[1] अब तक भीड़ बढ़ चुकी थी और उनके खाने के लिए कुछ नहीं था, तभी यीशु ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा,
[2] "इसलिए कि लोग मेरे साथ तीन दिन से हैं और इन के पास खाने के लिए कुछ नहीं है, मुझे इन पर बड़ी दया आ रही है।
[3] अगर मैं इन्हें खाली पेट घर भेज दूँ, तो ये लोग रास्ते ही में बेहोश होकर गिर पड़ेंगे, क्योंकि इन में से बहुत लोग काफ़ी दूर से आए हैं।"
[4] यीशु के शिष्य बोले, "इस छोटी जगह में इतने सारे लोगों के लिए रोटी का इन्तज़ाम कैसे किया जा सकता है?"
[5] यीशु ने पूछा, "तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ है?" वे बोले, "सात"।
[6] यीशु ने सभी लोगों को ज़मीन पर बैठ जाने की आज्ञा दी। सात रोटियाँ अपने हाथ में लेकर, धन्यवाद के साथ तोड़ीं और शिष्यों ने लोगों को परोस दीं।
[7] उनके पास कुछ छोटी मछलियाँ भी थीं, जिन्हें यीशु ने लोगों में बाँटने के लिए आज्ञा दी।
[8] वे लोग खाना खाकर तृप्त हो गए। और उन्हों ने बचे हुए टुकड़ों से सात टोकरियाँ भर लीं।
[9] उस दिन करीब चार हज़ार लोगों ने खाना खाया। फिर यीशु ने उन्हें घर भेज दिया।
[10] इसके तुरन्त बाद यीशु अपने शिष्यों के साथ नाव पर बैठ कर दलमनूता इलाके की तरफ़ रवाना हुए।
[11] फ़रीसी आकर सवाल करने लगे और परखने के लिए स्वर्ग से किसी चिन्ह की माँग की।
[12] बड़ी गहरी साँस लेते हुए यीशु बोले, "इस ज़माने के लोग चिन्ह की तलाश में क्यों रहते हैं? मैं तुम से सच कहता हूँ, इस ज़माने के लोगों को कोई चिन्ह नहीं दिया जाएगा।"
[13] उन को छोड़कर फिर यीशु नाव पर बैठकर उस पार चले गए।
[14] शिष्य अपने साथ रोटी लेना भूल गए थे। उनके पास नाव में एक से ज्य़ादा रोटी नहीं थीं।
[15] उन्हें चेतावनी देते हुए यीशु ने कहा, "फ़रीसियों के ख़मीर और हेरोदेस के ख़मीर से सावधान रहना"।
[16] उन्हों ने आपस में वादविवाद करते हुए कहा, "हमारे पास तो रोटी नहीं हैं।"
[17] यह जान लेने से यीशु ने उन से कहा, "तुम लोग इस बात पर चर्चा क्यों कर रहे हो कि तुम्हारे पास रोटी नहीं है? क्या तुम अब तक समझ नहीं रहे हो? क्या तुम्हारा मन अभी भी कठोर है?
[18] तुम्हारे आँखें हैं, क्या तुम देख नहीं सकते हो? और तुम्हारे पास कान हैं, क्या सुन नहीं पाते हो? क्या तुम्हें याद नहीं है?
[19] मैंने जब पाँच हज़ार के लिए पाँच रोटियाँ तोड़ीं, तुम ने टुकड़ों के कितने टोकरे उठाए थे? उन्हों ने कहा, "बारह"।
[20] और जब मैंने चार हज़ार के लिए सात रोटियाँ तोड़ी थी, तब तुम ने रोटियों के टुकड़ों के कितने टोकरे उठाए थे? वे बोले, "सात"।
[21] यीशु ने उन से कहा, "क्या बात है कि तुम कुछ भी नहीं समझते हो।"
[22] जब यीशु बैतसैदा पहुँचे, एक अन्धे व्यक्ति को वे उनके पास लाए ताकि, यीशु उन्हें छुएँ।
[23] यीशु उसका हाथ पकड़कर शहर के बाहर ले गए। उसकी आँखों में थूका और हाथ रखने के बाद पूछा कि उसे कुछ दिख रहा है या नहीं।
[24] उस आदमी ने ऊपर देखकर कहा, "मुझे लोग चलते हुए दिख रहे हैं, लेकिन जैसे कि पेड़ चल रहे हों।"
[25] जब यीशु ने दोबारा उसकी आँखों में हाथ रखकर ऊपर देखने को कहा, तो वह साफ़-साफ़ देखने लगा।
[26] यीशु ने उसे घर वापस लौट जाने के साथ-साथ यह कहा कि वह न तो शहर को जाए और न ही वहाँ किसी व्यक्ति को बताए।
[27] यीशु और उनके शिष्य जब कैसरिया फ़िलिप्पी नगर को जा रहे थे, रास्ते में शिष्यों से उन्हों ने एक प्रश्न किया, "मेरे बारे में लोगों के क्या ख्याल हैं?"
[28] उन्हों ने उत्तर में कहा, कुछ कहते हैं कि आप यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले हैं, कुछ एलिय्याह और दूसरे भविष्यद्वक्ताओं में से एक।
[29] यीशु बोले, "तुम मुझे क्या कहते हो?" पतरस ने कहा, "आप मसीह हैं।"
[30] यीशु ने उन्हें यह किसी और को बताने के लिए मना किया।
[31] यीशु उन्हें सिखाने लगे कि मनुष्य का पुत्र (मैं खुद) सताए जाने के साथ, बुज़ुर्गों, प्रधान पुरोहितों और शास्त्रियों द्वारा मार डाला जाएगा, लेकिन तीसरे दिन जी उठेगा।
[32] यह बात यीशु खुल्लम-खुल्ला कहा करते थे। यह सुन पतरस यीशु को अलग ले जाकर डाँटने-डपटने लगा।
[33] यीशु ने मुड़कर अपने शिष्यों को देखते हुए पतरस को डाँटते हुए कहा, "दूर हटो, शैतान! तुम परमेश्वर की नहीं लेकिन इन्सानों की बात पर मन लगा रहे हो।
[34] यीशु ने अपने शिष्यों के साथ लोगों को भी बुलाया उन से कहा, "जो मुझे अपनाना चाहता है, उसे चाहिए कि अपनी खुदी का इन्कार करे, अपनी सूली उठाए और मेरी सुनकर जीना शुरु कर दे।
[35] इसलिए कि जो कोई अपने जीवन को बचाना चाहता है, वह इसे खो देगा, लेकिन जो मेरे और मेरे सुसमाचार के लिए अपना जीवन बिता देना चाहता है, वह इसे बचाएगा।
[36] क्योंकि एक इन्सान यदि सारी दुनिया को हासिल करे लेकिन अपनी आत्मा को खो दे, तो क्या फ़ायदा?
[37] इन्सान अपनी आत्मा के बदले में क्या देगा?
[38] इसलिए जो कोई इस व्यभिचारी और दुष्ट पीढ़ी से मुझ से शर्माएगा, मनुष्य का पुत्र जब अपने पिता की महिमा और पवित्र स्वर्गदूतों के साथ आएगा, उससे शर्माएगा।"