Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 0:40

[1] मैंने मुसीबत में ख़ुदावन्द से फ़रियाद की, और उसने मुझे जवाब दिया।

[2] झूटे होंटों और दग़ाबाज़ ज़बान से, ऐ ख़ुदावन्द, मेरी जान को छुड़ा।

[3] ऐ दग़ाबाज़ ज़बान, तुझे क्या दिया जाए? और तुझ से और क्या किया जाए?

[4] ज़बरदस्त के तेज़ तीर, झाऊ के अंगारों के साथ।

[5] मुझ पर अफ़सोस कि मैं मसक में बसता, और क़ीदार के ख़ैमों में रहता हूँ।

[6] सुलह के दुश्मन के साथ रहते हुए, मुझे बड़ी मुद्दत हो गई।

[7] मैं तो सुलह दोस्त हूँ। लेकिन जब बोलता हूँ तो वह जंग पर आमादा हो जाते हैं।

ज़बूर — Chapters