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[1] मेरे बेटे, मेरे अल्फ़ाज़ की पैरवी कर, मेरे अह्काम अपने अन्दर मह्फ़ूज़ रख।

[2] मेरे अह्काम के ताबे रह तो जीता रहेगा। अपनी आँख की पुतली की तरह मेरी हिदायत की हिफ़ाज़त कर।

[3] उन्हें अपनी उंगली के साथ बांध, अपने दिल की तख़्ती पर कन्दा कर।

[4] हिक्मत से कह, “तू मेरी बहन है,” और समझ से, “तू मेरी क़रीबी रिश्तेदार है।”

[5] यही तुझे ज़िनाकार औरत से मह्फ़ूज़ रखेंगी, दूसरे की उस बीवी से जो अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से तुझे फुसलाने की कोशिश करती है।

[6] एक दिन मैं ने अपने घर की खिड़की में से बाहर झाँका

[7] तो क्या देखता हूँ कि वहाँ कुछ सादालौह नौजवान खड़े हैं। उन में से एक बेअक़ल जवान नज़र आया।

[8] वह गली में से गुज़र कर ज़िनाकार औरत के कोने की तरफ़ टहलने लगा। चलते चलते वह उस रास्ते पर आ गया जो औरत के घर तक ले जाता है।

[9] शाम का धुन्दल्का था, दिन ढलने और रात का अंधेरा छाने लगा था।

[10] तब एक औरत कस्बी का लिबास पहने हुए चालाकी से उस से मिलने आई।

[11] यह औरत इतनी बेलगाम और ख़ुदसर है कि उस के पाँओ उस के घर में नहीं टिकते।

[12] कभी वह गली में, कभी चौकों में होती है, हर कोने पर वह ताक में बैठी रहती है।

[13] अब उस ने नौजवान को पकड़ कर उसे बोसा दिया। बेहया नज़र उस पर डाल कर उस ने कहा,

[14] “मुझे सलामती की क़ुर्बानियाँ पेश करनी थीं, और आज ही मैं ने अपनी मन्नतें पूरी कीं।

[15] इस लिए मैं निकल कर तुझ से मिलने आई, मैं ने तेरा पता किया और अब तू मुझे मिल गया है।

[16] मैं ने अपने बिस्तर पर मिस्र के रंगीन कम्बल बिछाए,

[17] उस पर मुर, ऊद और दारचीनी की ख़ुश्बू छिड़की है।

[18] आओ, हम सुब्ह तक मुहब्बत का प्याला तह तक पी लें, हम इश्क़बाज़ी से लुत्फ़अन्दोज़ हों!

[19] क्यूँकि मेरा ख़ावन्द घर में नहीं है, वह लम्बे सफ़र के लिए रवाना हुआ है।

[20] वह बटवे में पैसे डाल कर चला गया है और पूरे चाँद तक वापस नहीं आएगा।”

[21] ऐसी बातें करते करते औरत ने नौजवान को तरग़ीब दे कर अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से वरग़लाया।

[22] नौजवान सीधा उस के पीछे यूँ हो लिया जिस तरह बैल ज़बह होने के लिए जाता या हिरन उछल कर फंदे में फंस जाता है।

[23] क्यूँकि एक वक़्त आएगा कि तीर उस का दिल चीर डालेगा। लेकिन फ़िलहाल उस की हालत उस चिड़िया की मानिन्द है जो उड़ कर जाल में आ जाती और ख़याल तक नहीं करती कि मेरी जान ख़तरे में है।

[24] चुनाँचे मेरे बेटो, मेरी सुनो, मेरे मुँह की बातों पर ध्यान दो!

[25] तेरा दिल भटक कर उस तरफ़ रुख़ न करे जहाँ ज़िनाकार औरत फिरती है, ऐसा न हो कि तू आवारा हो कर उस की राहों में उलझ जाए।

[26] क्यूँकि उन की तादाद बड़ी है जिन्हें उस ने गिरा कर मौत के घाट उतारा है, उस ने मुतअद्दिद लोगों को मार डाला है।

[27] उस का घर पाताल का रास्ता है जो लोगों को मौत की कोठड़ियों तक पहुँचाता है।

अम्साल — Chapters