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[1] इसलिए चाहिए कि हम उन बातों पर जो हम ने सुनी हैं, और भी मन लगाएँ, ऐसा न हो कि सुनी हुअी बातों से बहक जाएँ।

[2] क्योंकि जो बातें स्वर्गदूतों के द्वारा कही गयी थीं यदि वे बनी रहीं और हर एक गुनाह और आज्ञा न मानने का ठीक-ठीक बदला मिला,

[3] तो हम लोग ऐसी बड़ी मुक्‍ति से निश्चिंत रहकर कैसे बच सकते हैं, जिसकी चर्चा पहले पहल यीशु के द्वारा हुई, और सुनने वालों के द्वारा पुष्टि की गयी?

[4] साथ ही परमेश्‍वर भी अपनी इच्छा के अनुसार चिन्हों, अद्भुत कामों, और अनेक तरह के सामर्थ के कामों, और पवित्र आत्मा के वरदानों के बाँटने के द्वारा इसकी गवाही देते रहे।

[5] परमेश्‍वर ने उस आने वाले जगत को जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं, स्वर्गदूतों के वश न किया,

[6] लेकिन किसी ने कहीं यह गवाही दी है, कि इन्सान क्या है कि आप उसकी सुधि लेते हैं? या इन्सान क्या है कि आप उस पर निगाह करते हैं?

[7] आप ने थोड़े समय के लिए यीशु को स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया। आप ने उनके सिर पर महिमा और आदर का मुकुट रखा और उन्हें अपने हाथों के कामों पर अधिकार दिया।

[8] आप ने "सब कुछ" उनके पाँवों के नीचे कर दिया, इसलिए जब कि परमेश्‍वर ने सब कुछ यीशु के आधीन कर दिया, तो उन्हों ने कुछ भी रख न छोड़ा, जो यीशु के आधीन न हो परन्तु हम अब तक सब कुछ उनके आधीन नहीं देखते।

[9] परन्तु हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किए गये थे, मौत का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहने हुए देखते हैं, ताकि परमेश्‍वर की कृपा से हर एक मनुष्य के लिए मौत का स्वाद चखें।

[10] क्योंकि जिस परमेश्‍वर के लिए सब कुछ है, और जिनके द्वारा सब कुछ है, उन्हें यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से बेटों को महिमा में पहुँचाएँ, तो उनका मुक्‍ति देने वाला पूरा दुख (क्रूस की मौत तक) उठाए

[11] क्योंकि पवित्र करने वाला अर्थात् यीशु और जो पवित्र किए जाते हैं अर्थात् विश्‍वासी, सब एक ही स्त्रोत से हैं, इसी कारण यीशु उन्हें भाई कहने से नहीं शर्माते,

[12] किन्तु कहते हैं कि "मैं आपका नाम अपने भाइयों को सुनाऊँगा, सभा के बीच में मैं आपका भजन गाऊँगा?"

[13] और फिर यह कि मैं उस पर भरोसा रखूँगा, और फिर "देखो मुझे और इन बच्चों को, जो परमेश्‍वर ने मुझे दिये हैं।"

[14] इसलिए जब कि बच्चे मांस और लोहू के हिस्सेदार हुए हैं, तो वह आप भी उसमें सहभागी हुए, ताकि अपनी मौत के द्वारा उसे, अर्थात् शैतान को जिसे मौत पर हक मिला था, कमज़ोर (निकम्मा) कर दे।

[15] और जितने मौत के डर के कारण जीवन भर गुलामी में फँसे थे, उन्हें छुड़ा ले,

[16] क्योंकि वह तो स्वर्गदूतों को नहीं, लेकिन अब्राहम के वंश को संभालते हैं।

[17] इस कारण उनको चाहिए था कि सब बातों में अपने भाइयों के समान हों, जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्‍वासयोग्य महा-पुरोहित बन सकें, ताकि लोगों के अपराधों के बदले में प्रायश्चित करने के लिए मरें।

[18] वह उनकी भी मदद कर सकते हैं, जिनकी परख होती है, क्योंकि उन्हों ने भी परखे जाने के समय में दुख उठाया।

इब्रानियों — Chapters