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[1] उस पर शेख़ी न मार जो तू कल करेगा, तुझे क्या मालूम कि कल का दिन क्या कुछ फ़राहम करेगा?

[2] तेरा अपना मुँह और अपने होंट तेरी तारीफ़ न करें बल्कि वह जो तुझ से वाक़िफ़ भी न हो।

[3] पत्थर भारी और रेत वज़नी है, लेकिन जो अहमक़ तुझे तंग करे वह ज़्यादा नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है।

[4] ग़ुस्सा ज़ालिम होता और तैश सैलाब की तरह इन्सान पर आ जाता है, लेकिन कौन हसद का मुक़ाबला कर सकता है?

[5] खुली मलामत छुपी हुई मुहब्बत से बेहतर है।

[6] प्यार करने वाले की ज़र्बें वफ़ा का सबूत हैं, लेकिन नफ़रत करने वाले के मुतअद्दिद बोसों से ख़बरदार रह।

[7] जो सेर है वह शहद को भी पाँओ तले रौंद देता है, लेकिन भूके को कड़वी चीज़ें भी मीठी लगती हैं।

[8] जो आदमी अपने घर से निकल कर मारा मारा फिरे वह उस परिन्दे की मानिन्द है जो अपने घोंसले से भाग कर कभी इधर कभी इधर फड़फड़ाता रहता है।

[9] तेल और बख़ूर दिल को ख़ुश करते हैं, लेकिन दोस्त अपने अच्छे मश्वरों से ख़ुशी दिलाता है।

[10] अपने दोस्तों को कभी न छोड़, न अपने ज़ाती दोस्तों को न अपने बाप के दोस्तों को। तब तुझे मुसीबत के दिन अपने भाई से मदद नहीं माँगनी पड़ेगी। क्यूँकि क़रीब का पड़ोसी दूर के भाई से बेहतर है।

[11] मेरे बेटे, दानिशमन्द बन कर मेरे दिल को ख़ुश कर ताकि मैं अपने हक़ीर जानने वाले को जवाब दे सकूँ।

[12] ज़हीन आदमी ख़तरा पहले से भाँप कर छुप जाता है, जबकि सादालौह आगे बढ़ कर उस की लपेट में आ जाता है।

[13] ज़मानत का वह लिबास वापस न कर जो किसी ने परदेसी का ज़ामिन बन कर दिया है। अगर वह अजनबी औरत का ज़ामिन हो तो उस ज़मानत पर ज़रूर क़ब्ज़ा कर जो उस ने दी थी।

[14] जो सुब्ह-सवेरे बुलन्द आवाज़ से अपने पड़ोसी को बरकत दे उस की बरकत लानत ठहराई जाएगी।

[15] झगड़ालू बीवी मूसलाधार बारिश के बाइस मुसलसल टपकने वाली छत की मानिन्द है।

[16] उसे रोकना हवा को रोकने या तेल को पकड़ने के बराबर है।

[17] लोहा लोहे को और इन्सान इन्सान के ज़हन को तेज़ करता है।

[18] जो अन्जीर के दरख़्त की देख-भाल करे वह उस का फल खाएगा, जो अपने मालिक की वफ़ादारी से ख़िदमत करे उस का एहतिराम किया जाएगा।

[19] जिस तरह पानी चेहरे को मुनअकिस करता है उसी तरह इन्सान का दिल इन्सान को मुनअकिस करता है।

[20] न मौत और न पाताल कभी सेर होते हैं, न इन्सान की आँखें।

[21] सोना और चाँदी कुठाली में पिघला कर पाक-साफ़ कर, लेकिन इन्सान का किरदार इस से मालूम कर कि लोग उस की कितनी क़दर करते हैं।

[22] अगर अहमक़ को अनाज की तरह ओखली और मूसल से कूटा भी जाए तो भी उस की हमाक़त दूर नहीं हो जाएगी।

[23] एहतियात से अपनी भेड़-बकरियों की हालत पर ध्यान दे, अपने रेवड़ों पर ख़ूब तवज्जुह दे।

[24] क्यूँकि कोई भी दौलत हमेशा तक क़ाइम नहीं रहती, कोई भी ताज नस्ल-दर-नस्ल बरक़रार नहीं रहता।

[25] खुले मैदान में घास काट कर जमा कर ताकि नई घास उग सके, चारा पहाड़ों से भी इकट्ठा कर।

[26] तब तू भेड़ों की ऊन से कपड़े बना सकेगा, बकरों की फ़रोख़्त से खेत ख़रीद सकेगा,

[27] और बकरियाँ इतना दूध देंगी कि तेरे, तेरे ख़ानदान और तेरे नौकर-चाकरों के लिए काफ़ी होगा।

अम्साल — Chapters