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[1] सभा की तरफ़ टकटकी लगाकर पौलुस ने देखा और कहा, "भाइयो, आज तक मैंने अच्छे मन (विवेक) से परमेश्‍वर के सामने जीवन जीया है"

[2] हनन्याह महायाजक ने पास खड़े हुए लोगों को यह आज्ञा दी कि उसके गाल पर मारें।

[3] तब पौलुस ने कहा, "तुम चूना फिरी हुयी दीवार (कब्र), परमेश्‍वर तुम्हें सज़ा देंगे क्योंकि तुम नियमशास्त्र के तहत मेरा इन्साफ़ करने के लिए बैठे हो लेकिन नियमशास्त्र के खिलाफ़ मुझे मारने का हुकुम देते हो।"

[4] तब जो लोग नज़दीक खड़े थे उन्हों ने कहा, "तुम महायाजक से क्यों बदतमीज़ी कर रहे हो?"

[5] तब पौलुस बोला, "भाइयो मुझे मालूम नहीं था कि वह महायाजक हैं। क्योंकि यह लिखा है तुम अपने अगुवों से बुराई के साथ मत पेश आओ।

[6] जब पौलुस को मालूम हुआ कि वहाँ कुछ फ़रीसी थे और कुछ सदूकी, तो वह सभा में ऊँची आवाज़ में बोल उठा, "भाइयो, मैं फ़रीसी हूँ और फ़रीसी का बेटा भी। मरे हुओं की आशा और मरे हुओं में से जी उठने के बारे में मेरे ऊपर मुकदमा चलाया जा रहा है।"

[7] उसके यह कहते ही फ़रीसियों और सदूकियों में आपसी मनमुटाव हो गया और पूरी सभा दो हिस्सों में बँट गयी।

[8] क्योंकि सदूकियों का कहना है कि मरे हुओं का जी उठना है ही नहीं। वे यह भी कहते हैं कि न ही स्वर्गदूत और आत्मा कुछ है। लेकिन फ़रीसी दोनों ही बातों को मानते हैं।

[9] वहाँ बड़ा हल्ला-गुल्ला हुआ और जो विद्वान फ़रीसियों की तरफ़ थे, उन्हों ने खड़े होकर खिलाफ़त यह कहते हुए की, "हम इस आदमी में किसी तरह का खोट नहीं पाते हैं। अगर किसी आत्मा या स्वर्गदूत ने उससे बातचीत की भी है तो हम परमेश्‍वर से लड़ने वाले कौन होते हैं, "

[10] जब आपसी झगड़ा बहुत बढ़ गया, इस डर से कि कहीं लोग पौलुस को मार न डालें, कमाण्डर ने सैनिकों को हुक्म दिया कि ज़बरदस्ती उसे लोगों के बीच से हटाकर बैरेक में ले जाएँ।

[11] अगली रात को यीशु उसके पास आ खड़े हुए और कहा, "हिम्मत रखो पौलुस। जैसे तुम ने यरुशलेम में मेरी गवाही दी थी, इसी तरह से रोम में भी तुम्हें करना है।"

[12] सुबह होते ही, कुछ यहूदियों ने एक झुण्ड बनाकर शपथ ली, कि जब तक वे पौलुस को जान से मार न डालें, तब तक वे न खाएँगे और न ही पानी पीएँगे।

[13] जिन लोगों ने यह बुरी योजना बनायी थी, वे संख्या में करीब चालीस रहे होंगे।

[14] उन्हों ने महायाजकों और बुज़ुर्ग लोगों से आकर कहा, "हम ने एक ज़बरदस्त प्रण किया है। वह यह कि जब तक हम पौलुस को जान से मार नहीं लेते, तब तक हम भूखे रहेंगे।"

[15] इसलिए तुम सभा के साथ एक मत होकर कमाण्डर को इशारा करो, कि वह पौलुस को तुम्हारे पास कल अच्छी तरह से पेश करे। यह उसके बारे में और ज़्यादा जानने का एक बहाना होगा। इसके पहले कि वह यहाँ आए हम उसे जान से मारने के लिए तैयार रहेंगे।

[16] जब पौलुस के भाँजे ने ताक लगा कर घात करने की योजना के बारे में सुना, तो बैरेक में जाकर पौलुस को यह खबर दे दी।

[17] तब पौलुस ने एक सूबेदार को बुलाकर कहा, "इस व्यक्‍ति को कमाण्डर के पास ले जाओ, वह कुछ कहना चाहता है।"

[18] इसलिए वह उसे कमाण्डर के पास ले गया और कहा, "कैदी पौलुस ने मुझे बुलाकर मुझे से कहा कि मैं इस नवजवान को तुम्हारे पास लाऊँ, क्योंकि यह कुछ कहना चाहता है।"

[19] तब कमाण्डर ने उसके हाथ पकड़कर उसे एक किनारे अकेले में ले जाकर पूछा, "तुम मुझे क्या बताना चाहते हो, "

[20] उसने कहा, "यहूदियों ने यह ठान लिया है कि पौलुस को कल सभा के सामने इस बहाने से लाएँ कि उन्हें कुछ और सही-सही जानकारी चाहिए।

[21] लेकिन उनकी एक मत सुनना, क्योंकि उन में से करीब चालीस जन घात लगाए बैठे हैं, कि मौका मिलते ही हमला करें। उन्हों ने यह कसम (शपथ) खायी है कि जब तक पौलुस को मार न डालें, तब तक न खाएँगे और न पीएँगे। अब वे आपकी तरफ़ से आदेश के इन्तज़ार में हैं।"

[22] इसलिए कमाण्डर ने उन जवानों को यह हुक्म देकर विदा किया, "जो बातें तुम ने मुझ से कहीं हैं, उन्हें किसी और को मत बताना।"

[23] उसने दो सूबेदारों को बुलाकर उन से कहा, "200 सैनिकों, सत्तर घुड़सवारों और दो सौ भाले वाले सिपाहियों को रात के नौ बजे कैसरिया भेजो।

[24] पौलुस को किसी घोड़े पर बैठाकर गवर्नर फ़ेलिक्स के पास सुरक्षित पहुँचा दो।"

[25] उसने इस तरह की एक चिट्ठी लिखीः

[26] महाप्रतापी फ़ेलिक्स हाकिम को क्लौदियुस लूसियास का शान्ति (सलाम)।

[27] इस आदमी को यहूदियों ने पकड़ लिया था और उसे मार डालने पर थे। तभी मैं अपनी फ़ौज के साथ वहाँ पहुँच गया और उसे बचा लिया क्योंकि मुझे मालूम पड़ा कि वह रोमी नागरिक है।

[28] जब मैं उस पर लगाए गए आरोप का कारण जानना चाहता था, तो उसे सभा के सामने लाया।

[29] मैंने यह भी पाया कि यहूदियों की धर्म पुस्तक के बारे में उठने वाले सवालों के बारे में ही उसे गुनाहगार माना जा रहा था। लेकिन मौत की सज़ा या हिरासत के लायक कोई भी गुनाह उसने नहीं किया था।

[30] जब मुझे यह मालूम पड़ा कि कुछ यहूदी उसे घात करने की ताक में थे, तब मैंने उसे आपके पास भेज दिया। आरोप लगाने वालों को मैंने यह भी कहा कि वे आपकी मौजूदगी में उस आरोप को साबित करें।

[31] तब जैसी आज्ञा उन सैनिकों को मिली थी, वे पौलुस को एन्टीपॅट्रिस के पास रात ही में ले आए।

[32] अगले दिन उस के साथ जाने के लिए उन्हों ने घुड़सवारों को छोड़ दिया और वापस बैरेक लौट आए।

[33] जब वे घुड़सवार कैसरिया पहुँचे, उन्हों ने गवर्नर को पत्र देकर पौलुस को भी उनके सामने पेश किया।

[34] गवर्नर ने पत्र पढ़ते ही यह जानना चाहा, कि वह किस प्रान्त का है।

[35] जब उसे मालूम हुआ कि वह किलकिया का है तो कहा, "जब तुम पर आरोप लगाने वाले आएँगे तब मैं तुम्हारी सुनूँगा।" उसने यह भी कहा कि उसे हेरोदेस की सरकार के निवास पर रखा जाए।

प्रेरितों के काम — Chapters