[1] फिर याहवेह ने नोहा से कहा, “तुम और तुम्हारा पूरा परिवार जहाज़ में जाओ, क्योंकि इस पृथ्वी पर केवल तुम ही धर्मी हो.
[2] तुम अपने साथ उन पशुओं के सात-सात जोड़े नर एवं मादा ले लो, जो शुद्ध माने जाते हैं तथा उन पशुओं का भी एक-एक जोड़ा, जो शुद्ध नहीं माने जाते.
[3] इसी प्रकार आकाश के पक्षियों के सात-सात जोड़े—नर तथा मादा, ले लो.
[4] क्योंकि अब से सात दिन के बाद, मैं पृथ्वी पर जल बरसाऊंगा, चालीस दिन तथा चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा और भूमि पर मेरे द्वारा रचे गये सभी जीवित प्राणी नष्ट हो जायेंगे.”
[5] नोहा ने याहवेह की सब बातों को माना.
[6] जब पृथ्वी पर जलप्रलय शुरु हुआ, तब नोहा छः सौ वर्ष के थे.
[7] नोहा, उनकी पत्नी, उनके पुत्र, तथा उनकी बहुएं जहाज़ में चले गए.
[8] शुद्ध तथा अशुद्ध पशु, पक्षी तथा भूमि पर रेंगनेवाले जंतु,
[9] नर एवं मादा को जोड़ों में नोहा ने जहाज़ में लिया, जैसा परमेश्वर ने नोहा से कहा था.
[10] सात दिन बाद पृथ्वी पर पानी बरसना शुरु हुआ.
[11] नोहा के छः सौ वर्ष के दूसरे महीने के सत्रहवें दिन महासागर के सोते फूट पड़े तथा आकाश को खोल दिया गया.
[12] और पृथ्वी पर चालीस दिन तथा चालीस रात लगातार बरसात होती रही.
[13] ठीक उसी दिन नोहा, उनके पुत्र शेम, हाम तथा याफेत, नोहा की पत्नी तथा उनकी तीनों बहुएं जहाज़ में चले गए.
[14] और उनके साथ सब जाति के वन्य पशु, पालतू पशु, रेंगनेवाले जंतु, सभी प्रकार के पक्षी जहाज़ में गए.
[15] इस प्रकार वे सभी, जिसमें जीवन था, जहाज़ में पहुंच गए.
[16] नोहा ने परमेश्वर के आदेश के अनुसार, जो जहाज़ में पहुंचे थे, सभी प्राणियों के नर एवं मादा जहाज़ में आए और सबके अंदर जाते ही याहवेह ने द्वार बंद कर दिया.
[17] पृथ्वी पर चालीस दिन तथा चालीस रात तक पानी बरसता रहा. पानी ऊपर होता गया और जहाज़ भी ऊपर उठता गया.
[18] पानी से पूरी पृथ्वी डूब गई, और जहाज़ पानी के ऊपर तैरता रहा.
[19] जल पृथ्वी पर इतना बढ़ गया कि बड़े-बड़े पहाड़ भी डूब गए.
[20] पानी पहाड़ के लगभग सात मीटर ऊंचा हो गया.
[21] पृथ्वी पर का सब कुछ नाश हो गया; प्रत्येक जीवित प्राणी जो भूमि पर चलती थी—पक्षी, पशु, जंगली जानवर, वे सभी प्राणी जो पृथ्वी पर तैरते हैं, और पूरी मानव जाति.
[22] थल के सभी जीवित प्राणी मर गये.
[23] इस प्रकार याहवेह ने पृथ्वी के सभी मनुष्य, पशु, रेंगनेवाले जंतु आकाश के पक्षी, सभी को नाश कर दिया. केवल नोहा और उनका परिवार तथा जो जीव-जन्तु जहाज़ में थे, वही बचे.
[24] 150 दिन पृथ्वी पानी से ढकी रही.