के समय लोगों का एक बड़ा झुण्ड बाहर खड़ा प्रार्थना कर रहा था।
[11] उसी समय, धूप की वेदी की दाहिनी तरफ़ प्रभु का एक स्वर्गदूत उसे दिखाई पड़ा।
[12] उसे देखते ही ज़कर्याह घबरा गया और डर ने उसे जकड़ लिया।
[13] लेकिन स्वर्गदूत ने उससे कहा, "हे ज़कर्याह, डरो मत, क्योंकि तुम्हारी बिनती सुन ली गई है और तुम्हारी पत्नी एलिज़ाबेथ से तुम्हें एक बेटा होगा। उसका नाम तुम यूहन्ना रखना।
[14] तुम्हें बड़ी खुशी होगी और दूसरे लोग भी उसके जन्म से खुश होंगे।
[15] प्रभु की निगाह में वह महान होगा। वह न शराब (मदिरा, दाखरस) पीएगा और न कोई नशीली चीज़ लेगा। वह अपनी माँ के गर्भ से ही पवित्र आत्मा से भरपूर होगा।
[16] वह बहुत से इस्राएलियों का मन उनके परमेश्वर पिता की तरफ़ कर देगा।
[17] वह एलिय्याह की आत्मा और ताकत में बढ़ता जाएगा, ताकि बहुत से पिताओं के मन को अपने बच्चों की तरफ़ और अनाज्ञाकारी मनों को सच्चे ज्ञान की तरफ़ मोड़े, जिससे वे लोग परमेश्वर पिता के लिए तैयार हों।"
[18] जकर्याह ने स्वर्गदूत से कहा, "मैं यह कैसे जानूँगा, क्योंकि मैं और मेरी पत्नी तो बूढ़े हो चुके हैं?"
[19] स्वर्गदूत ने उस से कहा, "मैं जिब्राईल हूँ, और सर्वशक्तिमान की उपस्थिति में रहता हूँ। मैं तुम्हें यह अच्छी खबर देने के लिए भेजा गया हूँ।
[20] देखो, जिस दिन तक ये बातें पूरी न हों, तब तक तुम बोल न सकोगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि तुम ने मेरी बातों पर जो अपने समय में पूरी होंगी, शक किया।"
[21] इसी बीच ज़कर्याह के बाहर आने का इंतज़ार करने वाले झुण्ड को यह आश्चर्य लगा कि वह इतनी देर भवन में क्यों रह गया।
[22] जब वह बाहर आया, तो वह बोल नहीं पा रहा था। तब वे समझ गए कि प्रार्थना भवन में उसने ज़रूर कोई दर्शन देखा होगा। इसलिए वह गूँगा हो गया था और हाथों से इशारा कर रहा था।
[23] जब उसका प्रार्थना भवन में सेवा करने का समय खत्म हुआ, तब वह अपने घर चला गया।
[24] कुछ समय बाद उसकी पत्नी एलिज़ाबेथ गर्भवती हुई, और पाँच महीने तक उसने इस बात को छिपाकर रखा।
[25] उसने कहा, "लोगों के बीच में से मेरी बदनामी दूर करने के लिए प्रभु ने मेरे लिए ऐसा किया है।"
[26] एलिज़ाबेथ के गर्भवती होने के छठे महीने में गलील के एक शहर नासरत में जिब्राईल स्वर्गदूत
[27] मरियम नाम की एक कुवाँरी के पास भेजा गया, जिसकी सगाई दाऊद के वंशज यूसुफ़ से हुई थी।
[28] स्वर्गदूत ने आकर मरियम से कहा, "खुशी मनाओ। प्रभु तुम्हारे साथ हैं और उनकी बड़ी कृपा तुम पर हुयी है।"
[29] स्वर्गदूत की यह बात सुनकर मरियम उलझन में पड़ गई और उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह किस तरह का अभिवादन है।
[30] स्वर्गदूत ने उससे कहा, "हे मरियम, तुम डरो मत, क्योंकि तुम पर प्रभु की बड़ी कृपा हुयी है।
[31] देखो, तुम्हारे एक बेटा पैदा होगा, जिसका नाम तुम यीशु रखना।
[32] वह महान होगा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का बेटा कहलाएगा। प्रभु परमेश्वर उस बेटे के पूर्वज दाऊद के तख्त पर उन्हें बिठाएँगे।
[33] वह हमेशा याकूब के घराने पर शासन करेंगे और उनका शासन कभी खत्म नहीं होगा।"
[34] तब मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, "मेरा तो किसी पुरुष से सम्बन्ध ही नहीं है। यह हो कैसे सकता है?"
[35] स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, "पवित्र आत्मा तुम्हारे ऊपर उतरेगा, और महाशक्तिशाली की ताकत तुम्हारे ऊपर छा जाएगी। इसलिए जो पवित्र जन पैदा होगा, वह परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।
[36] और देखो, तुम्हारी रिश्तेदार एलिज़ाबेथ भी अपने बुढ़ापे में गर्भवती हुई है। हालाँकि वह बांझ थी, फिर भी उसका छठा महीना चल रहा है।
[37] परमेश्वर के मुख से निकली बात असर रहित नहीं होती है।"
[38] मरियम ने कहा, "देखो, मैं प्रभु की सेविका हूँ, इसलिए जो तुम कह रहे हो, वैसा ही हो।" तब स्वर्गदूत वहाँ से चला गया।
[39] मरियम तुरन्त उठी और पहाड़ी प्रदेश के यहूदा नगर में ज़कर्याह के घर जाकर एलिज़ाबेथ से मिली और उसे बधाई देने लगी।
[41] मरियम की बधाई सुनते ही एलिज़ाबेथ के गर्भाशय में बच्चा उछल पड़ा, और एलिज़ाबेथ पवित्र आत्मा से भर गई।
[42] ऊँची आवाज़ में वह बोल पड़ी, "महिलाओं में तुम बड़ाई के लायक हो, और तुम्हारे गर्भ में जो है, वह भी।
[43] मुझे यह मौका कैसे दिया गया कि मेरे प्रभु की माता मुझ से मिलने आए?
[44] जैसे ही तुम ने मुझे बधाई दी, वैसे ही बच्चा मेरे गर्भ में खुशी से उछल पड़ा।
[45] वह इन्सान सच में सुखी है जिसने प्रभु के दिए हुए वायदों के पूरे होने पर विश्वास किया है।"
[46] मरियम बोली, "मेरा मन प्रभु की बड़ाई करता है।
[47] और मेरी आत्मा मेरे मुक्तिदाता परमेश्वर में खुश होती है।
[48] इसलिए कि अपनी सेविका की दीन हालत पर उन्हों ने दया दिखायी है, देखो, अब से सभी युगों के लोग मुझे आशीषित कहेंगे।
[49] क्योंकि उस शक्तिमान ने मेरे लिए बड़े कामों को किया है, और उनका नाम पवित्र है।
[50] पीढ़ी दर पीढ़ी उन लोगों पर उनकी कृपा बनी रहती है, जो उनकी इज़्ज़त करते हैं।
[51] उन्हों ने अपनी बाँह की ताकत दिखाई है। जो लोग मन ही मन घमण्ड करते हैं, उन्हें प्रभु ने तित्तर-बित्तर कर डाला है।
[52] ताकतवरों को उन्हों ने गद्दी से गिरा दिया है और नम्र लोगों को इज़्ज़त का पद दिया है।
[53] भूखों को उन्हों ने अच्छी चीज़ें खाने के लिए दीं और अमीरों को खाली हाथ भेज दिया।
[54] उन्हों ने अपने सेवक इस्राएल को सम्भाल लिया।
[55] उन्हों ने अपनी कृपा की वजह से इस्राएल की मदद की है, क्योंकि उन्हों ने हमारे पूर्वज अब्राहम और उसके बच्चों से वायदा किया था कि वह हमेशा उनके प्रति कृपालु रहेंगे।"
[56] वहाँ पर तीन महीने रहने के बाद, मरियम अपने घर वापस आ गयी।
[57] जब समय पूरा हुआ, एलिज़ाबेथ के एक बेटा पैदा हुआ।
[58] प्रभु की दिखायी गयी बड़ी कृपा के बारे में सुनकर उसके पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने उसके साथ खुशियाँ मनाईं।
[59] आठवें दिन उस बच्चे का खतना संस्कार करते समय, लोगों ने उसके पिता ज़कर्याह का नाम ही उसे देना चाहा।
[60] परन्तु उसकी माँ ने मना करते हुए कहा कि उसका नाम 'यूहन्ना' रखा जाए।
[61] लेकिन वहाँ इकट्ठा लोगों ने उस से कहा, "तुम्हारे रिश्तेदारों में तो इस नाम का कोई नहीं है!"
[62] तब उन लोगों ने इशारा करके उसके पिता ज़कर्याह से पूछा कि उसकी राय क्या है?
[63] उसने एक लिखने की पटिया मँगाकर उस पर लिख दियाः इसका नाम यूहन्ना है। यह देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।
[64] तब ज़कर्याह का मुँह और जीभ तुरन्त खुल गए, और वह बोलने और परमेश्वर का धन्यवाद करने लगा।
[65] इस बात को देखकर आस पास के सब रहने वाले लोगों पर भय छा गया और उन बातों की चर्चा यहूदिया के पहाड़ी देश में फैल गयी।
[66] सुनने वाले यह सोचने लगे कि, "यह बच्चा बड़ा होने पर कैसा होगा?" क्योंकि प्रभु उसके साथ थे।
[67] और उसका पिता ज़कर्याह पवित्र आत्मा से ओत-प्रोत होकर पवित्र आत्मा की प्रेरणा से कहने लगा,
[68] "इस्राएल के परमेश्वर की बड़ाई हो, क्योंकि उन्हों ने अपने लोगों पर निगाह की है और उन्हें आज़ादी दी है,
[69] उन्हों ने दाऊद के वंश में हमारे लिए सामर्थी मुक्तिदाता को दिया है,
[70] (जैसा उन्हों ने अपने समर्पित नबियों के द्वारा जो दुनिया की शुरूआत से होते आए हैं, कहा था),
[71] अर्थात् उन्हों ने हमें हमारे दुश्मनों से, और हमारे सब बैरियों के हाथ से छुड़ाया है,
[72] कि हमारे बुजुर्गों पर दया करके अपने अटूट वायदे को याद करें,
[73] और वह वायदा जो परमेश्वर ने हमारे पिता अब्राहम से किया था,
[74] वह यह कि हम अपने दुश्मनों के हाथ से छूटकर,
[75] उनके सामने शुद्धता और खरेपन से ज़िन्दगी भर बिना डर उनकी सेवा करते रहें।
[76] और बेटा, तुम सर्वशक्तिमान जग के स्वामी (परमप्रधान) के नबी कहलाओगे, क्योंकि प्रभु (यीशु) की सेवकाई की तैयारी में उन से पहले तुम लोगों को सिखाओगे,
[77] ताकि उनके लोगों को गुनाहों (पापों) की मुआफ़ी से मिलने वाली मुक्ति की जानकारी मिले,
[78] यह हमारे परमेश्वर पिता की तरफ़ से आने वाली बड़ी कृपा से होगा,
[79] ताकि जो लोग मौत की छाया में और अँधेरे में हैं, उन्हें रोशनी मिल सके और मेल के रास्ते में चलने के लिए मार्गदर्शन भी।"
[80] और यूहन्ना इस्राएलियों को सिखाने के दिन तक देह और आत्मा में मज़बूत होता गया, और जंगलों में ही रहा।