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[1] रब ने मूसा से कहा, “इस जगह से रवाना हो जा। उन लोगों को ले कर जिन को तू मिस्र से निकाल लाया है उस मुल्क को जा जिस का वादा मैं ने इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब से किया है। उन ही से मैं ने क़सम खा कर कहा था, ‘मैं यह मुल्क तुम्हारी औलाद को दूँगा।’

[2] मैं तेरे आगे आगे फ़रिश्ता भेज कर कनआनी, अमोरी, हित्ती, फ़रिज़्ज़ी, हिव्वी और यबूसी अक़्वाम को उस मुल्क से निकाल दूँगा।

[3] उठ, उस मुल्क को जा जहाँ दूध और शहद की कस्रत है। लेकिन मैं साथ नहीं जाऊँगा। तुम इतने हटधर्म हो कि अगर मैं साथ जाऊँ तो ख़तरा है कि तुम्हें वहाँ पहुँचने से पहले ही बर्बाद कर दूँ।”

[4] जब इस्राईलियों ने यह सख़्त अल्फ़ाज़ सुने तो वह मातम करने लगे। किसी ने भी अपने ज़ेवर न पहने,

[5] क्यूँकि रब ने मूसा से कहा था, “इस्राईलियों को बता कि तुम हटधर्म हो। अगर मैं एक लम्हा भी तुम्हारे साथ चलूँ तो ख़तरा है कि मैं तुम्हें तबाह कर दूँ। अब अपने ज़ेवरात उतार डालो। फिर मैं फ़ैसला करूँगा कि तुम्हारे साथ क्या किया जाए।”

[6] इन अल्फ़ाज़ पर इस्राईलियों ने होरिब यानी सीना पहाड़ पर अपने ज़ेवर उतार दिए।

[7] उस वक़्त मूसा ने ख़ैमा ले कर उसे कुछ फ़ासिले पर ख़ैमागाह के बाहर लगा दिया। उस ने उस का नाम ‘मुलाक़ात का ख़ैमा’ रखा। जो भी रब की मर्ज़ी दरयाफ़्त करना चाहता वह ख़ैमागाह से निकल कर वहाँ जाता।

[8] जब भी मूसा ख़ैमागाह से निकल कर वहाँ जाता तो तमाम लोग अपने ख़ैमों के दरवाज़ों पर खड़े हो कर मूसा के पीछे देखने लगते। उस के मुलाक़ात के ख़ैमे में ओझल होने तक वह उसे देखते रहते।

[9] मूसा के ख़ैमे में दाख़िल होने पर बादल का सतून उतर कर ख़ैमे के दरवाज़े पर ठहर जाता। जितनी देर तक रब मूसा से बातें करता उतनी देर तक वह वहाँ ठहरा रहता।

[10] जब इस्राईली मुलाक़ात के ख़ैमे के दरवाज़े पर बादल का सतून देखते तो वह अपने अपने ख़ैमे के दरवाज़े पर खड़े हो कर सिज्दा करते।

[11] रब मूसा से रू-ब-रू बातें करता था, ऐसे शख़्स की तरह जो अपने दोस्त से बातें करता है। इस के बाद मूसा निकल कर ख़ैमागाह को वापस चला जाता। लेकिन उस का जवान मददगार यशूअ बिन नून ख़ैमे को नहीं छोड़ता था।

[12] मूसा ने रब से कहा, “देख, तू मुझ से कहता आया है कि इस क़ौम को कनआन ले चल। लेकिन तू मेरे साथ किस को भेजेगा? तू ने अब तक यह बात मुझे नहीं बताई हालाँकि तू ने कहा है, ‘मैं तुझे बनाम जानता हूँ, तुझे मेरा करम हासिल हुआ है।’

[13] अगर मुझे वाक़ई तेरा करम हासिल है तो मुझे अपने रास्ते दिखा ताकि मैं तुझे जान लूँ और तेरा करम मुझे हासिल होता रहे। इस बात का ख़याल रख कि यह क़ौम तेरी ही उम्मत है।”

[14] रब ने जवाब दिया, “मैं ख़ुद तेरे साथ चलूँगा और तुझे आराम दूँगा।”

[15] मूसा ने कहा, “अगर तू ख़ुद साथ नहीं चलेगा तो फिर हमें यहाँ से रवाना न करना।

[16] अगर तू हमारे साथ न जाए तो किस तरह पता चलेगा कि मुझे और तेरी क़ौम को तेरा करम हासिल हुआ है? हम सिर्फ़ इसी वजह से दुनिया की दीगर क़ौमों से अलग और मुम्ताज़ हैं।”

[17] रब ने मूसा से कहा, “मैं तेरी यह दरख़्वास्त भी पूरी करूँगा, क्यूँकि तुझे मेरा करम हासिल हुआ है और मैं तुझे बनाम जानता हूँ।”

[18] फिर मूसा बोला, “बराह-ए-करम मुझे अपना जलाल दिखा।”

[19] रब ने जवाब दिया, “मैं अपनी पूरी भलाई तेरे सामने से गुज़रने दूँगा और तेरे सामने ही अपने नाम रब का एलान करूँगा। मैं जिस पर मेहरबान होना चाहूँ उस पर मेहरबान होता हूँ, और जिस पर रहम करना चाहूँ उस पर रहम करता हूँ।

[20] लेकिन तू मेरा चेहरा नहीं देख सकता, क्यूँकि जो भी मेरा चेहरा देखे वह ज़िन्दा नहीं रह सकता।”

[21] फिर रब ने फ़रमाया, “देख, मेरे पास एक जगह है। वहाँ की चटान पर खड़ा हो जा।

[22] जब मेरा जलाल वहाँ से गुज़रेगा तो मैं तुझे चटान के एक शिगाफ़ में रखूँगा और अपना हाथ तेरे ऊपर फैलाऊँगा ताकि तू मेरे गुज़रने के दौरान मह्फ़ूज़ रहे।

[23] इस के बाद मैं अपना हाथ हटाऊँगा और तू मेरे पीछे देख सकेगा। लेकिन मेरा चेहरा देखा नहीं जा सकता।”

ख़ुरूज — Chapters