Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 6:49

[1] कुछ लोग जो यहूदिया से आए थे यह सिखाने और कहने लगे, "जब-तक मूसा की प्रथा के अनुसार तुम्हारा खतना नहीं होगा, तुम मुक्‍ति या उद्धार नहीं पा सकोगे।"

[2] इसलिए, पौलुस और बरनबास के साथ उनका झगड़ा होने पर उन्हों ने यह इरादा किया कि इस सवाल का जवाब पाने के लिए वे प्रेरित और अगुवों के पास यरुशलेम जाएँगे।

[3] चर्च द्वारा भेजे जाने पर वे, फ़ूनीशिया और सामरिया से गुज़रे। गैरयहूदियों के बदलाव की खुशखबरी सुनाने से उन्हों ने भाइयों में बड़ी खुशी पैदा की।

[4] जब वे यरुशलेम गए तो प्रेरितों और अगुवों ने उन्हें ग्रहण किया। उन्हों ने सब कामों का बखान किया, जिन्हें परमेश्‍वर ने उनके लिए किया था।

[5] फ़रीसियों में से जिन्होंने विश्‍वास किया था, खड़े होकर कहा, "यह ज़रुरी है कि उनका खतना किया जाए और वे मूसा के द्वारा दिए गए नियमों को मानें।"

[6] प्रेरित और वहाँ के बुज़ुर्ग अगुवे (प्राचीन) इस विषय पर विचार विमर्श के लिए एक जगह मिले।

[7] इसके बाद काफ़ी बहस के बाद, पतरस खड़ा होकर उन से कहने लगा, "लोगो और भाइयो, तुम्हें मालूम है कि कुछ समय पहले परमेश्‍वर ने एक फ़ैसला किया, वह यह कि गैरयहूदी मेरे मुँह से खुशी की ख़बर सुनें और विश्‍वास लाएँ।

[8] परमेश्‍वर ने जो मनों को जानने वाले हैं, पवित्र आत्मा देकर उनकी गवाही दी, जैसा उन्हों ने हमारे साथ किया

[9] और उनके तथा हमारे बीच कोई भेद - भाव नहीं किया परन्तु विश्‍वास के द्वारा उनके हृदयों को शुद्ध किया।

[10] इसलिए शिष्यों की गर्दन पर बोझा रखकर जिसे न हमारे पूर्वज, न हम सह सकते हैं, तुम परमेश्‍वर का इम्तिहान क्यों लेते हो?

[11] लेकिन हमें यकीन है कि जैसे उन्हें अनुग्रह से मुक्‍ति (माफ़ी) मिली, हमें भी यीशु मसीह से मिलेगी।"

[12] तब सभा के सभी लोग खामोश रहे और पौलुस और बरनबास की बात ध्यान से सुनते रहे। उन दोनों ने उन बड़े-बड़े चिन्हों और अजीब कामों की चर्चा उन से की, जो परमेश्‍वर ने उनके ज़रिए किए थे।

[13] उनके चुप हो जाने के बाद याकूब ने कहना शुरु किया, "हे लोगो और भाइयो, मेरी सुनो।

[14] शमौन ने यह ऐलान किया है कि परमेश्‍वर ने किस तरह से पहली बार, गैरयहूदियों पर कृपा-दृष्टि करके अपने नाम के लिए लोग अलग किए।

[15] यह बात भविष्यद्वक्‍ता के शब्दों से स्पष्ट हो जाती है, जैसा कि लिखा है,

[16] 'इन बातों के बाद मैं लौटूँगा और दाऊद के गिरे हुए तम्बू को फिर से खड़ा करुँगा। उसके खण्डहरों को फिर से बनाऊँगा और स्थिर करुँगा।

[17] जिससे कि बचे हुए लोग और गैरयहूदी जो मेरे नाम के कहलाते हैं, यीशु को चाहें।

[18] यह वही प्रभु हैं जो प्राचीनकाल (अतीत) से इन बातों को प्रगट करते आए हैं।'

[19] इसलिए मेरे ख्याल से जो लोग गैरयहूदियों में से परमेश्‍वर की तरफ़ मुड़ रहे हैं, उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए

[20] लेकिन यह कि हम उन्हें यह लिखें, कि मूर्ति से अशुद्ध किया हुआ खाना न खाएँ, अनैतिक और अस्वभाविक यौन सम्बन्ध से बचें, गला घोटे हुए पशुओं के मांस और खून से अलग रहें।

[21] क्योंकि पुराने समयों से हर एक शहर में मूसा के नियमशास्त्र को सब्त के दिन प्रार्थना भवन में पढ़ा जाता रहा है।

[22] तब प्रेरितों और बुज़ुर्ग अगुवों और पूरे चर्च की राय से वहीं से कुछ लोगों को चुनकर पौलुस बरनबास के साथ अन्ताकिया भेजने का फ़ैसला लिया गया। इन में यहूदा जो बरसबा कहलाता था और सीलास खास अगुवे थे,

[23] उन्हों ने उनके हाथ यह चिट्ठी भेजीः "प्रेरित अगुवे और भाई लोग अन्ताकिया, सीरिया और किलकिया के गैरयहूदियों में से विश्‍वास में आने वालों को सलाम कहते हैं।

[24] हम ने सुना है कि हम में से कुछ ने हमारे बिना हुक्म के अपनी बातों से तुम्हें घबरा दिया और तुम्हारे मन को डावाँडोल कर दिया है। जब कि हम ने ऐसा कोई आदेश दिया ही नहीं था।

[25] इसलिए एक मत होकर हम को यह अच्छा लगा कि अपने प्रिय बरनबास और पौलुस के साथ कुछ लोगों को चुनकर तुम्हारे पास भेजें।

[26] ये वे लोग हैं, जिन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम के लिए अपने जीवन को जोख़िम में डाल दिया था

[27] इसीलिए हम ने यहूदा और सीलास को भेज दिया है, वे खुद भी तुम्हे ये बातें बतलाएँगे।

[28] क्योंकि पवित्र आत्मा को और हमें यही अच्छा लगा कि कुछ ज़रुरी बातों के अलावा तुम पर कुछ और बोझ न डालें।

[29] मूर्ति के सामने चढ़ायी हुयी चीज़ों, खून, गला घोंटे पशुओं और व्यभिचार से बचे रहो। अगर तुम अपने आप को इन बातों से बचाए रखोगे तो तुम्हारा भला होगा।"

[30] उन्हें भेजे जाने पर वे अन्ताकिया आए। जब उन्हों ने सभा इकट्ठी की, तब वह चिट्ठी भी दे दी।

[31] उसको पढ़कर, उन्हें बड़ी खुशी हुयी और हिम्मत मिली।

[32] यहूदा और सीलास ने, जो खुद भविष्यद्वक्‍ता थे बहुत बातों से उन्हें हिम्मत दी और मज़बूत किया।

[33] कुछ समय वहाँ पर रुकने के बाद भाईयों ने उन्हें शान्ति के साथ प्रेरितों के पास भेज दिया।

[34] (फिर भी सीलास को यह ठीक लगा कि वहीं ठहर जाए।)

[35] पौलुस और बरनबास भी अन्ताकिया में ठहर गए और अन्य दूसरों के साथ शिक्षा और संदेश देते रहे।

[36] कुछ दिनों के बाद पौलुस ने बरनबास से कहा, "चलो, उन शहरों में जाएँ, जहाँ हम ने प्रभु का संदेश सुनाया था और देखें कि हमारे भाई कैसे हैं।"

[37] बरनबास ने यह इरादा कर लिया था कि यूहन्ना जिसे मरकुस भी कहते हैं अपने साथ ले जाए।

[38] इस व्यक्‍ति (मरकुस) ने प्रेरितों को पंफ़ूलिया में छोड़ दिया था और उनके साथ न गया था।

[39] इसलिए पौलुस ने उसे अपने साथ न ले जाना चाहा।

[40] उन दोनों के बीच आपसी मतभेद इतना हुआ कि उन दोनों ने अपना रास्ता लिया। बरनबास मरकुस को लेकर कुप्रुस चला गया और पौलुस ने सीलास को अपने साथ लिया। भाइयों ने इन दोनों दलों को आशीष वचन से विदा किया।

[41] और वह सीरिया तथा किलकिया से होता हुआ कलीसियाओं (चर्चों) को स्थिर करता गया।

प्रेरितों के काम — Chapters