[1] जब वे लोगों को सिखा रहे थे, फ़रीसी, प्रार्थना भवन (मन्दिर) के प्रधान और सदूकी उनके पास आए।
[2] वे इसलिए नाराज़ थे क्योंकि वे (शिष्य) लोगों को सिखा रहे थे कि यीशु मरे हुओं में से जी उठे थे।
[3] इन लोगों ने पतरस और यूहन्ना को दूसरे दिन तक हवालात में इसलिए रख लिया क्योंकि शाम हो चुकी थी।
[4] फिर भी बहुत से लोग जिन्होंने उनका संदेश सुना था, उन्हों ने उसे अपना लिया। इन लोगों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।
[5] दूसरे दिन उनके अधिकारी, और शास्त्री,
[6] हन्ना महायाजक, काइफ़ा, यूहन्ना, एलेक्ज़ेन्डर और महायाजक के सभी रिश्तेदार यरुशलेम में इकट्ठे हुए।
[7] उन लोगों ने पतरस और यूहन्ना को अपने सामने खड़ा किया और पूछा, "किस शक्ति या नाम से तुम ने यह किया है?"
[8] पतरस ने पवित्र आत्मा से भरकर उन से कहा,
[9] "हे लोगों के अधिकारियों और इस्त्राएल के बुज़ुर्गों, इस असहाय के लिए हमारे किए गए अच्छे काम की वजह से हमसे पूछताछ की जाती है कि वह कैसे ठीक कर दिया गया,
[10] तो तुम्हें और इस्त्राएल के सभी लोगों को यह मालूम हो, कि यीशु मसीह नासरी, जिन्हें तुम ने क्रूस पर चढ़ाया था और जिन्हें परमेश्वर ने मरे हुओं में से ज़िन्दा किया, उन्हीं के नाम से यह आदमी ठीक-ठाक खड़ा है।
[11] इसी पत्थर को इमारत बनाने वालों (राजमिस्त्रियों) ने बेकार ठहराया था, यही अब खास पत्थर ठहरा है।
[12] किसी अन्य व्यक्ति से मुक्ति नहीं मिल सकती, क्योंकि लोगों के बीच आसमान (स्वर्ग) के नीचे कोई और नाम नहीं दिया गया है जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।
[13] उन्हों ने पतरस और यूहन्ना की हिम्मत को देख यह जान लिया कि वे अनपढ़ और साधारण लोग हैं। वे आश्चर्य में पड़ गए और समझ भी गए कि वे यीशु के साथ रहे थे।
[14] उनके साथ ठीक हो गए व्यक्ति को खड़ा देखकर वे उनके खिलाफ़ कुछ कह न सके।
[15] लेकिन जब उन्हें आज्ञा दी गयी कि वे सभा से बाहर जाएँ, आपस ही में उन लोगों ने सलाह की
[16] उन्हों ने कहा, "इन लोगों के साथ हम क्या करें? क्योंकि उन्हों ने एक बड़ा आश्चर्यकर्म किया था, जो यरुशलेम में रहने वाले लोगों के सामने था और इसका इन्कार भी नहीं किया जा सकता।"
[17] इसलिए कि यह बात लोगों में फैल न जाए, हम उन्हें चेतावनी दें, कि किसी से इस नाम के विषय बात न करें।
[18] उन्हों ने पतरस और यूहन्ना को बुलाकर आदेश दिया कि यीशु के सम्बन्ध में न बोलें, न सिखाएँ।
[19] लेकिन पतरस और यूहन्ना ने जवाब में यह कहा, "तुम्हीं बताओ, क्या यह सही है कि हम परमेश्वर की बात न मानकर तुम्हारी मानें?
[20] क्योंकि यह हो ही नहीं सकता कि हम ने जो देखा और सुना है, वह सब न बताएँ।"
[21] इसलिए उन्हें और ज़्यादा धमका कर जाने दिया, क्योंकि वहाँ इकट्ठे हुए लोगों की वजह से वे उन्हें सज़ा नहीं दे सके। क्योंकि जो कुछ भी हुआ था, उसके लिए सभी परमेश्वर की बड़ाई कर रहे थे।
[22] क्योंकि जिस व्यक्ति की ज़िन्दगी में चंगा करने का चिन्ह दिखाया गया था (यह अजीब काम हुआ था), वह करीब चालीस साल से ज़्यादा उम्र का था।
[23] वहाँ से आज़ाद होकर वे अपने लोगों में गए और जो कुछ मुख्य महायाजक और बुज़ुर्गों ने उन से कहा था, उन्हें बता दिया।
[24] उन्हों ने जब यह सब सुना तो एक मन होकर बुलन्द आवाज़ में कहा, "मालिक, आप ही सृष्टिकर्ता हैं जिन्होंने आकाश, पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उसमें है, बनाया है।
[25] आप ही ने अपने सेवक हमारे पिता दाऊद के मुँह से कहा है, "राष्ट्रों ने गुस्सा और विरोध क्यों दिखाया? लोगों ने बेकार की बातें क्यों सोचीं?
[26] पृथ्वी के राजा एक हो गए, शासक इकट्ठा हुए, प्रभु के खिलाफ़ और मसीह के भी।
[27] क्योंकि हेरोद अन्तिपास, पुन्तियुस, पिलातुस गवर्नर, गैरयहूदी और इस्त्राएली, सभी आपके अभिषिक्त पवित्र सेवक के खिलाफ़ थे
[28] जो कुछ उन्हों ने किया वह सब आपकी सामर्थ और इच्छा (मति) से पहले ही से निश्चित हो चुका था।
[29] अब मालिक (प्रभु) उनकी धमकियों को देखिए और यह होने दें कि आपके सेवक बड़ी हिम्मत से आपके संदेश को दे सकें।
[30] लोगों को ठीक करने के लिए अपने हाथों को बढ़ाएँ, ताकि आपके पवित्र बेटे यीशु के नाम से अजीब चिन्ह और अचरज के काम किए जाएँ"
[31] जहाँ पर वे इकट्ठे थे, वह स्थान उनके प्रार्थना करने के बाद हिल गया। वे सभी पवित्र आत्मा से भर कर परमेश्वर का संदेश (वचन) हिम्मत से देने लगे।
[32] जिन्होंने विश्वास किया था, वे लोग एक ही मन के थे। उन में से कोई भी यह नहीं कहता था कि जो उसके पास है, उसका है। सभी लोगों को छूट थी कि वे सब कुछ का इस्तेमाल करें।
[33] प्रेरित लोग यीशु मसीह के जी उठने की बात बड़ी सामर्थ (हिम्मत) के साथ कर रहे थे। उन सभी के ऊपर बड़ी कृपा बनी हुयी थी।
[34] उन में से कोई भी ऐसा नहीं था, जो गरीब (ज़रूरतमन्द) हो। क्योंकि जिनके पास ज़मीन या घर थे, उनको बेचकर मिला हुआ धन ले आते थे।
[35] उसे प्रेरितों के पैरों के पास डाल दिया जाता था, जैसी जिसकी ज़रूरत हुआ करती थी, उसी के मुताबिक लोगों में बाँट दिया जाता था।
[36] यूसुफ़ नाम साइप्रस का एक लेवी था। प्रेरितों ने उसका नाम बरनबास (मतलब शान्ति का बेटा) रखा था।
[37] उसके पास कुछ ज़मीन थी। उसने उस ज़मीन को बेचा और मिले हुए रूपयों को प्रेरितों के सुपुर्द कर दिया।