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[1] यीशु भीड़ को देखते ही पहाड़ पर चढ़ कर बैठ गए और शिष्य उनके नज़दीक आ गए।

[2] तब यीशु यह सिखाने लगे,

[3] आशीषित (धन्य) वे लोग हैं जो स्वभाव से सीधे सादे (दीन) हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

[4] आशीषित वे हैं जो दुख मनाते हैं क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।

[5] आशीषित वे हैं जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।

[6] आशीषित वे हैं जो खराई के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि उन्हें भरपूर किया जाएगा।

[7] आशीषित वे हैं जो दयालु हैं क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

[8] आशीषित वे हैं जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे।

[9] आशीषित वे हैं जो मेल कराने वाले हैं क्योंकि वे परमेश्‍वर के बेटे-बेटियाँ कहलाएँगे।

[10] आशीषित वे हैं जो अपने खरेपन की वजह से सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

[11] आशीषित हो तुम जब लोग मेरे नाम की खातिर तुम्हें तुच्छ समझें, सताएँ और झूठ बोल-बोलकर तुम्हारे खिलाफ़ (विरोध) सब तरह की गंदी बातें कहें।

[12] खुश और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा ईनाम (फल) हैः इसलिए कि उन्हों ने तुम से पहले आए नबियों को भी सताया था।

[13] तुम इस धरती के नमक हो, लेकिन अगर नमक अपना स्वाद खो दे, तो इसे फिर किस तरह नमकीन बनाया जा सकता है? तब यह बिल्कुल किसी काम का नहीं, सिर्फ़ यह कि बाहर फेंक दिया जाए और इन्सानों के पैरों से रौंदा जाए।

[14] तुम दुनिया की रोशनी हो। जो शहर पहाड़ पर है, वह छिपा नहीं रह सकता।

[15] लोग दीपक जलाकर नीचे नहीं लेकिन ऊँचाई पर रखते हैं, तभी उस घर के सभी लोगों को रोशनी मिलती है।

[16] इसी तरह तुम्हारी रोशनी इन्सानों के सामने चमके, कि वे तुम्हारे स्वर्गिक पिता की बड़ाई करें।

[17] यह न समझो कि मैं नियम शास्त्र और भविष्यद्वक्‍ताओं की किताबों को रद्द करने आया हूँ। रद्द करने नहीं, लेकिन पूरा करने आया हूँ।

[18] मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि जब तक आसमान और खतम न हो जाएँ, तब तक परमेश्‍वर की व्यवस्था की छोटी से छोटी बात भी बिना पूरे हुए नहीं रहेगी, एक मात्र या एक बिन्दु भी नहीं।

[19] इसलिए जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को न माने और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहलाएगा। लेकिन जो उन को मानने के साथ सिखाएगा भी, वही स्वर्ग के राज्य में बड़ा कहलाएगा।

[20] क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि अगर तुम्हारा खरापन शास्त्रियों और फ़रीसियों के खरेपन से बढ़कर नहीं है, तो तुम्हें परमेश्‍वर के राज्य में दाखिला न मिलेगा।

[21] तुम सुन चुके हो, कि पुराने समय के लोगों से कहा गया था कि हत्या न करना। जो कोई हत्या करेगा वह अदालत में सज़ा के लायक होगा।

[22] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि जो कोई अपने भाई (या बहन) से क्रोधित रहेगा वह स्वर्ग की अदालत में सज़ा के लायक होगा। जो कोई अपने भाई को नालायक कहे वह स्वर्ग की अदालत में सज़ा के लायक होगा। जो किसी को बेवकूफ़ कहे वह नरक की आग के खतरे में होगा।

[23] अपनी भेंट वेदी पर ले आने के बाद अचानक तुम्हें यह याद आए कि तुम्हारे भाई (या बहन) के मन में तुम्हारे विषय में कुछ नाराज़गी है, तो अपनी भेंट को वहीं वेदी के सामने छोड़कर जाओ,

[24] और अपने भाई (या बहन) से पहले सुलह कर लो, उसके बाद आकर साफ़ दिल से अपनी भेंट वेदी पर चढ़ाना।

[25] जब तक तुम अपने मुद्दई के साथ रास्ते में हो, झटपट उससे सुलह कर लो, कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुम्हें मजिस्ट्रेट को सौंपे और मजिस्ट्रेट तुम्हें सिपाही को सौंप दे और तुम जेल में डाल दिए जाओ।

[26] मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम पूरी कीमत चुका न दो, तब तक वहाँ से छूट न पाओगे।

[27] तुम सुन चुके हो कि कहा गया था कि व्यभिचार मत करना।

[28] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि जो कोई किसी महिला को बुरी नज़र से देखे, वह अपने मन में उससे व्यभिचार कर चुका।

[29] अगर, तुम्हारी दाहिनी आँख बुराई में गिरने की वजह बने, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दो। क्योंकि तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम्हारे अंगों में से एक बर्बाद हो जाए और तुम्हारी पूरी देह नरक में न डाली जाए।

[30] अगर तुम्हारा दाहिना हाथ तुम्हारे बुराई में गिरने की वजह बने, तो उसे काटकर अपने पास से फेंक दो। क्योंकि तुम्हारे लिए फ़ायदा इसी में है कि तुम्हारे अंगों में से एक बर्बाद हो जाए और तुम्हारी पूरी देह नरक में न डाली जाए।

[31] यह भी कहा गया था कि जो कोई अपनी पत्नी को छोड़े, तो तलाकनामा भी दे।

[32] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि जो अपनी पत्नी को व्यभिचार के अलावा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उस से व्यभिचार करवाता है। जो कोई उस त्यागी हुयी से शादी करे, वह व्यभिचार करता है।

[33] तुम ने सुना था कि पुराने समय के लोगों से कहा गया था, कि वे झूठी कसम न खाएँ, लेकिन प्रभु के लिए अपनी कसम को पूरा करें।

[34] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि कभी कसम न लेना, न स्वर्ग की क्योंकि वह परमेश्‍वर का सिंहासन है,

[35] न धरती की, क्योंकि धरती परमेश्‍वर के पाँव का पीढ़ा है। यरुशलेम की भी नहीं, क्योंकि वह महाराजा का शहर है।

[36] अपने सिर की कसम भी न खाना, क्योंकि तुम एक बाल को भी न सफ़ेद कर सकते हो, न काला।

[37] लेकिन तुम्हारी बात हाँ की हाँ, या नहीं की नहीं हो। जो कुछ इस से अधिक होता है वह शैतान की तरफ़ से है।

[38] तुम्हें यह बताया गया था कि आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत।

[39] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि बुरे इन्सान से झगड़ा मोल न लेना, लेकिन अगर कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर चाँटा मारे, तो अपने बाएँ गाल को भी उसकी तरफ़ कर देना।

[40] अगर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती से तुम्हारा कुरता हड़पना चाहे, तो अपनी शॉल तक दिए जाने के लिए तैयार रहना।

[41] जो कोई तुम्हें बिना मज़दूरी में एक कोस ले जाना चाहे, तो उसके साथ दो कोस जाने के लिए तैयार रहना।

[42] अगर कोई व्यक्‍ति तुम से माँगे, तो उसे दे देना और जो तुम से उधार लेना चाहे, तो उससे अपना मुँह न मोड़ना।

[43] तुम्हें बताया गया था कि अपने पड़ोसी से प्यार करो और दुश्मन से दुश्मनी रखो।

[44] लेकिन मैं तुम से यह कहता हूँ कि अपने दुश्मनों से प्यार करो और सताने वालों के लिए प्रार्थना।

[45] ऐसा करने से तुम अपने स्व`र्गिक पिता के बेटे-बेटी ठहरोगे, क्योंकि वह अच्छे बुरे दोनों ही पर अपना सूरज चमकाते हैं। और वह अच्छे-बुरे दोनों के लिए बारिश भी भेजते हैं।

[46] क्योंकि अगर तुम अपने प्यार करने वालों ही से प्यार करो, तो तुम्हें क्या मिलेगा? क्या कर लेने वाले भी ऐसा नहीं करते?

[47] और अगर तुम सिर्फ़ अपने लोगों ही का अभिवादन करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या दूसरे लोग भी ऐसा नहीं करते?

[48] इसलिए ज़रूरी यह है कि तुम दयालु बनो, जैसा तुम्हारे पिता भी जो स्वर्ग में हैं, दयालु हैं।

मत्ती सुसमाचार — Chapters