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[1] उस समय राजा हेरोदेस ने यीशु के बारे में सुना।

[2] उसने अपने सलाहकारों से कहा, "यह तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला है, वह मुर्दों में से जी उठा है। इसलिए उससे अद्भुत काम प्रगट होते हैं।"

[3] क्योंकि हेरोदेस राजा ने अपने भाई फ़िलिप की पत्नी हेरोदियास की वजह से उसे बँधवाकर जेल में डलवा दिया था।

[4] इसलिए कि यूहन्ना ने उससे कहा था, "यह जायज़ नहीं कि तुम अपने भाई की पत्नी को रखो।"

[5] हालाँकि वह उसे मरवा डालना चाहता था लेकिन क्योंकि लोग यूहन्ना को भविष्यद्वक्‍ता मानते थे, इसलिए वह लोगों से डरता भी था।

[6] जब हेरोदेस का जन्मदिन मनाया जा रहा था, हेरोदियास की बेटी ने उनके सामने नाचकर हेरोदेस को खुश किया।

[7] इसलिए उसने उसे मुँह माँगा ईनाम देने का वायदा किया।

[8] अपनी माँ से इशारा पाकर लड़की ने एक थाली में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के सिर की माँग की।

[9] इस माँग से राजा को बहुत दुख हुआ। फिर भी अपने वायदे को पूरा करने और बैठे हुए लोगों की वजह से उसने लड़की की माँग को पूरा करने का हुक्म दे दिया।

[10] उसने अपने लोगों को जेल में भेजकर यूहन्ना का सिर कटवा दिया,

[11] और उसे एक थाली में रखकर लड़की को दिया गया और लड़की ने उसे अपनी माँ को दे दिया।

[12] और यूहन्ना के शिष्यों ने आकर उसकी देह को लिया और दफ़नाने के बाद यीशु को भी बता दिया।

[13] यह सुनते ही यीशु एक नाव पर रवाना होकर एक सुनसान जगह को चले गए। जब लोगों को यह मालूम पड़ा, तो शहरों से निकलकर यीशु से मिलने पैदल ही निकल पड़े।

[14] और यीशु ने बाहर एक बड़ी भीड़ को देखकर तरस खाया और उनके बीमारों को ठीक कर दिया।

[15] जब शाम हुयी तो उनके शिष्य यह कहते हुए आए, "यह एक सुनसान जगह है और बहुत देर हो चुकी है। भीड़ को जाने दें, ताकि वे गाँवों में जाकर अपने लिए खाना खरीद सकें।"

[16] लेकिन यीशु ने शिष्यों से कहा, "यह ठीक नहीं कि वे जाएँ, तुम्हीं उन्हें कुछ खाने के लिए दो।"

[17] उन्हों ने उससे कहा, "यहाँ पर हमारे पास पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं।"

[18] यीशु ने कहा, "उन्हें मुझे दो।"

[19] तब यीशु ने लोगों को घास पर बैठ जाने के लिए कहा और पाँच रोटियों और दो मछलियों को हाथों में लेकर, आकाश की तरफ़ देखते हुए धन्यवाद किया। यीशु रोटियों को तोड़ तोड़कर चेलों को देते और चेले, लोगों को देते गए।

[20] सभी ने भर पेट खाया और इसके बावजूद भी बचे हुए टुकड़ों के बारह टोकरे बच गये।

[21] महिलाओें और बच्चों को अगर न भी गिनें तौभी लगभग पाँच हजार पुरुष ही थे।

[22] यीशु ने तुरन्त अपने शिष्यों को ज़बरदस्ती नाव पर चढ़ाया ताकि वे उन से पहले झील के उस पार चले जाएँ। इसी बीच वह लोगों को विदा करते रहे।

[23] वह लोगों को विदा करके, परमेश्‍वर पिता से सहभागिता करने को अलग पहाड़ पर चले गए और शाम को वह वहाँ अकेले थे।

[24] उस समय नाव झील के बीच लहरों से डगमगा रही थी।

[25] तभी यीशु रात के चौथे पहर, झील पर चलते हुए उनके पास आए।

[26] शिष्य यीशु को झील पर चलते देख कर और घबरा कर चिल्ला उठे, "भूत...भूत..."

[27] यीशु तुरन्त बोल उठे, "हिम्मत बाँधो, डरो मत, मैं हूँ।"

[28] पतरस ने जवाब दिया, "हे प्रभु अगर आप हैं, तो मुझे आज्ञा दें कि मैं पानी पर चलकर आपके पास आऊँ।"

[29] यीशु ने कहा, "आओ।" तुरन्त पतरस नाव पर से उतरकर यीशु की तरफ़ जाने के लिए पानी पर चलने लगा।

[30] लेकिन वह हवा को देखकर डर गया और जैसे ही डूबने लगा, वैसे ही चिल्ला उठा, "हे प्रभु मुझे बचाइए।"

[31] यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया और कहा, "हे कम विश्‍वास वाले, तूने शक क्यों किया?"

[32] जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई।

[33] जब वे नाव पर थे उन्हों ने यीशु को दण्डवत करते हुए कहा, "आप सचमुच में परमेश्‍वर के बेटे हैं।"

[34] वे सभी झील के पार उतरकर गन्नेसरत देश में पहुँचे।

[35] वहाँ के लोगों ने उन्हें पहचानकर आस-पास के सारे देशों में खबर दे दी, और सब बीमारों को उनके पास लाए।

[36] और उन से बिनती करने लगे, कि वह सिर्फ़ अपने कपड़ों की छोर को छूने दें। और जितने लोगों ने उन्हें छुआ, वे सभी बिल्कुल अच्छे हो गए।

मत्ती सुसमाचार — Chapters