[1] जिस आज़ादी के लिए मसीह ने हमें आज़ाद किया है, उसमें मजबूती से बने रहो। गुलामी के बन्धन में बन्धे रहना स्वीकार न करो।
[2] मैं पौलुस तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम खतना कराओगे, तो मसीह से कोई फ़ायदा नहीं होगा।
[3] मैं गंभीरता से हर व्यक्ति के सामने ऐलान करता हूँ कि जो खतना करवाता है उसे सभी धार्मिक नियमों को मानना पड़ेगा।
[4] तुम जो नियमशास्त्र के द्वारा खरे या सिद्ध ठहराया जाना चाहते हो, मसीह तुम से दूर हो गए हैं और तुम अति महान् कृपा (फ़ज़ल या अनुग्रह) से गिर चुके हो।
[5] आत्मा के द्वारा हम उद्धार के सभी फ़ायदों का इन्तज़ार करते हैं, जो विश्वास से है।
[6] यीशु मसीह में न खतना न खतनाहीन कुछ हासिल कर सकता है, लेकिन सिर्फ़ विश्वास जो प्रेम द्वारा प्रेरित है।
[7] तुम अच्छी दौड़ दौड़ रहे थे। तुम्हें किसने रोक दिया ताकि तुम सत्य को न मानो?
[8] यह शिक्षा तुम्हें उन से नहीं मिलती है, जिन्होंने तुम्हें बुलाया है।
[9] थोड़ा सा खमीर पूरे आटे को खमीरा कर देता है।
[10] मुझे यीशु में तुम पर भरोसा है, कि तुम किसी और शिक्षा को नहीं अपनाओगे। जो तुम्हें परेशान कर रहा है, चाहे वह कोई भी क्यों न हो, दण्ड पाएगा।
[11] भाइयो-बहनो, जहाँ तक मेरा सवाल है यदि मैं अभी भी खतने का संदेश देता हूँ, तो मैं सताव क्यों सह रहा हूँ? यदि ऐसा है तो क्रूस से ठोकर लगने की बात ही नहीं रही।
[12] जो तुम्हें परेशान करते हैं, अच्छा होता कि वे अपने अंग को ही काट डालते।
[13] भाइयो-बहनो, तुम्हें आज़ादी के लिए अलग किया गया है किन्तु इस आज़ादी को अपनी शारीरिक इच्छा पूरी करने के लिए इस्तेमाल मत करो। इसके बजाए प्रेम से एक दूसरे की सेवा करो।
[14] पूरे नियमशास्त्र का एक निचोड़ यह हैः "तुम अपने पड़ोसी (दूसरों से) से अपने समान प्रेम रखो"
[15] किन्तु यदि तुम एक दूसरे को फाड़ खाते हो, तो सतर्क रहो, कि एक दूसरे को खतम न कर डालो।
[16] इसलिए मैं कहता हूँ आत्मा के द्वारा जीवन जियो तब तुम अपनी इच्छाओं के अनुसार नहीं जीओगे।
[17] क्योंकि पुराना स्वभाव पवित्र आत्मा के विरोध में इच्छा रखता है और पवित्र आत्मा पुराने स्वभाव के विरोध में। ये एक दूसरे के विरोधी हैं, ताकि तुम वह सब न कर सको, जो तुम चाहते हो।
[18] किन्तु यदि तुम पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से जीवन बिताते हो, तो तुम नियमशास्त्र की आधीनता में नहीं हो।
[19] पुराने स्वभाव के कार्य ये सब हैं, व्यभिचार, लुचपन, अशुद्धता, दुष्टता,
[20] मूर्तिपूजा, जादू-टोना, नफ़रत, झगड़े, गलत शिक्षाएँ, ईर्ष्या, क्रोध, हत्या, मतवालापन,
[21] डाह, लीला-क्रीड़ा और इस तरह के अनेकों काम हैं, जिनके बारे में मैं पहले से बता चुका हूँ। ऐसा करने वाले लोग परमेश्वर के राज्य के हिस्सेदार (वारिस) नहीं हो पायेंगे।
[22] किन्तु पवित्र आत्मा का फल प्रेम, खुशी, शान्ति, धीरज, सहनशीलता, दयालुता, भलाई, विश्वास,
[23] नम्रता और संयम है। इन सब के विरोध में कोई व्यवस्था (नियमशास्त्र) नहीं है।
[24] जो मसीह के हो चुके हैं, उन्हों ने अभिलाषाओं और इच्छाओं सहित पुराने स्वभाव को क्रूस पर चढ़ा दिया है।
[25] यदि हम पवित्र आत्मा में जीवित हैं, तो उसी के अनुसार हमारा जीवन जिया जाए।
[26] हम झूठी प्रशंसा की चाह रखकर एक दूसरे को न चिढ़ाएँ और न ही एक दूसरे से जलें।