[1] उस पहली वाचा में भी सेवा के नियम थे और ऐसा पवित्र स्थान जो इस दुनिया का था।
[2] इस में एक तम्बू था। तम्बू में पहले दीवट, और मेज़, और भेंट की रोटियाँ थीं। वह पवित्र स्थान कहलाता है।
[3] दूसरा परदे के पीछे वह तम्बू था, जो परम पवित्र-स्थान कहलाता है।
[4] उसमें सोने की धूपदानी, और चारों ओर से सोने से मढ़ा हुआ वाचा का बक्सा और इस में मन्ना से भरा हुआ सोने का मर्तबान और हारून की छड़ी, जिसमें फूल निकल आए थे और वाचा की पटियाँ थीं।
[5] बक्से के ऊपर दोनों तेज से भरे करूब थे, जो प्रायश्चित् के ढक्कन पर छाया किए हुए थे। इन का एक-एक करके वर्णन करने का अभी अवसर नहीं है।
[6] जब ये वस्तुएँ इस रीति से तैयार हो चुकीं, तब पहले तम्बू में तो पुरोहित कभी भी प्रवेश करके सेवा के काम निभाते लगे।
[7] परन्तु दूसरे में केवल प्रधान पुरोहित वर्ष भर में एक ही बार जाता था। वहाँ वह खून लेकर जाता था, जिसे वह अपने लिए और लोगों की भूल-चूक के लिए चढ़ाता था।
[8] इस से पवित्र आत्मा यही दिखाता है, कि जब तक पहला तम्बू और यह जो कुछ दर्शाता है खड़ा है, तब तक महा पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं कर सकता।
[9] और यह तम्बू तो वर्तमान समय के लिए एक दृष्टांत है जिसमें ऐसी भेंट और बलिदान चढ़ाए जाते हैं, जिनसे आराधना करने वालों के विवेक शुद्ध नहीं हो सकते।
[10] इसलिए कि वे केवल खाने पीने की वस्तुओं, और भांति-भांति के स्नान विधि के आधार पर शारीरिक नियम हैं, जो नए क्रम (नई वाचा) के आने तक थे।
[11] लेकिन मसीह आने वाली अच्छी-अच्छी वस्तुओं का प्रधान पुरोहित होकर आये, और उन्हों ने और भी बड़े और सिद्ध तम्बू से होकर जो हाथ का बनाया हुआ नहीं, अर्थात् इस दुनिया का नहीं,
[12] और न ही बकरों और बछड़ों के खून से, किन्तु अपने ही खून के द्वारा एक ही बार हमारे लिए अनन्त आज़ादी प्राप्त करके पवित्र स्थान में प्रवेश किया।
[13] क्योंकि जब बकरों और बैलों का खून और बछड़े की राख अशुद्ध लोगों पर छिड़के जाने से बाहरी रूप से शुद्ध किए जाते हैं,
[14] तो मसीह का खून जिसने अपने आप को सनातन आत्मा के द्वारा परमेश्वर के सामने निष्कलंक चढ़ाया, तुम्हारे विवेक को मरे हुए कामों से और ज़्यादा क्यों न शुद्ध करेगा, ताकि हम जीवित परमेश्वर की सेवा करें?
[15] इसी कारण वह नई वाचा के मध्यस्थ हैं, ताकि उस मौत के द्वारा जो पहली वाचा के समय के अपराधों से आज़ादी पाने के लिए हुई है, बुलाए हुए लोग वायदे के अनुसार अनन्त मीरास को प्राप्त करें।
[16] क्योंकि जहाँ वसीयतनामा तैयार किया गया वहाँ वसीयतनामा बनाने वाले की मौत को समझ लेना भी ज़रूरी है।
[17] क्योंकि ऐसा वसीयतनामा मरने पर ही अमल में आता है, और जब तक वसीयतनामा बनाने वाला ज़िन्दा रहता है, तब तक वह काम का नहीं होता।
[18] इसीलिए पहली वाचा भी बिना खून के नहीं बान्धी गई,
[19] क्योंकि जब मूसा सब लोगों को नियमशास्त्र की हर एक आज्ञा सुना चुका, तो उसने बछड़ों और बकरों का खून लेकर, पानी और लाल ऊन, और जूफ़ा के साथ, उस किताब पर और सब लोगों पर छिड़क दिया,
[20] और कहा, "कि यह उस वाचा का खून है, जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने तुम्हारे लिए दी है।"
[21] और इसी तरह से उसने तम्बू और सेवा के सारे सामान पर खून छिड़का।
[22] नियमशास्त्र के अनुसार प्रायः सब वस्तुएँ खून के द्वारा शुद्ध की जाती हैं। बिना खून बहाए गुनाहों की माफ़ी नहीं है।
[23] इसलिए ज़रूरी है कि स्वर्ग की चीज़ों के प्रतिरूप इन बलिदानों द्वारा शुद्ध किए जाएँ, परन्तु स्वर्ग में की वस्तुएँ, इन से भी उत्तम बलिदानों के द्वारा शुद्ध की जातीं।
[24] क्योंकि मसीह ने उस हाथ के बनाए हुए पवित्र स्थान में जो सच्चे पवित्र स्थान का नमूना है, प्रवेश नहीं किया, पर स्वर्ग ही में प्रवेश किया, ताकि हमारे लिए अब परमेश्वर के सामने मौजूद हों।
[25] यह नहीं कि वह अपने आप को बार-बार चढ़ाएँ, जैसा कि प्रधान पुरोहित प्रति वर्ष कुर्बानियों का खून लिए पवित्र स्थान में प्रवेश किया करता था,
[26] नहीं तो दुनिया की शुरूआत से लेकर यीशु को बार-बार दुख उठाना पड़ता, लेकिन अब युग के आखिर में वह एक बार प्रगट हुए हैं, ताकि अपने ही बलिदान के द्वारा गुनाह की सज़ा को उठा लें।
[27] जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद इन्साफ़ का होना ठहराया गया है,
[28] वैसे ही मसीह भी बहुतों के गुनाहों की सज़ा को उठा लेने के लिए एक बार बलिदान हुए। जो लोग उनका इंतज़ार करते हैं, उन्हें सज़ा-मुक्ति के बाद की (भविष्य की) आशीषों को देने के लिये वह बादलों में दिखायी देंगे।