[1] उन दिनों में जब शिष्य लोग गिनती में बढ़ते जा रहे थे, यूनानी बोलने वाले यहूदी इब्रानी बोलने वाले यहूदियों के खिलाफ़ शिकायत करने लगे। ऐसा इसलिए क्योंकि हर दिन जो भी लोगों को मिलता था, उसमें यूनानी बोलने वाले यहूदियों की विधवाएँ वंचित रह जाती थीं।
[2] तब बारह लोगों ने शिष्यों के झुण्ड को एक जगह बुलाकर कहा, "यह बात सोचने से भी बाहर है कि हम परमेश्वर के वचन को छोड़कर खाना बाँटते फिरें।
[3] इसलिए भाइयो अपने बीच में से सात ऐसे लोगों को चुन लो, जिनकी इज़्ज़त है, पवित्र आत्मा और ज्ञान से भरे हैं। उन्हीं को यह काम सौंप दो।
[4] लेकिन हम अपने समय को लगातार प्रार्थना और वचन सिखाने में देते रहेंगे।"
[5] यह बात पूरे चर्च को अच्छी लगी। उन्हों ने स्तिफ़नुस को जो विश्वास और पवित्रात्मा से भरा हुआ था और फ़िलिप्पुस, और प्रुखुरूस, निकानोर, तिमोन परमिनास और अन्ताकिया से निकोलस जो यहूदी मत में आ गया था, को चुना।
[6] इन सभी को प्रेरितों के सामने लाया गया। और प्रेरितों ने प्रार्थना करके उनके ऊपर हाथ रखे।
[7] परमेश्वर का वचन बढ़ने लगा और यरुशलेम में शिष्यों की गिनती बहुत बढ़ने लगी। याजकों (पुरोहितों) के एक बड़े झुण्ड ने भी यीशु को अपना लिया।
[8] स्तिफ़नुस अनुग्रह और सामर्थ से भरकर लोगों के बीच बड़े अद्भुत काम और चिन्ह दिखाया करता था।
[9] तब आराधनालय के कुछ लोग उठ खड़े हुए जिसे "आज़ाद किए गए लोगों का आराधनालय" कहा जाता है। एलिक्जेन्ड्रियन्स, किलकिया और एशिया के ये लोग स्तिफ़नुस से बहस-बाज़ी करते रहे।
[10] लेकिन जिस ज्ञान और आत्मा से वह बोलता था, उसके सामने वे टिक न सके।
[11] तब अलग से उन्हों ने लोगों को यह कहने के लिए उभारा "कि हम ने उसे परमेश्वर याहवे और मूसा के खिलाफ़ बोलते हुए सुना है।"
[12] उन्हों ने लोगों, बुज़ुर्गों और नियमशास्त्र को सिखाने वालों को उकसाया इसलिए वे आए और उसे पकड़कर महासभा के सामने ले गए।
[13] तब उन्हों ने झूठे गवाहों को बुलाया, जिन्होंने कहा, "यह व्यक्ति पवित्र स्थान और नियमशास्त्र के खिलाफ़ कहने से नहीं रुकता
[14] क्योंकि हम ने उसे यह कहते हुए सुना है कि नासरत के यीशु इस भवन को नष्ट कर डालेंगे और मूसा से हमें मिले रीति रिवाज़ों को बदल डालेंगे।
[15] तब हर एक जन ने जो महासभा में बैठा था, उसका मुँह स्वर्गदूत की तरह चमकते हुए देखा।