[1] देखो, मेरा ख़ादिम जिसे मैं क़ाइम रखता हूँ, मेरा बर्गुज़ीदा जो मुझे पसन्द है। मैं अपने रूह को उस पर डालूँगा, और वह अक़्वाम में इन्साफ़ क़ाइम करेगा।
[2] वह न तो चीख़ेगा, न चिल्लाएगा, गलियों में उस की आवाज़ सुनाई नहीं देगी।
[3] न वह कुचले हुए सरकंडे को तोड़ेगा, न बुझती हुई बत्ती को बुझाएगा। वफ़ादारी से वह इन्साफ़ क़ाइम करेगा।
[4] और जब तक उस ने दुनिया में इन्साफ़ क़ाइम न कर लिया हो तब तक न उस की बत्ती बुझेगी, न उसे कुचला जाएगा। जज़ीरे उस की हिदायत से उम्मीद रखेंगे।”
[5] रब ख़ुदा ने आसमान को ख़ल्क़ करके ख़ैमे की तरह ज़मीन के ऊपर तान लिया। उसी ने ज़मीन को और जो कुछ उस में से फूट निकलता है तश्कील दिया, और उसी ने रू-ए-ज़मीन पर बसने और चलने वालों में दम फूँक कर जान डाली। अब यही ख़ुदा अपने ख़ादिम से फ़रमाता है,
[6] “मैं, रब ने इन्साफ़ से तुझे बुलाया है। मैं तेरे हाथ को पकड़ कर तुझे मह्फ़ूज़ रखूँगा। क्यूँकि मैं तुझे क़ौम का अह्द और दीगर अक़्वाम की रौशनी बना दूँगा
[7] ताकि तू अंधों की आँखें खोले, क़ैदियों को कोठड़ी से रिहा करे और तारीकी की क़ैद में बसने वालों को छुटकारा दे।
[8] मैं रब हूँ, यही मेरा नाम है! मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा कि जो जलाल मुझे मिलना है वह किसी और को दे दिया जाए, कि लोग बुतों की तम्जीद करें जबकि उन्हें मेरी तम्जीद करनी चाहिए।
[9] देखो, जिस की भी पेशगोई मैं ने की थी वह वुक़ू में आया है। अब मैं नई बातों का एलान करता हूँ। इस से पहले कि वह वुजूद में आएँ मैं उन्हें तुम्हें सुना देता हूँ।”
[10] रब की तम्जीद में गीत गाओ, दुनिया की इन्तिहा तक उस की मद्हसराई करो! ऐ समुन्दर के मुसाफ़िरो और जो कुछ उस में है, उस की सताइश करो! ऐ जज़ीरो, अपने बाशिन्दों समेत उस की तारीफ़ करो!
[11] बयाबान और उस के क़स्बे ख़ुशी के नारे लगाएँ, जिन आबादियों में क़ीदार बसता है वह शादमान हों। सिला के बाशिन्दे बाग़ बाग़ हो कर पहाड़ों की चोटियों पर ज़ोर से शादियाना बजाएँ।
[12] सब रब को जलाल दें और जज़ीरों तक उस की तारीफ़ फैलाएँ।
[13] रब सूरमे की तरह लड़ने के लिए निकलेगा, फ़ौजी की तरह जोश में आएगा और जंग के नारे लगा लगा कर अपने दुश्मनों पर ग़ालिब आएगा।
[14] वह फ़रमाता है, “मैं बड़ी देर से ख़ामोश रहा हूँ। मैं चुप रहा और अपने आप को रोकता रहा। लेकिन अब मैं दर्द-ए-ज़ह में मुब्तला औरत की तरह कराहता हूँ। मेरा साँस फूल जाता और मैं बेताबी से हाँपता रहता हूँ।
[15] मैं पहाड़ों और पहाड़ियों को तबाह करके उन की तमाम हरियाली झुलसा दूँगा। दरया ख़ुश्क ज़मीन बन जाएंगे, और जोहड़ सूख जाएंगे।
[16] मैं अंधों को ऐसी राहों पर ले चलूँगा जिन से वह वाक़िफ़ नहीं होंगे, ग़ैरमानूस रास्तों पर उन की राहनुमाई करूँगा। उन के आगे मैं अंधेरे को रौशन और नाहमवार ज़मीन को हमवार करूँगा। यह सब कुछ मैं सरअन्जाम दूँगा, एक बात भी अधूरी नहीं रह जाएगी।
[17] लेकिन जो बुतों पर भरोसा रख कर उन से कहते हैं, ‘तुम हमारे देवता हो’ वह सख़्त शर्म खा कर पीछे हट जाएंगे।
[18] ऐ बहरो, सुनो! ऐ अंधो, नज़र उठाओ ताकि देख सको!
[19] कौन मेरे ख़ादिम जैसा अंधा है? कौन मेरे पैग़म्बर जैसा बहरा है, उस जैसा जिसे मैं भेज रहा हूँ? गो मैं ने उस के साथ अह्द बांधा तो भी रब के ख़ादिम जैसा अंधा और नाबीना कोई नहीं है।
[20] गो तू ने बहुत कुछ देखा है तू ने तवज्जुह नहीं दी, गो तेरे कान हर बात सुन लेते हैं तू सुनता नहीं।”
[21] रब ने अपनी रास्ती की ख़ातिर अपनी शरीअत की अज़मत और जलाल को बढ़ाया है, क्यूँकि यह उस की मर्ज़ी थी।
[22] लेकिन अब उस की क़ौम को ग़ारत किया गया, सब कुछ लूट लिया गया है। सब के सब गढ़ों में जकड़े या जेलों में छुपाए हुए हैं। वह लूट का माल बन गए हैं, और कोई नहीं है जो उन्हें बचाए। उन्हें छीन लिया गया है, और कोई नहीं है जो कहे, “उन्हें वापस करो!”
[23] काश तुम में से कोई ध्यान दे, कोई आइन्दा के लिए तवज्जुह दे।
[24] सोच लो! किस ने इजाज़त दी कि याक़ूब की औलाद को ग़ारत किया जाए? किस ने इस्राईल को लुटेरों के हवाले कर दिया? क्या यह रब की तरफ़ से नहीं हुआ, जिस के ख़िलाफ़ हम ने गुनाह किया है? लोग तो उस की राहों पर चलना ही नहीं चाहते थे, वह उस की शरीअत के ताबे रहने के लिए तय्यार ही न थे।
[25] इसी वजह से उस ने उन पर अपना सख़्त ग़ज़ब नाज़िल किया, उन्हें शदीद जंग की ज़द में आने दिया। लेकिन अफ़्सोस, गो आग ने क़ौम को घेर कर झुलसा दिया ताहम उसे समझ नहीं आई, गो वह भस्म हुई तो भी उस ने दिल से सबक़ नहीं सीखा।