[1] इसलिए जब कि परमेश्वर के आराम (विश्राम) में प्रवेश करने (दाखिल होने) का वायदा अब तक है, तो हमें सावधानी बरतनी चाहिए, ऐसा न हो कि तुम में से कोई व्यक्ति उस वायदे से चूक जाए।
[2] हमें उन्हीं की तरह खुशी का समाचार सुनाया गया है, लेकिन सुने हुए वचन (संदेश) से उन्हें कुछ फ़ायदा न हुआ, क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।
[3] हम जिन्होंने विश्वास किया है, उस चैन में दाखिल होते हैः जैसा परमेश्वर ने कहा कि, "मैंने अपने क्रोध में प्रतिज्ञा की, कि वे मेरे आराम में प्रवेश करने न पाएँगे।" हालांकि सृष्टि की शुरूआत से पहले परमेश्वर के काम पूरे हो चुके थे।
[4] क्योंकि सातवें दिन के विषय में कहीं इस तरह कहा है "परमेश्वर ने सातवें दिन कुछ न बनाया क्योंकि छः दिनों में रचना का कार्य खत्म हुआ।"
[5] यह भी लिखा है, कि "वे मेरे आराम में प्रवेश न कर पाएँगे।"
[6] तो जब यह बात बाकी है कि दूसरे और हैं जो उस आराम में प्रवेश करें, और जिन्हें उनका सुसमाचार पहले सुनाया गया, उन्हों ने आज्ञा न मानने के कारण उसमें प्रवेश न किया।
[7] तो फिर वह किसी विशेष दिन को ठहराकर इतने दिन के बाद दाऊद की पुस्तक में उसे आज का दिन कहते हैं। जैसे पहले कहा गया, "यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो तुम्हारे मन ढिठाई न दिखाएँ।"
[8] और यदि यहोशू उन्हें आराम में प्रवेश करा लेता, तो उसके बाद दूसरे दिन की चर्चा न होती।
[9] इसलिए यह जान लो कि परमेश्वर के लोगों के लिए सब्त का आराम बाकी है।
[10] क्योंकि जिसने उनके आराम में प्रवेश किया है, उसने भी परमेश्वर की तरह अपने कामों को खतम (पूरा) किया है।
[11] इसलिए हम उस आराम में प्रवेश करने की पूरी कोशिश करें, ऐसा न हो कि कोई उन लोगों के समान आज्ञा न मानकर गिर पड़े।
[12] क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित और शक्तिशाली, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, आत्मा और प्राण को, और गाँठ-गाँठ, और गूदे-गूदे को अलग करके, आर पार छेदता है, और मन की इच्छाओं और विचारों को जाँचता है।
[13] सृष्टि की कोई वस्तु सृष्टिकर्ता से छिपी नहीं है। और ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो उनकी दृष्टि से छिपा हो, परन्तु उनकी आँखों के सामने सब वस्तुएँ खुली और बेपरदा हैं, जिन्हें हमें लेखा देना होगा।
[14] इसलिए जब हमारे ऐसे महापुरोहित हैं, जो स्वर्ग में दाखिल हो चुके हैं, अर्थात् परमेश्वर के बेटे यीशु, तो आओ, हम अपने विश्वास को मज़बूती से थामे रहें।
[15] क्योंकि हमारे ऐसे महापुरोहित (याजक) नहीं, जो हमारी कमज़ोरियों में हमारे साथ दुखी न हो सकें, लेकिन वह सब बातों में हमारे समान परखे तो गये, तौभी बेगुनाह निकले।
[16] इसलिए आओ, हम उस सिंहासन के पास हिम्मत से पहुँचें, जहाँ कृपा मिलती है, ताकि ज़रूरत के वक्त हमें मदद मिल सके।