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[1] बहुत दिनों के बाद कफ़रनहूम के एक घर में यीशु की मौजूदगी के बारे में कई लोगों को पता लगा।

[2] बड़ी संख्या में लोगों के आ जाने पर दरवाज़े के पास तक जगह नहीं थी, लेकिन यीशु लोगों को परमेश्‍वर की बातें (वचन) सिखा रहे थे।

[3] तभी चार जन एक लकुवे के बीमार को उठाए यीशु से मिलने पहुँचे।

[4] भीड़ की वजह से यीशु तक न पहुँच सकने के कारण, उन्हों ने छत पर जाकर खपरैल हटाए। फिर बीमार आदमी सहित चारपाई को ऊपर से लटकाकर यीशु के सामने रख दिया।

[5] उन चारों के भरोसे को देखकर यीशु ने लकुवा पीड़ित से कहा, "बेटा तुम्हारे गुनाह माफ़ हो चुके हैं।"

[6] तब वहाँ बैठे तमाम धार्मिक पण्डित अपने मनों में सोचने लगे, "यह इन्सान (यीशु) ऐसा क्यों कह रहा है?

[7] यह तो परमेश्‍वर की निन्दा करता है, परमेश्‍वर को छोड़ और कौन है जो गुनाह माफ़ कर सकता है।

[8] तुरन्त यीशु ने अपनी आत्मा में जान लिया कि वे अपने - अपने मन में क्या सोच रहे हैं। उन से यीशु ने कहा, "तुम अपने अन्दर यह ख्य़ाल क्यों आने दे रहे हो?

[9] क्या लकुवे से पीड़ित व्यक्‍ति से कहना कि उसके गुनाह माफ़ हो चुके हैं यह सरल है, या यह कि अपनी चारपाई उठा कर वापस जाओ?"

[10] लेकिन उन्हें यह सिखाने के लिए कि पाप क्षमा करने का अधिकार भी यीशु के पास है,

[11] यीशु ने उस अपंग से कहा, "अपनी चारपाई उठाकर घर जाओ।"

[12] उसी समय वह आदमी उठा, अपनी चारपाई उठाई और सब के देखते-देखते चला गया। यह देख सभी अचरज से भरकर कहने लगे, "हम ने ऐसा कभी नहीं देखा है।"

[13] वहाँ से निकलकर यीशु झील के किनारे गए जहाँ सारी भीड़ उनके पास दौड़ी चली आयी और यीशु उन्हें सिखाने लगे।

[14] जाते वक्‍त़ यीशु ने हलफ़ई के बेटे लेवी को टैक्स की गद्दी पर बैठे देखा और उसे साथ आने के लिए कहा। और लेवी उनके साथ हो लिया।

[15] जब यीशु उसके घर खाना खाने बैठे तब बहुत से टैक्स लेने वाले और गुनाहगार भी वहाँ हाज़िर थे। तब तक यीशु के साथ हो लेने वालों की संख्या काफ़ी हो चुकी थी।

[16] यह देखकर कि यीशु टैक्स लेने वालों और गुनाहगारों के साथ खाना खा रहे हैं, धार्मिक पण्डितों और फ़रीसियों ने यीशु के शिष्यों से कहा, "वह तो टैक्स लेने वालों और पापियों के साथ खाते-पीते हैं।"

[17] यह सुनकर यीशु ने, उन से कहा, "तन्दुरुस्त लोगों को डॉक्टर की ज़रुरत नहीं पड़ती है, लेकिन बीमारों को पड़ती है। मेरा निमन्त्रण (बुलावा) धर्मी लोगों के लिए नहीं है, लेकिन गुनाहगारों के लिए है।"

[18] यूहन्ना के शिष्य और फ़रीसी उपवास करते थे, इसलिए उन्हों ने आकर यीशु से यह कहा, "यूहन्ना के शिष्य और फ़रीसियों के शिष्य उपवास रखते हैं, लेकिन आपके शिष्य क्यों नहीं रखते?"

[19] यीशु बोले, "क्या बराती कभी उपवास करेंगे जब कि दूल्हा उनके साथ है? कभी नहीं।

[20] लेकिन ऐसे दिन आएँगे, जब दूल्हा बरातियों से अलग किया जाएगा, तब वे उपवास करेंगे।

[21] पुराने पहने हुए कपड़ों पर कोई नये कपड़ों का पैवन्द नहीं लगाता है। ऐसा करने से नया पैवन्द पुराने कपड़ों में से कुछ खींच लेगा, और पहना हुआ पैबन्द लगा कपड़ा और ज्य़ादा फट जाएगा।

[22] ताजे अंगूर के रस को कोई भी पुरानी मश्कों में नहीं रखता है, क्योंकि ऐसे में तो ताज़ा अंगूर का रस मश्कों को फाड़ डालेगा। परिणामस्वरुप अंगूर का रस और मश्कें दोनों ही बर्बाद हो जाएँगी। हमेशा नया रस नयी मश्कों में भरा जाता है।"

[23] एक सब्त के दिन जब यीशु अपने शिष्यों के साथ खेतों में से हो कर जा रहे थे, शिष्य चलते-चलते खड़ी फ़सल की बालें तोड़ने लगे।

[24] फ़रीसियों ने कहा, "देखिए, सब्त में जो करना जायज़ नहीं है, ये लोग वही कर रहे हैं।

[25] यीशु ने उन से कहा, "क्या तुम्हें मालूम नहीं कि ज़रूरत के समय जब दाऊद और उसके साथी भूखे हुए थे, तो उन्हों ने क्या किया था?

[26] भेंट की रोटी पुरोहित के अलावा किसी और को खाने की इज़ाज़त नहीं थी। लेकिन क्या तुम्हें मालूम नहीं कि अबियातार पुरोहित के समय दाऊद प्रार्थना घर में गया और अपने साथियों के साथ मिलकर वह रोटी खायी?

[27] यीशु ने कहा, "सब्त इन्सान के लिये बनाया गया था, न कि इन्सान सब्त के लिये।

[28] क्योंकि मैं सब्त के दिन से भी बढ़कर हूँ।"

मरकुस सुसमाचार — Chapters