[1] प्रिय भाइयो बहनो, किसी भी आत्मा पर विश्वास मत कर लेना, लेकिन परखना कि वे परमेश्वर से हैं या नहीं, क्योंकि इस दुनिया में बहुत से झूठे (जाली) भविष्यद्वक्ता हैं।
[2] परमेश्वर की आत्मा की पहचान यह हैः हर एक आत्मा जो यह मान लेती है कि यीशु मसीह देह में आए, परमेश्वर की ओर से है।
[3] प्रत्येक वह आत्मा जो यह स्वीकार नहीं करती कि यीशु देह में आए, परमेश्वर की ओर से नहीं है। यह यीशु विरोधी आत्मा है, जिसके आने के बारे में तुम ने सुन रखा था। यह आत्मा इस समय दुनिया में है।
[4] छोटे बच्चो, तुम परमेश्वर के हो और तुम ने उन पर जीत हासिल की है, इसलिए कि जो इस संसार में है उससे बढ़कर वह हैं जो तुम में हैं।
[5] वे संसार के हैं इसलिए संसार के बारे में बोलते हैं और संसार उनकी सुनता है।
[6] हम परमेश्वर के हैं। जो परमेश्वर को जानता है, हमारी सुनता है, लेकिन जो परमेश्वर का नहीं है, हमारी नहीं सुनता है। इसी से हमें सही और गलत की पहचान होती है।
[7] प्रियो, हम एक दूसरे से प्रेम रखें, इसलिए कि प्रेम परमेश्वर से है और हर एक जो प्रेम रखता है, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है और परमेश्वर को जानता है।
[8] जो प्रेम नहीं करता है, वह परमेश्वर को नहीं जानता है क्योंकि परमेश्वर प्रेम हैं।
[9] परमेश्वर का प्रेम इस तरह से प्रगट हुआ, कि परमेश्वर ने अपने प्रिय एकलौते बेटे को इस दुनिया में भेजा, ताकि हम उनके द्वारा जिंदा रहें (जीवन पाएँ)।
[10] प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर पिता से प्रेम किया है, लेकिन यह कि उन्हों ने हम से प्रेम किया और हमारे गुनाहों को मिटाने के लिए अपने बेटे को कुर्बान होने के लिए भेज दिया।
[11] प्रिय दोस्तो, इसलिए कि परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया, हमें भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।
[12] किसी ने भी परमेश्वर को नहीं देखा है, लेकिन यदि हम एक दूसरे से प्रेम रखते हैं, तो परमेश्वर हम में रहते हैं और हमारे द्वारा उनका प्रेम हम में पूरी तरह से दिखाई दिया है।
[13] परमेश्वर ने अपने आत्मा को इस सबूत के रूप में दिया है, कि हम उन में रहते हैं और वह हम में।
[14] इसके साथ ही हम ने अपनी आँखों से देखा है और गवाही देते हैं कि पिता ने अपने बेटे को दुनिया का मुक्तिदाता होने के लिए भेजा है।
[15] जितने लोग यह ऐलान करते हैं कि यीशु परमेश्वर के बेटे हैं, उन में परमेश्वर निवास करते हैं और वे परमेश्वर में।
[16] हमें मालूम है कि परमेश्वर हमसे कितना प्रेम करते हैं, और हम ने अपना भरोसा उन पर रखा है। परमेश्वर प्रेम हैं, और वे सभी जिनकी ज़िन्दगियों में प्रेम है, वे परमेश्वर में जी रहे हैं और परमेश्वर उन में।
[17] जैसा हम परमेश्वर में रह रहे हैं, हमारा प्रेम दिन ब दिन बढ़ता ही रहता है। और तब हम न्याय के दिन डरेंगे नहीं, लेकिन बड़ी हिम्मत से उनके सामने खड़े रह सकेंगे, क्योंकि यहाँ इस दुनिया में हम मसीह की तरह हैं।
[18] ऐसे प्रेम में किसी तरह का डर नहीं पाया जाता है, क्योंकि सच्चा (परिपक्व) प्रेम सब तरह के डर को निकाल फेंकता है। यदि हम डरते हैं, तो यह इन्साफ़ के दिन का डर है। यह दिखाता है कि उन के प्रेम ने हमारे जीवन में जड़ नहीं पकड़ी
[19] इसलिए कि उन्हों ने हम से पहले प्रेम किया, हम उन से प्रेम करते हैं।
[20] यदि कोई कहता है, "मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, लेकिन अपने मसीही भाई या बहन से नफ़रत करता है, वह इन्सान झूठ बोलता है, इसलिए कि यदि हम जिन लोगों को देखते हैं, उन से प्रेम नहीं करते, तो हम परमेश्वर से प्रेम कैसे कर सकते हैं, जिन्हें हम ने नहीं देखा है।
[21] स्वयं परमेश्वर ने यह आदेश दिया है कि जो परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह अपने भाइयों और बहनों से भी प्रेम रखे।