[1] "लोगो, भाइयो, बहनो और बुजुर्गो, मैं अपने बचाव के लिए जो कहता हूँ, उसे सुनो"
[2] जब उन लोगों ने उसे इब्रानी भाषा में बोलते हुए सुना, तब और खामोश हो गए।
[3] किलकिया के तारसुस शहर का मैं रहने वाला हूँ। लेकिन गमलीएल के कदमों पर इसी शहर में मुझे पूर्वजों के नियम और तौर तरीकों को सिखाया गया। आप सभी परमेश्वर के लिए जिस तरह से आज जोश में भरे हुए हैं, मैं भी था।
[4] इस मत के पुरुष और स्त्रियों को जान से मारने, बान्धने और जेलखाने में डालने के द्वारा उन्हें सताता रहा।
[5] इस बात की गवाह महायाजक और बुज़ुर्गो की सभा भी है। उन्हीं से मैंने भाइयों के लिए चिट्ठियाँ पायीं थीं, ताकि जो लोग दमिश्क में बँधे हुए थे, उन्हें यरुशलेम में सज़ा देने के लिए लाऊँ।
[6] अपनी यात्रा के दौरान जब मैं दमिश्क पहुँचने ही वाला था, अचानक आसमान से एक बड़ी रोशनी ने उतर कर मुझे घेर लिया।
[7] जब मैं ज़मीन पर गिर पड़ा तो अपने कानों से सुना, शाऊल, शाऊल, तुम मुझे क्यों दुख पहुँचा रहे हो,
[8] मैंने जवाब दिया, 'आप कौन हैं प्रभुजी?' उन्हों ने मुझ से कहा, 'मैं नासरत का यीशु हूँ, जिसे तुम पीड़ा दे रहे हो।'
[9] जो लोग मेरे साथ थे वे रोशनी देखकर डर गए, लेकिन जिस व्यक्ति ने मुझ से बातचीत की थी, उनकी आवाज़ नहीं सुन सके।
[10] मैंने कहा, 'प्रभु मैं क्या करुँ?' यीशु ने कहा, 'उठो और दमिश्क को जाओ। वहाँ तुम्हें वे सभी बातें बतायी जाएँगी, जो तुम्हें करनी है।'
[11] इसलिए कि उस रोशनी की चकाचौंध की वजह से मैं कुछ भी देख नहीं पा रहा था। मेरे साथी मेरे हाथों को पकड़ कर मुझे दमिश्क लाए।
[12] हनन्याह नाम का एक यहूदी भक्त, वहाँ के यहूदियों के बीच काफ़ी इज़्ज़त वाला व्यक्ति था।
[13] वह आकर वहाँ खड़ा हो गया और मुझ से कहा, 'भाई शाऊल देखने लगो।' उसी समय से मुझे दिखने लगा।
[14] उसने मुझ से यह भी कहा, 'हमारे बापदादों के परमेश्वर ने तुम्हें चुन लिया है, ताकि तुम उनकी इच्छा जान सको, उस धर्मी को देखो उनके मुँह से उनकी आवाज़ सुन सको।
[15] क्योंकि जो तुम ने देखा और सुना है उन सभी बातों में उनके गवाह ठहरोगे।
[16] अब तुम देर क्यों कर रहे हो? उठो और बपतिस्मा लो। और उनका (यीशु का) नाम लेकर अपने पापों को धो डालो।'
[17] जब मैं यरुशलेम आकर मन्दिर (प्रार्थना भवन) में प्रार्थना करने लगा, तो बेहोश सा हो गया।
[18] तब मैंने यीशु को मुझ से यह कहते हुए सुना, 'जल्दी करो और यरुशलेम से भाग जाओ, क्योंकि यहाँ पर लोग तुम्हारी बातों को मानेंगे नहीं'
[19] मैंने कहा, 'यीशु उन्हें मालूम है कि आप पर विश्वास करने वालों को मैं मारता और जेल में डलवाता था।
[20] जब आपके शहीद स्तिुफ़नुस को पत्थरवाह किया जा रहा था, तब मैं भी वहाँ खड़ा था। उसको मारने वालों के कपड़ों की मैं रखवाली कर रहा था और उसकी हत्या में सहभागी भी था।'
[21] उन्हों ने मुझ से कहा, 'जाओ, क्योंकि मैं तुम्हें यहाँ से दूर गैरयहूदियों तक भेजूँगा।'
[22] यह सब कुछ सुनने के बाद उन लोगों ने अपनी आवाज़ को बुलन्द करते हुए कहा, "ऐसे इन्सान को तो इस दुनिया में जीने नहीं देना चाहिए"
[23] जब वे लोग चिल्लाते गए, और अपने कपड़ों को फेंकते और हवा में धूल उड़ाते गए,
[24] कमाण्डर ने हुक्म दिया कि उसे किले में ले जाया जाए। उसने यह भी कहा, बेंत लगवाकर वह जानना चाहेगा कि ये लोग उसकी खिलाफ़त में इतनी ज़ोरों से क्यों चिल्ला रहे थे।
[25] जब उन्हों ने चमड़े के बेल्ट (पेटी) से बाँधा, पास में खड़े हुए सूबेदार से पौलुस ने कहा, "क्या यह वाजिब है कि बिना गुनाह साबित हुए एक रोमी नागरिक की पिटाई की जाए?"
[26] सूबेदार ने यह सुनकर कमाण्डर को जाकर कहा, "संभल कर रहना क्योंकि यह व्यक्ति रोमी नागरिक है"
[27] यह सुनकर कमाण्डर ने आकर उससे कहा, "मुझे बताओ, क्या तुम रोमी नागरिक हो?" उसने उत्तर दिया, "हाँ"
[28] कमाण्डर ने कहा, "मैंने काफ़ी कीमत चुकाकर यह आज़ादी हासिल की है।" पौलुस ने कहा, "मैं तो आज़ाद ही पैदा हुआ था।"
[29] तब जो लोग उससे पूछताछ करने वाले थे, उन्हों ने उसे तुरन्त छोड़ दिया। कमाण्डर भी डर गया, जब उसे मालूम पड़ा कि उसने एक रोमी नागरिक को हिरासत में ले लिया था।
[30] अगले दिन वह जानना चाहता था कि यहूदी उस पर दोष क्यों लगा रहे थे। इसलिए उसने उसे आज़ाद कर दिया और महायाजकों और उनकी सभा को बुलाया। उसने पौलुस को लाकर उनके सामने खड़ा किया।