[1] चौदह वर्ष के बाद मैं तीतुस और बरनबास के साथ फिर से यरूशलेम गया।
[2] स्वर्गिक मार्गदर्शन पाने के बाद मैंने ऐसा किया था, ताकि मैं उनके सामने उस सुसमाचार को रख सकूँ, जिसे मैंने गैर यहूदियों को सुनाया था। ऐसा मैंने आदरणीय लोगों के साथ अकेले में किया, ताकि मेरी दौड़ (मेहनत) बेकार न ठहरे।
[3] यहाँ तक कि तीतुस जो यूनानी था और मेरे साथ था, खतना कराने के लिए मजबूर किया गया।
[4] यह उन झूठे भाइयों के कारण हुआ जिन्हें गुप्त तरीके से लाया गया था। वे मसीह यीशु में जो हमारी आज़ादी थी, उससे हमें हटाने के लिए, लुके-छुपे जासूसी कर रहे थे।
[5] हम ने उनके हाथों में एक क्षण के लिए भी अपने आप को सुपुर्द नहीं किया, ताकि खुशी के संदेश की सच्चाई तुम्हारे साथ बनी रहे।
[6] जो लोग कुछ समझे जाते थे उन से मुझे कुछ भी हासिल न हुआ-वे कैसे थे इस का भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि परमेश्वर किसी की भी तरफ़दारी नहीं करते हैं।
[7] इसके विपरीत उन्हों ने देखा, कि खतना रहित लोगों को खुशी का संदेश देने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी है जिस तरह से खतना वालों की ज़िम्मेदारी पतरस को दी गयी थी।
[8] जो पवित्र आत्मा पतरस की प्रेरिताई सेवा में कार्य कर रहा था, वही प्रभावशाली तरीके से गैरयहूदियों में मेरे द्वारा कार्य कर रहा था।
[9] याकूब, कैफ़ा और यूहन्ना जो खंभे समझे जाते थे, जब उन्हों ने मुझे प्राप्त अनुग्रह (मेरे बदलाव) को देखा तब बरनबास और मुझे सहभागिता का दाहिना हाथ दिया। उन्हों ने यह सलाह मान ली कि हम गैर यहूदियों के पास जाएँ और वे यहूदियों के पास,
[10] परन्तु वे चाहते थे कि हम गरीबों का ध्यान रखें। मैं भी वही करने के लिए तैयार था।
[11] जब पतरस अन्ताकिया आया, मैंने उसके सामने उसका विरोध किया, क्योंकि वह दोषी था।
[12] इसलिए कि याकूब की ओर से कुछ लोगों के आने से पहले वह गैरयहूदियों के साथ खाना खाता था। किन्तु जब वे वहाँ पहुँचे, खतना वालों के डर से उसने अपने आपको अलग कर लिया।
[13] दूसरे यहूदी भी उसके साथ धोखे में पड़ गए, यहाँ तक कि बरनबास भी उसी कपट में बह गया।
[14] जब मैंने यह देखा, कि वे सच्चे संदेश (सुसमाचार) के सत्य के अनुसार बर्ताव नहीं कर रहे हैं, सब के सामने मैंने पतरस से कहा, "यहूदी होकर यदि तुम गैर यहूदियों की तरह जीओगे, यहूदियों के समान नहीं, तो तुम और गैर यहूदियों को यहूदियों की तरह जीने के लिए क्यों मजबूर करते हो?
[15] हालाँकि हम जन्म से यहूदी हैं और गैरयहूदियों में से नहीं,
[16] तौभी यह जानकर कि इन्सान नियमशास्त्र (व्यवस्था) के अनुसार काम करने से नहीं, "बल्कि सिर्फ़ यीशु मसीह पर विश्वास लाने से धर्मी (क्षमा किया हुआ और सिद्ध) ठहरता है। हम ने भी यीशु मसीह पर विश्वास किया ताकि हम भी यीशु पर विश्वास करने से धर्मी (सज़ामुक्त और सिद्ध) ठहराए जाएँ न कि नियमशास्त्र के अनुसार। क्योंकि नियमशास्त्र के अनुसार करने वाला कोई भी इन्सान सिद्ध (धर्मी) साबित नहीं होगा।
[17] हम जो मसीह में धर्मी और परमेश्वर के सामने पूर्ण ठहरना चाहते हैं अगर खुद ही गुनाहगार निकले, तो क्या मसीह ने हमें गुनाह करने के लिए उभारा है? बिल्कुल नहीं
[18] क्योंकि जो कुछ मैंने ढा दिया अगर उसे फिर बनाऊँ, तो खुद मैं ही परमेश्वर के कानून को तोड़ने वाला हुआ।
[19] क्योंकि मैं नियमशास्त्र ही के द्वारा मर गया, ताकि परमेश्वर के लिए जीऊँ।
[20] मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं नहीं, लेकिन मसीह मुझ में जीवित हैं। इसलिए इस देह में जो जीवन मैं जी रहा हूँ, यह परमेश्वर के बेटे यीशु की विश्वासयोग्यता की वजह से है, जिन्होंने मुझ से प्यार किया और अपने आप को मेरे लिए दे दिया।
[21] मैं परमेश्वर की असीमित कृपा को नज़रअन्दाज़ नहीं करता हूँ, क्योंकि अगर नियमशास्त्र से धर्मी (सिद्ध) ठहराया जाना होता, तो मसीह का मरना बेकार हुआ होता।