[1] उन दिनों में औक्टोवियन (औगस्तुस) नामक रोमी राजा ने यह आज्ञा दी कि रोमी साम्राज्य के सभी नागरिकों की जनगणना का काम हो।
[2] यह पहली जनगणना तब हुई जब क्विरिनियुस सीरिया का राज्यपाल था।
[3] सभी लोग अपना नाम दर्ज़ कराने के लिए अपने-अपने नगर के जनगणना केन्द्र को जाने लगे।
[4] इसलिए यूसुफ़, जो दाऊद के वंश का था, गलील के नासरत से यहूदिया के बेतलेहम को गया,
[5] ताकि अपनी मंगेतर मरियम के साथ जो गर्भवती थी, नाम लिखवाए।
[6] फिर ऐसा हुआ कि उनके वहाँ रहते हुए मरियम के प्रसव के दिन पूरे हो गए।
[7] और उसने अपने पहलौठे बेटे को जन्म देने के बाद उन्हें कपड़ों में लपेटकर चरनी में रखा, क्योंकि धर्मशाला में लोग ठसाठस भरे थे।
[8] उसी प्रदेश में कुछ चरवाहे, रात के समय में मैदान में अपनी भेड़ों की रखवाली कर रहे थे।
[9] अचानक प्रभु का एक दूत उनके सामने आ प्रगट हुआ और एक बड़ी रोशनी चमक उठी और वे बहुत डर गए।
[10] तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, "मत डरो, क्योंकि मेरे पास तुम्हारे और सभी के लिए एक खुशी का समाचार है।
[11] क्योंकि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिए एक मुक्तिदाता पैदा हुआ है, और यही 'मसीह प्रभु' हैं।
[12] इसका तुम्हारे लिए यह निशान होगा कि तुम एक बच्चे को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में लेटा हुआ पाओगे।"
[13] तब एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ दूतों का झुण्ड परमेश्वर की बड़ाई करते और यह कहते हुए दिखाई दिया,
[14] "आसमान में परमेश्वर की महिमा (शान) और धरती पर इन्सान के साथ उनका मेल हो।"
[15] और ऐसा हुआ कि जब स्वर्गदूत वापस आकाश में ओझल हो गए तो चरवाहे आपस में कहने लगे, "आओ, जो कुछ हुआ है और प्रभु ने हमें बताया है, उसे देखने हम बेतलेहम चलें।"
[16] तुरन्त उन्हों ने ऐसा किया और वहाँ पहुँचकर बच्चे को चरनी में और यूसुफ़ मरियम को पास में देखा।
[17] यह देखकर उन्हों ने वह सब कह डाला, जो बच्चे के बारे में उन से कहा गया था।
[18] चरवाहों की उन बातों को सुनकर सभी अचम्भित हो गए।
[19] लेकिन मरियम इन सब बातों को अपने मन में रखकर सोचती रही।
[20] जैसे चरवाहों से कहा गया था, सब कुछ वैसा ही सुनकर और देखकर परमेश्वर की बड़ाई और धन्यवाद करते हुए वे लौट गए।
[21] आठ दिन पूरे होने पर खतना संस्कार के समय बच्चे का नाम यीशु रखा गया - वही नाम जो मरियम के गर्भ में आने से पहले स्वर्गदूत ने दिया था।
[22] यहूदी प्रथा के अनुसार जब उनके शुद्ध ठहरने के दिन पूरे हुए तो वे बच्चे को प्रभु के लिए अर्पित करने के लिए यरूशलेम में लाए।
[23] ऐसा यहूदी धर्म में लिखा हैः "हर एक पहिलौठा परमेश्वर के लिए अलग किया जाएगा।"
[24] यह भी कि एक जोड़ा पंडुक या कबूतर के दो बच्चों को लाकर चढ़ाएँ।
[25] यरूशलेम में शमौन नाम का एक ईमानदार इन्सान था। वह इस्राएल की शान्ति का इंतज़ार कर रहा था और पवित्र आत्मा उस पर था।
[26] पवित्र आत्मा ने उसे बताया था कि जब तक वह मुक्तिदाता को देख न ले, तब तक मरेगा नहीं।
[27] पवित्र आत्मा की प्रेरणा से वह प्रार्थना भवन में आया और जब माता-पिता अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारी को पूरा करने बालक यीशु को प्रार्थना भवन में लाए,
[28] तब उसने बालक यीशु को गोद में लेकर परमेश्वर की बड़ाई करते हुए कहा,
[29] "हे स्वामी, अब अपनी कही बात के अनुसार आप अपने सेवक को इस धरती पर से विदा करें।
[30] क्योंकि मैंने अपनी आँखों से मुक्ति (मुक्तिदाता) को देख लिया है,
[31] जिन्हें आप ने सब देशों के लोगों के लिए दिया है,
[32] सारी दुनिया के देशों को परमेश्वर का ज्ञान देने के लिए वह रोशनी और आपकी प्रजा इस्राएल के लिए महिमा (शान) हैं।"
[33] जो कुछ भी उनके बारे में कहा गया था, उन सब के बारे में बच्चे के माता-पिता आश्चर्य कर रहे थे।
[34] तब शमौन ने उनके विषय भली बातें कहकर उनकी माता मरियम से कहा, "देखो, इस्राएल में बहुत से लोग इस बालक को ठुकरा देंगे और इस से उन्हीं का नुकसान होगा लेकिन दूसरे बहुत से लोगों के लिए वह बड़ी खुशी का कारण होगा।
[35] बहुत से लोगों के मन की बातें सामने आ जाएँगी और एक तलवार तुम्हारे प्राण को भेद डालेगी।"
[36] अन्ना नाम की एक बहुत बुज़ुर्ग नबिया थी। वह आशेर कबीले के फ़नूएल की बेटी थी। उसकी शादी के सात साल बाद ही उसके पति का देहान्त हो गया था और तभी से वह विधवा थी।
[37] वह चौरासी साल की हो चुकी थी। वह उपवास और भजन कीर्तन के साथ वहीं प्रार्थना भवन में रात दिन गुज़ारा करती थी।
[38] जब शमौन मरियम और यूसुफ़ से बातें कर रहा था, वह तभी वहाँ आ पहुँची और परमेश्वर पिता की बड़ाई करने लगी। हर एक जन जो प्रतिज्ञा किए हुए राजा के आने और यरूशलेम के आज़ाद किए जाने का इंतज़ार कर रहा था, उन सब से वह यीशु के विषय में बातें करने लगी।
[39] यहूदी नियमों को पूरा करने के बाद मरियम और यूसुफ़ गलील के नासरत को अपने घर लौट गए।
[40] वहीं बालक यीशु अपने स्वास्थ्य और उम्र में बढ़ते गए। अपनी उम्र के हिसाब से भी ज़्यादा उन में बुद्धि थी। परमेश्वर की खास कृपा उनके ऊपर थी।
[41] यीशु के माता-पिता हर साल फ़सह के त्यौहार के समय यरूशलेम जाते थे।
[42] यीशु की बारह साल की उम्र में त्यौहार की प्रथा के अनुसार वे यरूशलेम गए हुए थे।
[43] वहाँ त्यौहार खत्म होने पर, जब वे वापस लौट रहे थे तब बालक यीशु वहीं रह गया था। यह बात यूसुफ़ और मरियम को पता नहीं थी।
[44] यह सोचकर कि लोगों के झुण्ड ही में अन्य यात्रियों के साथ वह होंगे, वे एक दिन की यात्रा करते हुए काफ़ी दूर निकल गए। तब उनके अपने रिश्तेदारों और जान पहचान वालों ही में वे उन्हें ढूँढने लगे।
[45] उन्हें वहाँ न पा सकने पर वे उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते यरूशलेम पहुँचे।
[46] तीन दिन के बाद उन्हों ने बालक यीशु को प्रार्थना भवन में शिक्षकों के साथ बैठे, सवाल जवाब करते पाया।
[47] यीशु को सुनने वाले उनकी बुद्धिमानी की बातें सुनकर और सवाल पूछने की कला पर आश्चर्यचकित थे।
[48] उन्हें देखते ही वे अचरज में पड़ गए और उनकी माता ने उन से कहा, "बेटा, तुम ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? तुम्हारे पिताजी और मैं तुम्हें ढूँढ-ढूँढकर परेशान हो रहे हैं।”
[49] यीशु ने जवाब दिया, "यह क्या कि आप मेरी वजह से परेशान हो रहे थे, आप मुझे क्यों ढूँढ रहे थे? क्या आपको यह नहीं मालूम कि मुझे अपने पिता के काम में लगे रहना है?"
[50] वे यीशु की इस बात को समझ नहीं पाए।
[51] उसके बाद वह उनके साथ नासरत आ गये और वहीं उनकी आधीनता में रहे, लेकिन मरियम ने ये सब बातें अपने मन में रखीं।
[52] और यीशु बुद्धि, आयु, कद काठी और परमेश्वर तथा लोगों के स्नेह में उन्नति करते गए।