[1] किसी एक दिन जब यीशु अपने शिष्यों के साथ लोगों को सुसमाचार दे रहे थे, प्रधान पुरोहित और शिक्षक, बुजुर्ग लोगों के साथ वहाँ आ खड़े हुए।
[2] उनका कहना था, कि यीशु यह बताएँ कि किस के अधिकार में होकर वह यह सब कर रहे थे या किसने यीशु को यह अधिकार दिया था।
[3] यीशु ने जवाब में कहा, "मैं भी एक बार तुम से पूछना चाहूँगा, तुम जवाब दो।
[4] यूहन्ना का बपतिस्मा परमेश्वर की ओर से था या इन्सान की ओर से?"
[5] वे आपस में कहने लगे, "अगर हम कहें परमेश्वर की तरफ़ से, तो यीशु कहेंगे कि फिर तुम ने उस पर भरोसा क्यों नहीं किया।
[6] अगर हम कहें, वह मनुष्य की बनायी हुयी शिक्षा थी, तो सब लोग हमको पत्थरवाह कर देंगे, क्योंकि यूहन्ना को वे एक नबी समझते थे।"
[7] इसलिए उन्हों ने उत्तर दिया, "हमें कुछ नहीं मालूम।"
[8] यीशु ने भी उन से कहा, "मैं भी तुम्हें यह नहीं बताता कि मैं किसके अधिकार से यह सब करता हूँ।"
[9] तब यीशु लोगों को यह दृष्टांत बताने लगे, "एक आदमी ने अंगूर का बगीचा लगाया और किसानों के हाथ ज़िम्मेदारी देकर बहुत दिनों के लिए दूर देश चला गया।
[10] फ़सल काटे जाने के समय उसने एक नौकर को मज़दूर किसानों के पास भेजा ताकि वे बगीचे से कुछ अंगूर उसे दें, लेकिन उन मजदूरों ने उसे मार पीट कर खाली हाथ वापस भेज दिया।
[11] फिर उसने दूसरे नौकर को भेजा। उसके साथ भी उन्हों ने वैसा ही बर्ताव किया।
[12] तब उसने तीसरा नौकर भेजा, लेकिन उसे भी ज़ख्मी करके बाहर फेंक दिया गया।
[13] तब उस बगीचे के मालिक ने कहा, "मैं क्या करूँ? अब मैं अपने बेटे को भेजूँगा। शायद उसे देख कर वे उसे इज़्ज़त देंगे।"
[14] जैसे ही अंगूर के बगीचे के उन मज़दूरों ने उसे देखा, तो कहा, "यह तो जायदाद का मालिक है, आओ, इसे मार डालें ताकि सब कुछ हमारा हो जाए।"
[15] इसलिए उन लोगों ने उसे बगीचे के बाहर मार डाला। ऐसे में बगीचे का मालिक उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा?
[16] उसने आकर उन बगीचे के मज़दूरों को मार डाला और बगीचा दूसरों को दे दिया।" यह सब सुनने पर उन्हों ने कहा, "परमेश्वर न करे ऐसा हो।"
[17] उसने उनको देखकर कहा, "तो वह लिखी हुई बात किसके लिए है? जिस पत्थर को ठेकेदारों ने बेकाम का समझा था, वही कोने का पत्थर ठहरा है।
[18] जो कोई इस पत्थर पर गिरेगा, वह बर्बाद हो जाएगा; लेकिन जिस पर यह पत्थर गिरेगा, वह चकनाचूर हो जाएगा।"
[19] उस समय प्रधान पुरोहित और शास्त्री इस धुन में थे कि यीशु को किसी तरह पकड़ लें, लेकिन उन्हें लोगों का डर था। वे यह समझ गए थे कि यीशु इस दृष्टान्त से उन्हीं की तरफ़ इशारा कर रहे थे।
[20] वे यीशु की ताक में लगे थे और उन्हों ने जासूस भेजे कि धर्म का भेष धर कर यीशु की कोई न कोई बात पकड़ें, ताकि उन्हें गवर्नर के हाथ और अधिकार में सौंप दें।
[21] यीशु से बातचीत करते हुए, उन लोगों ने पूछा, "गुरू जी, इस में कोई शक नहीं कि आप परमेश्वर का रास्ता बताते और खरा उपदेश देते हैं और किसी की तरफ़दारी नहीं करते हैं।
[22] बताइए कि हमें कैसर को टैक्स देना चाहिए या नहीं?"
[23] उनकी चालाकी को जानकर यीशु ने उन लोगों से कहा, "तुम मेरी परख क्यों कर रहे हो?
[24] चाँदी का सिक्का मुझे दिखाओ। इसके ऊपर किसकी तस्वीर खुदी हुयी है?" उन लोगों ने कहा, "राजा की"।
[25] यीशु बोले, "जो राजा का हिस्सा है वह राजा को दो और जो कुछ परमेश्वर का है वह परमेश्वर को।"
[26] यीशु के लोगों की मौजूदगी की वजह से, यीशु की कही हुयी बातों पर न ही उनके विरोधियों ने कुछ टीका टिप्पणी की, और न ही कोई जवाब दिया।"
[27] तब जी उठने पर विश्वास न करने वाले सदूकियों ने आकर सवाल किया,
[28] "गुरूजी, मूसा ने लिखा है कि अगर कोई आदमी जिसके बच्चे नहीं हैं, मर जाए तो उसका भाई उस महिला से ब्याह करके अपने भाई के लिए औलाद पैदा करे।
[29] मान लें कि सात भाई थे और पहले का ब्याह तो हुआ, लेकिन इसके पहले कि बच्चे हों, वह मर गया।
[30] दूसरे भाई ने उस महिला से शादी की, लेकिन वह भी निःसन्तान मर गया।
[31] तीसरे भाई ने उस महिला को अपनी बीवी करके अपना लिया इस तरह से सभी सात भाई निःसन्तान मर गए।
[32] आखिर में वह महिला भी चल बसी।
[33] इसलिए जब सब जी उठेंगे, तो वह किसकी पत्नी कहलाएगी, क्योंकि वह तो सातों भाइयों की पत्नी रही थी?"
[34] जवाब में यीशु ने कहा, "इस दुनिया के लोग ब्याह करते और करवाते हैं।
[35] लेकिन जो लोग इस लायक होंगे कि आने वाली दुनिया के वारिस हों और जी उठने वालों में उनकी गिनती हो, उनके लिए वहाँ ब्याह नहीं है।
[36] वे लोग फिर मरेंगे भी नहीं क्योंकि वे स्वर्गदूतों (फ़रिश्तों) की तरह होंगे और वे परमेश्वर की संतान हैं जो एक नया जीवन जीने के लिए जिलाए जाएँगे।
[37] अब यह कि मुर्दे जिलाए जाएँगे या नहीं, मूसा ने भी झाड़ी की घटना में बताया है। अब्राहम, इसहाक और याकूब के मरने के बहुत समय बाद वह परमेश्वर को अब्राहम, इसहाक और याकूब का परमेश्वर कहता है।
[38] परमेश्वर मुर्दों के नहीं, लेकिन जीवित लोगों के हैं, क्योंकि परमेश्वर के नज़दीक सभी जीवित हैं।"
[39] यह सुनकर शास्त्रियों में से कुछ ने कहा, "हे गुरू, आप ने अच्छा कहा।"
[40] इसके बाद उन में से किसी को कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुयी।
[41] यीशु ने उन लोगों से कहा, "मसीह दाऊद का बेटा क्यों कहलाता है?
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[43] दाऊद ने भी खुद भजन की किताब में लिखा है, 'प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, जब तक मैं तुम्हारे दुश्मनों को तुम्हारे वश में न कर दूँ, सारे अधिकार को थामे रखो।'
[44] दाऊद उन्हें प्रभु कहकर पुकारता है, तो फिर वह (यीशु) उसकी सन्तान कैसे हुए?"
[45] लोग उनकी बात को सुन रहे थे, तभी यीशु ने अपने चेलों से कहा,
[46] "शास्त्रियों से सावधान रहो। उनको लम्बे लम्बे चोगे पहनकर घूमना अच्छा लगता है। वे बाज़ारों में लोगों से नमस्कार लेते फिरते हैं। उन्हें सभा-सम्मेलनों में आगे की जगह और दावतों में मुख्य स्थान पसंद होते हैं।
[47] वे विधवाओं पर अन्याय करके उन्हें लूट लेते हैं, और दिखावे के लिए लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करते हैं। इन्हें तो भारी सज़ा मिलेगी।"