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[1] हो सकता है कोई आदमी किसी औरत से शादी करे लेकिन बाद में उसे पसन्द न करे, क्यूँकि उसे बीवी के बारे में किसी शर्मनाक बात का पता चल गया है। वह तलाक़नामा लिख कर उसे औरत को देता और फिर उसे घर से वापस भेज देता है।

[2] इस के बाद उस औरत की शादी किसी और मर्द से हो जाती है,

[3] और वह भी बाद में उसे पसन्द नहीं करता। वह भी तलाक़नामा लिख कर उसे औरत को देता और फिर उसे घर से वापस भेज देता है। ख़्वाह दूसरा शौहर उसे वापस भेज दे या शौहर मर जाए,

[4] औरत के पहले शौहर को उस से दुबारा शादी करने की इजाज़त नहीं है, क्यूँकि वह औरत उस के लिए नापाक है। ऐसी हरकत रब की नज़र में क़ाबिल-ए-घिन है। उस मुल्क को यूँ गुनाहआलूदा न करना जो रब तेरा ख़ुदा तुझे मीरास में दे रहा है।

[5] अगर किसी आदमी ने अभी अभी शादी की हो तो तू उसे भर्ती करके जंग करने के लिए नहीं भेज सकता। तू उसे कोई भी ऐसी ज़िम्मादारी नहीं दे सकता, जिस से वह घर से दूर रहने पर मज्बूर हो जाए। एक साल तक वह ऐसी ज़िम्मादारियों से बरी रहे ताकि घर में रह कर अपनी बीवी को ख़ुश कर सके।

[6] अगर कोई तुझ से उधार ले तो ज़मानत के तौर पर उस से न उस की छोटी चक्की, न उस की बड़ी चक्की का पाट लेना, क्यूँकि ऐसा करने से तू उस की जान लेगा यानी तू वह चीज़ लेगा जिस से उस का गुज़ारा होता है।

[7] अगर किसी आदमी को पकड़ा जाए जिस ने अपने हमवतन को अग़वा करके ग़ुलाम बना लिया या बेच दिया है तो उसे सज़ा-ए-मौत देना है। यूँ तू अपने दरमियान से बुराई मिटा देगा।

[8] अगर कोई वबाई जिल्दी बीमारी तुझे लग जाए तो बड़ी एहतियात से लावी के क़बीले के इमामों की तमाम हिदायात पर अमल करना। जो भी हुक्म मैं ने उन्हें दिया उसे पूरा करना।

[9] याद कर कि रब तेरे ख़ुदा ने मरियम के साथ क्या किया जब तुम मिस्र से निकल कर सफ़र कर रहे थे।

[10] अपने हमवतन को उधार देते वक़्त उस के घर में न जाना ताकि ज़मानत की कोई चीज़ मिले

[11] बल्कि बाहर ठहर कर इन्तिज़ार कर कि वह ख़ुद घर से ज़मानत की चीज़ निकाल कर तुझे दे।

[12] अगर वह इतना ज़रूरतमन्द हो कि सिर्फ़ अपनी चादर दे सके तो रात के वक़्त ज़मानत तेरे पास न रहे।

[13] उसे सूरज डूबने तक वापस करना ताकि क़र्ज़दार उस में लिपट कर सो सके। फिर वह तुझे बरकत देगा और रब तेरा ख़ुदा तेरा यह क़दम रास्त क़रार देगा।

[14] ज़रूरतमन्द मज़दूर से ग़लत फ़ाइदा न उठाना, चाहे वह इस्राईली हो या परदेसी।

[15] उसे रोज़ाना सूरज डूबने से पहले पहले उस की मज़दूरी दे देना, क्यूँकि इस से उस का गुज़ारा होता है। कहीं वह रब के हुज़ूर तेरी शिकायत न करे और तू क़ुसूरवार ठहरे।

[16] वालिदैन को उन के बच्चों के जराइम के सबब से सज़ा-ए-मौत न दी जाए, न बच्चों को उन के वालिदैन के जराइम के सबब से। अगर किसी को सज़ा-ए-मौत देनी हो तो उस गुनाह के सबब से जो उस ने ख़ुद किया है।

[17] परदेसियों और यतीमों के हुक़ूक़ क़ाइम रखना। उधार देते वक़्त ज़मानत के तौर पर बेवा की चादर न लेना।

[18] याद रख कि तू भी मिस्र में ग़ुलाम था और कि रब तेरे ख़ुदा ने फ़िद्या दे कर तुझे वहाँ से छुड़ाया। इसी वजह से मैं तुझे यह हुक्म देता हूँ।

[19] अगर तू फ़सल की कटाई के वक़्त एक पूला भूल कर खेत में छोड़ आए तो उसे लाने के लिए वापस न जाना। उसे परदेसियों, यतीमों और बेवाओं के लिए वहीं छोड़ देना ताकि रब तेरा ख़ुदा तेरे हर काम में बरकत दे।

[20] जब ज़ैतून की फ़सल पक गई हो तो दरख़्तों को मार मार कर एक ही बार उन में से फल उतार। इस के बाद उन्हें न छेड़ना। बचा हुआ फल परदेसियों, यतीमों और बेवाओं के लिए छोड़ देना।

[21] इसी तरह अपने अंगूर तोड़ने के लिए एक ही बार बाग़ में से गुज़रना। इस के बाद उसे न छेड़ना। बचा हुआ फल परदेसियों, यतीमों और बेवाओं के लिए छोड़ देना।

[22] याद रख कि तू ख़ुद मिस्र में ग़ुलाम था। इसी वजह से मैं तुझे यह हुक्म देता हूँ।

इस्तिस्ना — Chapters