[1] अपन जवानी के दिन म अपन सिरिस्टीकर्ता ला सुरता रख, येकर पहिले कि दुख के दिन आवय अऊ ओ बछरमन आवंय, जब तेंह कहिबे, “येमन म मोला थोरकन भी खुसी नइं मिलय”—
[2] येकर पहिले कि सूरज अऊ अंजोर अऊ चंदा अऊ तारामन अंधियार हो जावंय, अऊ बारिस के बाद बादरमन लहुंट जावंय;
[3] जब घर के रखवारमन कांपे लगंय, अऊ बलवान मनखे के देहें ह झुक जावय, जब पीसनेवालामन रूक जावंय काबरकि ओमन थोरकन हवंय, अऊ खिड़की म ले देखइयामन के आंखी ह कमजोर हो जावय;
[4] जब गली तरफ के कपाटमन बंद हो जावंय अऊ चक्की के अवाज ह धीमा हो जावय; जब मनखेमन चिरई के अवाज सुनके उठंय, पर ओ जम्मो के गीतमन के अवाज सुनई नइं देवय;
[5] जब मनखेमन ऊंचहा जगह अऊ गली के खतरा ले डरंय; जब बादाम के रूख ह फूलय अऊ फांफा ह ओकर संग घसीटके चलय अऊ ईछा ह फेर नइं जागय। तब मनखेमन अपन सदाकाल के घर म चल देथें अऊ सोक मनइयामन गलीमन म फिरत रहिथें।
[6] ओला सुरता करव—येकर पहिले कि चांदी के डोर ह कठोर हो जावय, अऊ सोन के कटोरा ह टूट जावय; येकर पहिले कि घघरी ह बसन्त के समय टूटके चकनाचूर हो जावय, अऊ कुआं म पहिया ह टूट जावय,
[7] अऊ धुर्रा ह भुइयां म लहुंट जावय, जिहां ले येह आय रिहिस, अऊ आतमा ह परमेसर करा लहुंट जावय, जऊन ह येला देय रिहिस।
[8] “बेकार अय! बेकार अय!” गुरू ह कहिथे। “हर चीज ह बेकार ए!”
[9] गुरू ह सिरिप बुद्धिमान ही नइं रिहिस, पर ओह मनखेमन ला गियान घलो दीस। ओह बिचार करिस अऊ खोजबीन करिस अऊ बहुंते नीतिबचनमन ला सही ढंग ले रखिस।
[10] गुरू ह सिरिप सही सबद पाय बर खोजबीन करिस, अऊ जऊन बात ओह लिखिस, ओ बातमन सही अऊ सच अंय।
[11] बुद्धिमान के बातमन लउठी के धार सहीं होथें, ओमन के सांत मन के कहावतमन बने ढंग ले ठोंके गय खीलामन सहीं होथें—मानो येला एकेच चरवाहा के दुवारा दिये गे हवय
[12] हे मोर बेटा, येकर अलावा अऊ आने बातमन के बारे म सावधान रहिबे। बहुंत अकन किताब के लिखे अऊ ओमन के रखे के अन्त नइं ए, अऊ जादा किताब पढ़ई ह देहें ला थका देथे।
[13] अब जम्मो बात सुने जा चुके हवय; बात के अन्त ये अय: परमेसर के भय मानव अऊ ओकर हुकूममन ला मानव, काबरकि येह जम्मो मानव-जाति के फर्ज अय।
[14] काबरकि परमेसर ह हर काम के नियाय करही, ओमा हर छिपे बातमन घलो होहीं, चाहे ओमन भलई के काम होवंय या बुरई के।