[1] क्योंकि स्वर्ग का राज्य एक ऐसे गृहस्थ की तरह है जो बहुत सबेरे उठ कर अपने अंगूर के बगीचे में काम करने के लिए मज़दूर ढूँढने निकला।
[2] उनके साथ एक चाँदी के सिक्के (एक दीनार) की दिन भर की मज़दूरी तय होने के बाद, उसने उन्हें काम पर लगा दिया।
[3] जब वह सुबह नौ बजे बाहर गया, तो तमाम मज़दूरों को बाज़ार में फ़ालतू खड़े हुए देखा और उन से भी कहा,
[4] "तुम भी अंगूर के बगीचे में काम करने जाओ और मैं तुम्हें वाजिब मज़दूरी दूँगा।" और उन्हों ने ऐसा किया भी।
[5] दोपहर और तीसरे पहर जाकर उसने फिर वैसा ही किया।
[6] शाम पाँच बजे फिर दूसरों को फ़ालतू खड़े देखा और पूछा, "तुम पूरे दिन यहाँ ऐसे ही क्यों खड़े हो? "उन्हों ने उससे कहा, "किसी ने भी हमें काम नहीं दिया।"
[7] उसने उन से कहा, "तुम भी जाकर अंगूर के बगीचे में काम करो और तुम्हें मज़दूरी दी जाएगी।"
[8] शाम होने पर बगीचे के मालिक ने अपने मैनेजर से कहा, "शुरू से आखिर तक आने वाले मज़दूरों को बुलाकर मज़दूरी दे डालो।"
[9] जिन लोगों को पाँच बजे काम पर लगाया था, चाँदी का एक सिक्का (एक दीनार) दिया गया।
[10] जब वे लोग सामने आए जिन्हें सुबह से काम पर लगाया गया था,
[11] तो उन्हें भी चाँदी का एक सिक्का दिया गया, जब कि वे ज़्यादा मिलने की आशा लगाए हुए थे।
[12] मज़दूरी मिलते ही वे मालिक की शिकायत यह कह कर करने लगे, "जिन लोगों ने एक घण्टा ही काम किया, उन्हें भी वही मज़दूरी दी गयी है, जो हम सभी को धूप में भारी काम करने पर मिली है।"
[13] लेकिन उसने उत्तर दिया, "दोस्त, मैं तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुम ने ही एक चाँदी के सिक्के (एक दीनार) में काम करना कबूल नहीं किया था?
[14] अपना हिस्सा लो और चल पड़ो। यह मेरी मर्ज़ी है कि मैंने उन्हें भी उतना ही दिया है, जितना तुम्हें दिया है।
[15] क्या यह वाजिब नहीं कि मैं अपने पैसे से जो चाहूँ वह करूँ? क्या तुम्हें जलन हो रही है कि मैं उदार मन का हूँ।
[16] इसलिए जो पहले आए हैं वे ऊँचा पद नहीं पाएँगे, और जिनको कोई पूछता भी नहीं वे श्रेष्ठ होंगे।
[17] यरूशलेम जाते समय यीशु मसीह ने अपने बारहों शिष्यों को अलग ले जाकर उन से कहा,
[18] "देखो, हम लोग यरूशलेम जा रहे हैं। मनुष्य का पुत्र प्रधान पुरोहितों और शिक्षकों के हाथ पकड़वाया जाएगा। वे लोग उसे मार डालेंगे।
[19] उसकी हँसी उड़ाए जाने के लिए गैरयहूदियों के हाथ सुपुर्द किए जाने के साथ कोड़े लगाएँगे और क्रूस पर चढ़ा देंगे। वह तीसरे दिन ज़िन्दा हो जाएगा।
[20] तब ज़ब्दी के बच्चों की माँ अपने बेटों के साथ यीशु के कदमों पर गिरकर कुछ माँगने लगी।
[21] यीशु ने उससे पूछा, "तुम्हें क्या चाहिए?" उसने उन से कहा, "कुछ ऐसा कीजिए कि आसमानी (स्वर्गिक) राज्य में मेरे दोनों बेटों में से एक आपके बाएँ हाथ और दूसरा दाएँ हाथ पर बैठे।"
[22] लेकिन यीशु ने जवाब में कहा, "तुम्हें मालूम नहीं कि क्या माँग रहे हो। क्या तुम वह प्याला पी सकते हो, जो मैं पीने जा रहा हूँ और उस बपतिस्मे को लोगे जो मैं लेने पर हूँ?" उन्हों ने कहा, "हम कर सकते हैं।"
[23] यीशु ने उन से कहा, "तुम सचमुच में मेरा प्याला पीओगे और मैं जिस बपतिस्मे को लेने पर हूँ, उसे लोगे, लेकिन मेरे दाहिने हाथ और बाएँ हाथ पर बैठाने का काम मेरा नहीं है, लेकिन यह उनको मिलेगा, जिनको मेरे पिता ने तैयार किया है।"
[24] जब बाकी दस ने यह सब सुना तो उन दोनों भाइयों से नाराज़ होने लगे।
[25] लेकिन यीशु ने उन्हें बुलाकर कहा, "तुम्हें मालूम है कि गैरयहूदियों में प्रधान लोग दूसरों के ऊपर शासन करते हैं और जो महान हैं वे दूसरों के ऊपर अधिकार जताते हैं।
[26] लेकिन तुम्हारे बीच ऐसा नहीं होना चाहिए। तुम में से जो बड़ा बनना चाहता है, उसे दूसरों का सेवक बनना चाहिए।
[27] जो सब से आगे का या ऊँचा पद चाहते हैं, उन्हें दूसरों का गुलाम (दास) बनना चाहिए।
[28] उसी तरह से मनुष्य का पुत्र सेवा लेने के बजाए सेवा करने आया और अपना जीवन बहुत से लोगों के बदले में देने के लिए आया।
[29] जैसे ही वे यरीहो से निकल रहे थे, यीशु के साथ एक बड़ी भीड़ हो लीं।
[30] अचानक ही दो व्यक्तियों ने जिन्हें आँखों से बिल्कुल नहीं दिखता था और रास्ते के किनारे बैठे हुए थे, सुना कि यीशु वहाँ से गुज़र रहे हैं। सुनते ही वे चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगे, "हे दाऊद के बेटे, हम पर दया कीजिए।"
[31] भीड़ ने उन्हें चिल्लाने को मना किया, लेकिन उन्हों ने और ज़ोरों से चिल्ला-चिल्ला कर कहा, "हे दाऊद की सन्तान, हम पर दया कीजिए।"
[32] यीशु वहीं खड़े हो गए और उन से पूछा, "तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए करूँ?"
[33] उन्हों ने उन से कहा, "स्वामी, यही कि हम देखने लगें।'
[34] यीशु ने तरस खाकर उनकी आँखें छू लीं और तुरन्त उनकी आँखें खुल गयीं। उसी समय से वे यीशु को मानने लगे।