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[1] इन बातों के बाद पौलुस ऐथेन्स से कुरिन्थ चला गया।

[2] वहाँ पर वह अक्‍विला नामक एक यहूदी से मिला, जो पोन्तुस में उत्पन्न हुआ था। वह कुछ दिन पहले अपनी पत्नी प्रिसिल्ला के साथ इटली से नया आया था। ऐसा इसलिए, क्योंकि क्लौदियुस ने सभी यहूदियों को आज्ञा दी थी कि वे रोम से चले जाएँ। वह उनके पास गया।

[3] इसलिए कि दोनों का एक ही रोज़गार था, वह उन्हीं के साथ रहकर काम करता रहा। दोनों ही तम्बू बनाने का काम करते थे।

[4] हर सब्त के दिन आराधनालय में वह सिखाता रहा और यहूदियों तथा गैरयहूदियों को समझाता था।

[5] जब सीलास और तिमोथी मकिदुनिया से आए, पौलुस ने वचन सिखाने की धुन में ही यहूदियों को समझाया कि यीशु ही वह मसीह (अभिषिक्‍त) हैं, जिनका उन्हें इन्तज़ार है।

[6] जब उन्हों ने उसकी खिलाफ़त की, निन्दा की, तब उसने अपने कपड़े झाड़ते हुए उन से कहा, "तुम्हारा खून तुम्हारे सिर पर हो, मैं निर्दोष हूँ। मैं अब से गैर यहूदियों के पास ही जाऊँगा।"

[7] वहाँ से निकलकर वह जस्तुस नामक व्यक्‍ति के घर गया जो परमेश्‍वर को मानने वाला था। उसका घर आराधनालय के पास ही था।

[8] उस आराधनालय के प्रधान क्रिस्पुस ने अपने परिवार सहित यीशु पर विश्‍वास किया। साथ ही में बहुत से कुरिन्थिवासियों ने भी विश्‍वास किया और सब को बपतिस्मा दिया गया।

[9] रात में एक दर्शन के माध्यम से यीशु ने पौलुस से बातचीत की, "डरना नहीं, बोलते जाओ और ख़ामोश मत हो जाना।

[10] इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ हूँ कोई व्यक्‍ति तुम्हारे ऊपर हमला करके तुम्हारा नुकसान नहीं कर सकेगा, क्योंकि इसी शहर में मेरे बहुत से लोग हैं।"

[11] वहाँ पर वह उनके बीच परमेश्‍वर की बातों को डेढ़ वर्ष तक सिखाता रहा।

[12] जब गैलियो अखाया का हाकिम था, यहूदी लोग एक मत होकर पौलुस के खिलाफ़ उठ खड़े हुए और न्यायासन (इन्साफ़ की जगह) पर लाए।

[13] वे कह रहे थे, "ये लोग दूसरों को इस तरह परमेश्‍वर की उपासना करने के लिए उकसा रहे हैं, जो नियमशास्त्र के खिलाफ़ हैं।"

[14] अब जब पौलुस अपना मुँह खोलने ही वाला था, कि गैलियो ने यहूदियों से कहा, "हे यहूदियो, अगर यह गलत काम या दुष्ट बुरे कामों की बात होती, तो मैं तुम्हारे साथ सह लेता।

[15] लेकिन यह शब्दों, नामों और तुम्हारे नियमशास्त्र का विषय है, इसलिए इस से तुम ही निबटो। मैं इन सब बातों में तुम्हारा इन्साफ़ नहीं करुँगा।"

[16] यह कहकर उसने उन्हें न्याय आसन के सामने से निकाल दिया।

[17] तब सभी यूनानी लोगों ने सोस्थिनेस को लिया जो आराधनालय का मुख्य प्रधान था, और उसी जगह सब के सामने उसकी पिटाई की लेकिन गैलियो ने इन बातों की कुछ परवाह नहीं की।

[18] इसके बाद पौलुस वहाँ बहुत समय तक रहा। भाइयों से विदा होकर किंख्रिया में अपना सिर मुण्डवाया क्योंकि उसने मन्नत मानी थी और जहाज पर सीरिया को रवाना हो गया। इस समय प्रिसकिल्ला और अक्‍विला उसके साथ ही थे।

[19] इफ़िसुस आकर उसने उन्हें वहीं छोड़ दिया, लेकिन खुद आराधनालय जाकर यहूदियों से वाद-विवाद करने लगा।

[20] जब उन्हों ने उससे कुछ और समय तक रुकने के लिए कहा, तो सलाह न ली,

[21] लेकिन यह कहते हुए उन्हें छोड़ दिया, "ज़रुरी है कि मैं आने वाले त्यौहार को यरुशलेम में मनाऊँ। लेकिन परमेश्‍वर चाहेंगे, तो मैं तुम्हारे पास वापस लौटूँगा।" वहाँ से वह इफ़िसुस को रवाना हो गया।

[22] कैसरिया पहुँचने के बाद उसने चर्च को भेंट दी और अन्ताकिया को रवाना हुआ।

[23] वहाँ कुछ समय बिताने के बाद वह गलातिया और फ़्रिगिया के इलाके में शिष्यों की हिम्मत बढ़ाता गया।

[24] अलेक्ज़ेन्ड्रिया निवासी यहूदी अपुल्लोस, जो बोलने में योग्य और शास्त्र का अच्छा ज्ञान रखता था, इफ़िसुस आया।

[25] इस व्यक्‍ति को यीशु के बारे में सिखाया गया था। वह बहुत जोशीला था और सही-सही सिखाता था। लेकिन वह सिर्फ़ यूहन्ना के बपतिस्मे के बारे में जानता था।

[26] वह आराधनालय में बड़ी हिम्मत से बोलने लगा। जब अक्‍विला और प्रिसिल्ला ने उसे सुना, तब परमेश्‍वर के रास्ते के बारे में उसको और अच्छी तरह सिखाया।

[27] जब वह अखाया से गुज़रना चाहता था, भाइयों ने शिष्यों पर ज़ोर डालकर कहा, कि उसे अपनाएँ। जब वह वहाँ पहुँचा, उसने उन सब की मदद की, जिन्होंने अनुग्रह के द्वारा विश्‍वास किया था।

[28] वह बहुत प्रबलता से यहूदियों से तर्क किया करता था और वह भी सार्वजनिक तरीके से। वह यहूदी शास्त्र में से दिखाता था कि आने वाले मसीह, यीशु ही थे।

प्रेरितों के काम — Chapters