Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 6:27

[1] क्योंकि नियमशास्त्र जिसमें आने वाली अच्छी चीज़ों की छाया है, लेकिन उनकी असलियत नहीं, इसलिए उन एक ही तरह के बलिदानों के द्वारा, जो हर साल चढ़ाए जाते हैं, भक्‍ति करने वालों को बिल्कुल पूरी शुद्धता नहीं दे सकते,

[2] यदि ऐसा हो सकता तो उनका चढ़ाना बन्द क्यों हो जाता? भक्‍ति (सेवा) करने वाले एक ही बार शुद्ध हो जाते, तो फिर उनका विवेक उन्हें दोषी न ठहराता।

[3] लेकिन उनके द्वारा हर साल पापों का स्मरण हुआ करता है।

[4] क्योंकि असंभव है, कि बैलों और बकरों का खून पापों को दूर करे।

[5] इसी कारण वह जगत में आते समय कहते हैं, "बलिदान और भेंट आप ने न चाही, लेकिन मेरे लिए एक देह तैयार की।

[6] होम-बलियों और पाप-बलियों से आप खुश नहीं हुए।

[7] तब मैंने कहा, 'देखो, मैं आ गया हूँ, (पवित्र वचन में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्‍वर, आपकी इच्छा पूरी करूँ।'

[8] वह कहते हैं, कि न आप ने बलिदान और भेंट और होम-बलियों और पाप-बलियों को चाहा, और न उन से खुश हुए, यद्यपि ये बलिदान तो नियमशास्त्र के अनुसार चढ़ाए जाते थे।

[9] वह यह भी कहते हैं, "देखिए, मैं आ गया हूँ, ताकि आपकी इच्छा पूरी करूँ, " वह पहले को हटा देते हैं, ताकि दूसरे को उस की जगह लाया जा सके।

[10] उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।

[11] और हर एक पुरोहित खड़े होकर हर दिन सेवा करता है, और एक ही प्रकार के बलिदान को जो गुनाहों को कभी भी दूर नहीं कर सकते, बार-बार चढ़ाता है।

[12] परन्तु यह तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिए चढ़ाकर परमेश्‍वर के दाहिने जा बैठे,

[13] और उसी समय से वह इसका इन्तज़ार कर रहे हैं कि उनके दुश्मन उनके पाँवों के नीचे की चौकी बनें।

[14] क्योंकि यीशु ने एक ही बलिदान के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिए शुद्ध (सिद्ध) कर दिया है।

[15] पवित्र आत्मा भी हमें यही गवाही देता है,

[16] "कि प्रभु कहते हैं कि जो वाचा मैं उन दिनों के बाद उन से बान्धूँगा वह यह है, कि मैं अपने नियमों को उनके मन पर लिखूँगा और मैं उनके मन में डालूँगा।

[17] फिर वह यह कहते हैं, "मैं उनके अपराधों को, और उनके अधर्म के कामों को कभी याद न करूँगा।

[18] जब इन की माफ़ी हो गई है, तो फिर पाप का बलिदान न रहा।

[19] इसलिए हे भाइयो-बहनो, जब कि हमें यीशु के खून के द्वारा उस नये और जीवित रास्ते से पवित्र जगह में दाखिल होने की हिम्मत हो गयी है,

[20] जो यीशु ने परदे अर्थात् अपनी देह में से होकर, हमारे लिए खोल दिया (अभिषेक किया) है।

[21] और इसलिए कि हमारा ऐसा महान मध्यस्थ (याजक, पुरोहित) है, जो परमेश्‍वर के घर का अधिकारी है,

[22] तो आओ हम सच्चे मन, और पूरे ईमान के साथ, और विवेक के कचोटते रहने को दूर करने के लिए मन पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्‍वर के पास जाएँ।

[23] और अपनी आशा के अंगीकार को मज़बूती से थामे रहें, क्योंकि जिसने वायदा किया है वह सच्चे हैं।

[24] और प्रेम, और भले कामों में दूसरों को बढा़ने के लिए एक दूसरे का ध्यान रखा करो,

[25] और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ो, जैसे कि बहुत से लोग करते हैं, लेकिन एक दूसरे को समझाते रहो, और जैसे-जैसे उस दिन को पास आते देखो, वैसे-वैसे और भी अधिक यह किया करो।

[26] क्योंकि सच्चाई की पहचान हासिल करने के बाद यदि हम जान बूझकर गुनाह करते रहें, तो गुनाहों के लिए फिर कोई कुर्बानी बाकी नहीं।

[27] हाँ, दण्ड की एक भयानक प्रतीक्षा और आग का जलना बाकी है, जो विरोधियों को भस्म कर देगी।

[28] जब कि मूसा की व्यवस्था का न मानने वाला दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है

[29] तो सोच लो कि वह और कितनी भारी सज़ा के लायक ठहरेगा, जिसने परमेश्‍वर के बेटे को पाँवों से रौंदा, और वाचा के खून को जिसके द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह की आत्मा का अपमान किया।

[30] क्योंकि हम परमेश्‍वर को जानते हैं, जिन्होंने कहा, "बदला लेना मेरा काम है, मैं ही दण्ड दूँगा" और फिर यह कि प्रभु अपने लोगों का इन्साफ़ करेंगे।

[31] जीवित परमेश्‍वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है।

[32] उन पहले दिनों को याद करो, जब तुम सच्चाई को जानने की वजह से दुखों में भी मज़बूत रहे।

[33] कुछ तो बदनामी, और सताव सहते हुए तमाशा बने, और कुछ इस तरह, कि तुम उनके साझी हुए जिनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता था।

[34] क्योंकि तुम कैदियों के दुख में भी दुखी हुए, और अपनी संपत्ति भी आनन्द से लुटने दी, यह जानकर कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और हमेशा ठहरने वाली दौलत है।

[35] इसलिए अपना साहस न छोड़ो क्योंकि उसका परिणाम बड़ा होगा।

[36] तुम्हें सब्र रखना ज़रूरी है, ताकि परमेश्‍वर की इच्छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल (परिणाम) पाओ।

[37] अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है जब कि आने वाला आएगा, और देर न करेगा।

[38] और मेरा धर्मी जन विश्‍वास से जीवित रहेगा, और यदि वह पीछे हट जाए तो मेरा मन उससे खुश न होगा।

[39] हम उन लोगों की तरह नहीं हैं,जो विश्वास रखना छोड़ देने की वजह से वापस बर्बाद हो जाते हैं,लेकिन विश्वास में बने रहेंगे ताकि उद्धार (मुक्‍ति) की आशीष में बने रहें।

इब्रानियों — Chapters